संकटमोचक भूमिका में भारतीय राजदूत

हिमालिनी डेस्क
चेहरे पर ओजस्विता, होठों पर मुस्कान, वाणी में शालीनता और र्सार्वजनिक रूप से हमेशा ही खुशमिजाज दिखना शायद उनकी फितरत सी बन गई है। आम तौर पर इस पद पर

jayant prasad

संकटमोचक भूमिका में भारतीय राजदूत

रहे अन्य किसी के लिए भी इतना सहज और सरल रहना काफी मुश्किल होती। लेकिन जिस सरल और सहज अन्दाज में वे अपनी बातों को रखते हैं और बिना किसी तनाव के दूसरे के सामने प्रस्तुत होते हैं एक भारतीय राजदूत के तौर पर इस तरह का दृश्य देख पाना पिछले कुछ वषर्ाें में काफी दर्ुलभ हो गया था।
नेपाल और भारत के बीच संबंध ही कुछ ऐसा है कि न चाहते हुए भी यहां की परिस्थिति के मुताबिक या यूं कहें कि उससे भी अधिक चिन्ता, तनाव और व्यस्तता में एक भारतीय राजदूत को देखा जाता है। खास कर ऐसे समय जब कि नेपाल वाकई में राजनीतिक और संवैधानिक संकट से जूझ रहा हो। खास कर ऐसे समय जब राजनीतिक दलों के बीच की दूरियां बढÞÞती जा रही हो और नेपाल का राजनीतिक भविष्य अनिश्चितता के भंवर फंसा हुआ हो। स्वाभाविक है ऐसे समय भारत के राजदूत के तौर पर किसी भी व्यक्ति के लिए सहज सरल और तनावमुक्त होना तो दूर की बात दिखना भी काफी मुश्किल हो जाता है। दोनों देशों के बीच का संबंध ही कुछ ऐसा है कि न चाहते हुए भी भारतीय राजदूत को इन कठिन और विषम परिस्थितियों में अपनी भूमिका को सक्रिय रखने पडÞती है। क्योंकि नेपाल में पुनर्स्थापित हुए लोकतंत्र और गणतंत्र की नींव अभी उतनी पक्की नहीं हर्ुइ है और नेपाल के लोकतंत्र की नींव में ही दरार पडÞना भारत के लिए सबसे अधिक महंगा पडÞ सकता है।
जयन्त प्रसाद ने नेपाल में भारतीय राजदूत के पद पर ऐसे समय अपना पदभार ग्रहण किया था जिस समय देश में संविधान सभा को लेकर कई तरह की अटकलें लगई जाती रही हैं। और नेपाल की राजनीति में भारतीय हस्तक्षेप को लेकर काफी बबाल मचाया जा रहा था। यहां बिना बात पर भी भारत को हर मुद्दे पर घसीटना मीडिया की आदत सी बन चुकी थी। नेपाल के तथाकथित बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिकर्मी सभी के मुख में या लेखनी में एक ही बात होती थी कि नेपाल की यह जो बदतर स्थिति हर्ुइ है या नेपाल में जो राजनीतिक उलटफेर हो रहा है वह सब भारत के इशारे पर हो रहा है और भारत के हस्तक्षेप से ही यह सब हुआ है। लेकिन जब से जयन्त प्रसाद ने अपना कार्यभार संभाला है, अपनी सूझबूझ और शान्त-सरल स्वाभाव के कारण उन्हें शायद उन आरोपों का सामना अभी तक नहीं करना पडÞा है जो कि उनके पर्ूववर्ती अधिकारियों को झेलना पडÞा था।
शायद यह पहली बार है जबकि यहां की अधिकांश मीडिÞया ने संविधान सभा भंग होने के बावजूद इसमें भारत या भारतीय राजदूत को नहीं घसीटा है। निश्चित रूप से इसमें जयन्त प्रसाद की जरूरत से ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाने और चुपचाप बिना किसी तडÞक भडÞक या दिखावे के अपने काम को अंजाम देने की उनकी कार्यशैली को इसका श्रेय जाता है। यह एक बडÞी उपलब्धि है कि इस समय नेपाली मीडिÞया या नेपाल के बुद्धिजीवी और राजनीतिकर्मी की तरफ से भारत या भारतीय राजदूत के बारे में नकारात्मक बातें देखने को नहीं मिलती है। और इससे नेपाल में कम्यूनिष्टों द्वारा नेपाल में जो एक भारत विरोधी लहर फैलाई जाती रही है, उसमें भी कमी आई है। हां इसकी एक कमजोरी यह भी है कि कई ऐसे अच्छे काम और कई ऐसे कदम जो कि नेपाल और नेपाली जनता के हित में है, वह भी उनके द्वारा उठाया गया लेकिन उसकी चर्चा नहीं हो पाई और ना ही मीडिÞया ने ही उन बातों को तवज्जो दिया। खैर नेपाल में भारत विरोधी मीडिÞया के हावी होने से इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है।
नेपाल इस समय एक गम्भीर संकट से जूझ रहा है। देश में राजनीतिक और संवैधानिक संकट का बादल छाया हुआ है। सबकी निगाहें इस समय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विपक्षी दलों पर टिकी हर्ुइ है। विपक्षी दलों के द्वारा दबाब देकर राष्ट्रपति को सक्रिय करने की कोशिश और सरकार द्वारा इस समय किसी भी कीमत पर पद नहीं छोडÞने की जिद के बीच देश एक गहरे द्वंद्व में फंसता दिखाई दे रहा था। बजट को लेकर भी संशय की स्थिति बनी हर्ुइ है। विपक्षी पार्टियां और राष्ट्रपति ने सरकार की संवैधानिकता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया था, और प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को