शैलेश मटियानी सर्वश्रेष्ठ कथाकारों में आतें हैं

साहित्य की इस श्रृंखला में इस बार हम आप का परिचय करवा रहे है उत्तराखंड के आंचलिक कवि स्वर्गीय शैलेश मटियानी जी से …….

मैं मनीषा गुप्ता हिमालिनी पत्रिका (नेपाल ) की आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे यह सौभाग्य दिया कि हम अपने साहित्यकारों को सब से रूबरू करवाएं

शैलेश मटियानी को हमारे बीच से गये हुए छह साल पूरे हो चुके हैं। लगता है जैसे कल की बात हो। तमाम संघर्षो तथा दु:श्चिंताओं के बावजूद आखिरी समय तक जैसा कि वे लेखन के बारे में कहा करते थे,” कागज पर खेती” करते रहे। उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए राजेंद्र यादव ने स्वीकार किया है कि हम सबके मुकाबले उनके पास अधिक उत्कृष्ट कहानियां हैं। गिरिराज किशोर ने उनकी कहानियों का मूल्यांकन करते हुए उन्हें प्रेमचंद से आगे का लेखक ठहराया है। शैलेश ने न सिर्फ हिंदी के आंचलिक साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया बल्कि हिंदी कहानी को कई यादगार चरित्र भी दिये। उनकी कहानियों का जिक्र आते ही मस्तिष्क में एक साथ कई चरित्र तेजी से घूमने लगते हैं, पद्मावती, इब्बू-मलंग, गोपुली, सावित्री, पोस्टमैन, नैन सिंह सूबेदार, सूबेदारनी, मिरदुला आदि ऐसे चरित्र हैं जो एक बार पाठक के मनोजगत में प्रवेश करने के बाद सदा-सदा के लिए उसकी स्मृति में डेरा जमा लेते हैं।

उनके रचना कर्म पर टिप्पणी करते हुए हंस संपादक ने अपने बहुचर्चित संपादकीय शैलेश मटियानी बनाम शैलेश मटियानी में लिखा था- मटियानी को मैं भारत के उन सर्वश्रेष्ठ कथाकारों के रूप में देखता हूं, जिन्हें विश्व साहित्य में इसलिए चर्चा नहीं मिली कि वे अंग्रेजी से नहीं आ पाए। वे भयानक आस्थावान लेखक हैं और यही आस्था उन्हें टालस्टाय, चेखव और तुर्गनेव जैसी गरिमा देती है। उन्होंने अद्र्धागिनी, दो दु:खों का एक सुख, इब्बू-मलंग, गोपुली-गफुरन, नदी किनारे का गांव, सुहागिनी, पापमुक्ति जैसी कई श्रेष्ठ कहानियां तथा कबूतरखाना, किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई, चिट्ठी रसैन, मुख सरोवर के हंस, छोटे-छोटे पक्षी जैसे उपन्यास तथा लेखक की हैसियत से, बेला हुइ अबेर जैसी विचारात्मक तथा लोक आख्यान से संबद्ध उत्कृष्ट कृतियां हिंदी जगत को दीं। अपने विचारात्मक लेखन में उन्होंने भाषा, साहित्य तथा जीवन के अंत:संबंध के बारे में प्रेरणादायी स्थापनाएं दी हैं।

भारतीय कथा में साहित्य की समाजवादी परंपरा से शैलेश मटियानी के कथा साहित्य का अटूट रिश्ता है। वे दबे-कुचले भूखे नंगों दलितों उपेक्षितों के व्यापक संसार की बड़ी आत्मीयता से अपनी कहानियों में पनाह देते हैं। वे सच्चे अर्थो में भारत के गोर्की थे।

उनका जन्म बाड़ेछीना गांव (जिला अलमोड़ा, उत्तराखंड (भारत)) में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। बारह वर्ष (१९४३) की अवस्था में उनके माता-पिता का देहांत हो गया। उस समय वे पांचवीं कक्षा के छात्र थे। इसके बाद वे अपने चाचाओं के संरक्षण में रहे किंतु उनकी पढ़ाई रुक गई। उन्हें बूचड़खाने तथा जुए की नाल उघाने का काम करना पड़ा।

