शोक से पीडित क्यों

रवीन्द्र झा शंकर’:यह संसार शोक समुद्र है । इसमें जन्म लेनेवाला कोई भी ऐसा प्राणी देखा और सुना नहीं गया, जो किसी न किसी प्रकार के शोक से पीडिÞत न हो । किसी को अपने शरीर में दिखाई दे रही न्यूनता पीडिÞत किए है तो कोई अपनी इच्छानुसार किसी वर्ण्र्ााथवा जाति में उत्पन्न न हो सकने के कारण शोक से भरा है । कोई इस शोक से सन्तप्त दिखाई देता है कि वह लाख प्रयत्न और परिश्रम के बाद भी अपने लिए जितनी सम्पत्ति चाहता है, उसे नहीं मिल पा रहा, जबकि उसका पडÞोसी बिना प्रयत्न तथा परिश्रम भी अतुलनीय सम्पत्ति का स्वामी बना बैठा है । किसी के मन में यह पीडÞा है कि उसका नाम समाज में उतनी श्रद्धा और आदर के साथ नहीं लिया जाता, जितना उसके सहकर्मी का लिया जाता है ।
किसी को इस बात का दुःख रहता है कि उसे पत्नी पुत्रों एवं पुत्रियों से जो अपेक्षा थी, उसकी वह अपेक्षा पूरी नहीं हर्ुइ और इसी भाव से वह शोक सन्तप्त हो उठता है । किसी भी व्यक्ति के लिए इससे भी दारुण शोक की अवस्था वह होती है, जब उसके अतिप्रिय पिता-माता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री आदि में से कोई भी सामयिक अथवा असामयिक रूप से उसके जीवन से बिछडÞ जाता है । कभी-कभी तो ऐसी असामयिक घटना के घटित हो जाने पर कोई शोकाभिभूत होकर अपने प्राणों का उर्त्र्सग करने के लिए भी तैयार हो जाता है । संसारिक जीवन में आई हर्ुइ वह दारुणतम स्थिति है और ऐसी स्थिति आने पर ज्ञानी से ज्ञानी व्यक्ति भी विचलित हो जाता है तथा उसका सारा-का-सारा ज्ञान, बल असहाय सा दिखता है । सांसारिक जीवन की इन शोकात्मक स्थितियों से अपने बलबूते पर उबर पाना किसी के लिए भी इसलिए सम्भव नहीं है, क्योंकि अपने मन की चाहना मात्र से वह यहँा कुछ प्राप्त नहीं कर सकता और न हीं अपने चाहने मात्र से वह प्रियजनों के बिछोडÞ से ही बच सकता है । यदि चाहे भी कि उसका शरीर और सुन्दर हो जाए एवं उसका जन्म समाज में मान्यता प्राप्त श्रेष्ठ वर्ण्र्ााें हो जाए, तो यह भी उसके वश की बात नहीं है । इसी तरह से यदि वह व्यक्ति चाहे कि उसके पडÞोसी जैसे सम्पत्ति उसे भी मिल जाए अथवा अपने सहकर्मी जैसा सम्मान वह भी प्राप्त कर ले तो भी ऐसा करना इसलिए उसके बस में नहीं हैं, क्योंकि उन स्थितियों को प्राप्त करना बहुत कुछ प्राकृतिक नियमों के साथ-साथ अपने कमार्ंे पर निर्भर करता है ।
श्रीमद् भागवत गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने इस संसार में जन्म लेने वालों की अनिवार्य मृत्यु के विषय में कहा है कि यहाँ जिस का जन्म होता है, उसकी मृत्यु होना अपरिहार्य है- जातस्य हि ध्रुर्वोमृत्यु । तब इस स्थिति में कोई भी अपने प्रियजनांे के वियोग के शोक से कदापि बच नहीं सकता, क्योंकि यहाँ जिसने भी जन्म लिया है – उसका मरण निश्चित है ।
शोकात्मक संसार के इस दारुण उत्तेजक यथार्थ ने हमारी परम्परा के प्राचीन ऋषियों, साधकों और विचारकों को प्रारम्भ से ही इस के लिए प्रेरित किया है कि वे संसाररूपी शोक समुद्र में डूबे हुए प्राणी के लिए कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे वह शोकात्मक स्थितियों से पार पा सके और अपना जीवन सुख तथा शान्ति से व्यतीत कर सके । इसी के फलस्वरूप यहाँ आत्मदृष्टि का चिन्तन विकसित हुआ तथा इस दृष्टि ने यह सिद्धान्त निरुपित किया कि जो आत्मा की अखण्डता, र्सवव्यापकता तथा आनन्दरूपता का अनुभव कर लेता है, वह इन संसारिक शोक की स्थितियों से पार हो जाता है । यथार्थतः तो यहाँ कण-कण में आत्मसत्ता ही व्याप्त है और इससे इतर कुछ भी नहीं है । जैसे ही किसी को आत्मा  के अजर, अमर, अखण्ड स्वरूप का अनुभव होता है, सारा का सारा संसार उसे अनित्य, असत् और अविद्याजनित प्रतीत होने लगता है । तब, वह इस संसार की किसी भी प्राप्ति और अप्राप्ति की दशा में सुख-दुःख की अवस्था से उपराम हो जाता है तथा अपने अन्तर में आत्मतत्व की अनभूतियों से आनन्दित रहता है ।