पांच साल बाद 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिर से पढ़ना शुरु किया। विकट परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। वे १९५१ में अल्मोड़ा से दिल्ली आ गए। यहाँ वे ‘अमर कहानी’ के संपादक, आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रहने लगे। तबतक ‘अमर कहानी’ और ‘रंगमहल’ से उनकी कहानी प्रकाशित हो चुकी थी। इसके बाद वे इलाहाबाद गए। उन्होंने मुज़फ़्फ़र नगर में भी काम किया। दिल्ली आकर कुछ समय रहने के बाद वे बंबई चले गए। फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें कई कठिन अनुभवों से गुजरना पड़ा। १९५६ में श्रीकृष्ण पुरी हाउस में काम मिला जहाँ वे अगले साढ़े तीन साल तक रहे और अपना लेखन जारी रखा। बंबई से फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए वे इलाहाबाद आ गए और कई वर्षों तक वहीं रहे। 1992 में छोटे पुत्र की मृत्यु के बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गए। विक्षिप्तता की स्थिति में उनकी मृत्यु दिल्ली के शहादरा अस्पताल में हुई।

रचना कर्म

१९५० से ही उन्होंने कविताएं और कहानियां लिखनी शुरू कर दी थी। शुरु में वे रमेश मटियानी ‘शैलेश’ नाम से लिखते थे। उनकी आरंभिक कहानियां ‘रंगमहल’ और ‘अमर कहानी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई। उन्होंने ‘अमर कहानी’ के लिए ‘शक्ति ही जीवन है’ (१९५१) और ‘दोराहा’ (१९५१) नामक लघु उपन्यास भी लिखा। उनका पहला कहानी संग्रह ‘मेरी तैंतीस कहानियां’ १९६१ में प्रकाशित हुआ। उनकी कहानियों में ‘डब्बू मलंग’, ‘रहमतुल्ला’, ‘पोस्टमैन’, ‘प्यास और पत्थर’, ‘दो दुखों का एक सुख’ (1966), ‘चील’, ‘अर्द्धांगिनी’, ‘ जुलूस’, ‘महाभोज’, ‘भविष्य’ और ‘मिट्टी’ आदि विशेष उल्लेखनीय है। कहानी के साथ ही उन्होंने कई प्रसिद्ध उपन्यास भी लिखा। उनके कई निबंध संग्रह एवं संस्मरण भी प्रकाशित हुए। उन्होंने ‘विकल्प’ और ‘जनपक्ष’ नामक दो पत्रिकाएँ निकाली। उनके पत्र ‘लेखक और संवेदना’ (१९८३) में संकलित हैं।

कहानी संग्रह

‘दो दुखों का एक सुख’ (१९६६)’नाच जमूरे नाच’,’हारा हुआ’,’जंगल में मंगल’ (१९७५),’महाभोज’ (१९७५),’चील’ (१९७६),’प्यासपत्थर'(१९८२),’बर्फ की चट्टानें'(१९९०)’सुहागिनी तथा अन्य कहानियां’ (१९६७),’पाप मुक्ति तथा अन्य कहानियां’ (१९७३),’माता तथा अन्य कहानियां’ (१९९३),’अतीत तथा अन्य कहानियां’,’भविष्य तथा अन्य कहानियां’,’अहिंसा तथा अन्य कहानियां’,’भेंड़े और गड़ेरिए’

उपन्यास

‘हौलदार’ (१९६१),’चिट्‌ठी रसेन’ (१९६१),’मुख सरोवर के हंस’,’एक मूठ सरसों’ (१९६२),’बेला हुई अबेर’ (१९६२),’गोपुली गफूरन’ (१९६२),’नागवल्लरी’,’आकाश कितना अनंत है”बोरीबली से बोरीबंदर’,’भागे हुए लोग’,’मुठभेड़’ (१९९३),’चंद औरतों का शहर’ (१९९२)’किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई’,’सावित्री’,’छोटे-छोटे पक्षी’,’बावन नदियों का संगम’,’बर्फ गिर चुकने के बाद’,’कबूतरखाना’ (१९६०),’माया सरोवर’ (१९८७)’रामकली’

निबंध और संस्मरण

‘मुख्य धारा का सवाल’,’कागज की नाव’ (१९९१),’राष्ट्रभाषा का सवाल’,’यदा कदा’,’लेखक की हैसियत से’,’किसके राम कैसे राम’ (१९९९),’जनता और साहित्य’ (१९७६),’यथा प्रसंग’,’कभी-कभार’ (१९९३),’राष्ट्रीयता की चुनौतियां’ (१९९७)’किसे पता है राष्ट्रीय शर्म का मतलब’ (१९९५)

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