आत्मदृष्टि की दृढÞता से विचार करने वाला विचारक यह जानता है कि उसे उसके इच्छानुसार कायिक सौर्न्दर्य एवं आर्थिक सम्पन्नता नहीं भी प्राप्त हर्ुइ तो भी इस में किसी प्रकार से शोक करने का कोई कारण नहीं है । क्योंकि कायिक सुन्दरता और आर्थिक सम्पन्नता स्थायी तथा र्सार्वकालिक प्राप्तियाँ नहीं है । इनकी प्रकृति अस्थायी और विनाशी है । आत्मज्ञ उनके न प्राप्त होने पर शोक नहीं करता । अपने प्रियजनों के अनुकूल तथा प्रतिकूल व्यवहार से भी आत्मज्ञ इस लिए शोकाकुल नहीं होता, क्योकि सभी का पृथक पृथक स्वभाव होने से उसके मन में यह इच्छा ही नहीं जागृत होती की दूसरों का स्वभाव उसके अनुकूल हो और कोई भी परिवारिक तथा इष्टजन उसकी इच्छा के अनुकूल आचरण करें ।
अपने प्रियजनों से समय-असमय में विछडÞ जाने का शोक भी आत्मज्ञानी को उद्वेलित नहीं करता । वह जानता है कि इस संसार में किसी का भी किसी के साथ आत्म-आत्मीयका सम्बन्ध बनता नहीं है । माता, पिता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री तथा इष्टमित्र के सम्बन्ध इसी जन्म में अपनी रागात्मक दृष्टि से स्वीकार कर लिए जाते है । र्
वर्तमान जीवन को जिस किसी का अपने प्रियजन से बिछोडÞ होता भी है तो आत्मज्ञ की दृष्टि में वह पञ्चभूतों से निर्मित बिनाशी शरीर का ही बिछोडÞ है । वह यह जानता है कि विनाशी स्वभाववाले शरीर से विछोडÞ होने पर उसके लिए शोक करने का कोई कारण नहीं है । शरीर की मृत्यु ठीक वैसी ही बात है, जैसे मनुष्य का पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्रों को ग्रहण करना, जीवात्मा भी ठीक उसी प्रकार से पुराने शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करता है । यह बात गीता के दूसरे अध्याय के बाइसवें श्लोक में श्रीकृष्णद्वारा बताई गई है । जिस में जन्ममरण को पुराने वस्त्र बदल कर नये पहनने के समान कहा गया है ।
जहाँ तक आत्म सम्बन्ध की बात है तो आत्मा उन सभी शरीरों में अद्वैत रूप से विद्यमान है तथा यह अजर और अमर है । यह किसी के शरीर पात होने पर भी निर्विकारी तथा निश्चल रूप में विद्यमान रहती है । इसलिए आत्मीयजनों का वियोग भी आत्मविद्को शोकसन्तप्त नहीं करता । सामान्यजन के लिए प्रियजन वियोग असहृय होता है । वृद्ध माता-पिता के बुढापे का सहारा चला जाना या बच्चांे के सिर से पिता का साया उठ जाना अथवा नवविवाहिता की माँग का सिन्दूर मिट जाना, ऐसी हृदयविदारक परिस्थितियाँ हंै, जो प्रस्तर हृदय को भी विचलित कर देती हैं । ज्ञानवान भी इन परिस्थितियों में धर्ैय नहीं रख पाते । ऐसी परिस्थितियों में तो बस एक ही बात शान्ति दे सकती है कि अब बस परमपिता परमात्मा ही मेरे हैं, मेरा आगे का जीवन अब उन्ही की शरण है और वे अशरण शरण ही मेरा योग क्षेम का निर्वहन करेंगे । ऐसी परिस्थिति में यही मानना शान्तिदायक हो सकता है कि मृत्यु को प्राप्त प्रियजन अब पिता की गोद से उठ कर परम पिता की गोद में जा रहा है । जो स्वाभाविक ही अधिक आनन्ददायक है, ऐसे में उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।

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