ही कठघरा में लाकर खडÞा कर दिया। इस जटिल परिस्थिति में भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद की पर्दे के पीछे से निर्वाह की गई भूमिका काफी प्रभावकारी रही, जिसका परिणाम यह हुआ कि देश एक गम्भीर राजनैतिक द्वंद्व में फंसते-फंसते बच गया। कुछ खबरें मीडिÞया की सर्ुर्खियां नहीं बन पाती क्योंकि वह पर्दे के पीछे होती है। लेकिन भारत की सकारात्मक बातों को भी नकारात्मक रूप में पेश करने वाली नेपाल की तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया को भारत या भारतीय राजदूत के द्वारा निर्वाह किए गए इतनी अहम और प्रभावकारी कदम को नजरअंदाज कर दिया।
वीरगंज स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास के एक अधिकारी के द्वारा नहीं कही गई बातों को अखबार के प्रथम पृष्ठ पर मनगÞंत समाचार प्रकाशित कर उसको बेवजह तूल देकर एक सोची समझी रणनीतिक षडÞयंत्र के तहत मुद्दा बनाया गया। लेकिन जब देश एक गहरे संवैधानिक संकट में फंसा हो, देश में राजनीतिक विश्वास का संकट गहराता जा रहा हो, देश में लोकतंत्र की नींव हिलने लगी हों और लोकतंत्र विरोधी शक्तियां हावी होने लगी हों ऐसे में भारतीय राजदूत के द्वारा कुछ सक्रिय लेकिन कूटनयिक मर्यादा के भीतर किए गए प्रयास को नजरअंदाज करना कितना जायज होगा –
बजट को लेकर सरकार और विपक्षी पार्टियां आमने-सामने थी, सरकार परिवर्तन को लेकर सरकार और विपक्षी पार्टियां एक दूसरे की कोई भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं थी, राजनीतिक दलों के बीच दूरी  देख राष्ट्रपति भी अपनी सक्रियता बढÞाने की तैयारी में थे। इस विषम परिस्थिति और इसके भयंकर परिणाम की कल्पना करते हुए एक शख्स ने इन सभी के बीच सहजकर्ता की भूमिका निर्वाह की। वैसे तो इन परिस्थितियों में भारतीय राजदूत का किसी से भी मिलना काफी बबाल खडÞा कर सकता था और नेपाल की कुछ भारत विरोधी मीडिÞया तो जैसे इस फिराक में ही लगी रहती हैं। इन बातों को ध्यान में रखते हुए भारतीय राजदूत ने जिस कूटनयिक संयमता और सूझबूझ का परिचय दिया वह वाकई काबिले तारीफ है। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और इस समय नागरिक दैनिक के संपादक किशोर नेपाल ने भी यह स्वीकार किया देश को अनिश्चितता के भंवर से बाहर निकालने का भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद का यह प्रयास सही समय पर किया गया ऐतिहासिक कदम साबित होगा। १४ जुलाई को नागरिक दैनिक में विशेष संपादकीय लिखते हुए किशोर नेपाल ने जयन्त प्रसाद की शटल डिÞप्लोमेसी की काफी सराहना की थी। उनके इस लेख में बतया गया था कि कैसे राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और माओवादी अध्यक्ष प्रचण्डÞ से लेकर सुशील कोइराला और झलनाथ खनाल तक से मुलाकात कर उन्हें इस बात के लिए मनाया कि उन सभी की जीद देश हित में नहीं है और सभी को सहमति में आने के लिए मध्यमार्ग अपनाने के अलावा कोई भी चारा नहीं है, यदि लोकतंत्र को बचाना है तो।
सरकार परिवर्तन की मांग कर रहे विपक्षी गठबन्धन के नेताओं के द्वारा दूसरा विकल्प नहीं दिए जाने और सिर्फप्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को दोहराते रहने से समस्या का समाधान निकलने के बजाए और जटिलता बढÞेगी। यही बात भारतीय राजदूत ने कांग्रेस सभापति सुशील कोइराला हों या एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल या माधव नेपाल सभी नेताओं को समझाया। इसके अलावा राष्ट्रपति से भी मुलाकात के दौरान उन्होंने यही बात कही कि यदि किसी भी दल के उकसाने पर आप इस समय कोई कदम उठाते हैं तो इसका खामियाजा सभी को भुगतना पडÞ सकता है। राष्ट्रपति और भारतीय राजदूत के बीच हर्ुइ इस मुलाकात का जिक्र करते हुए नागरिक के संपादक किशोर नेपाल ने अपने विशेष संपादकीय में लिखा है कि राष्ट्रपति ने वर्तमान बाबूराम भट्टर्राई सरकार को हटाने की पूरी मंशा बना ली थी। लेकिन इस समय भट्टर्राई सरकार को हटाना या बर्खास्त करना देश में एक नई और भयंकर समस्या को जन्म देगा। यदि राष्ट्रपति ने अपना ट्रैक चेंज किया और सरकार परिवर्तन की बात सोची तो राजनीतिक शून्यता को बढÞाने के अलावा और कोई भी फायदा नहीं होगा। आखिर कुछ भी हो बाबूराम भट्टर्राई सरकार एक निर्वाचित संविधान सभा या संसद से चुनकर बनाई गई थी। इसलिए इस सरकार को फिलहाल हटा कर संवैधानिक संकट को ही निमंत्रण देने की बात राष्ट्रपति को समझाई गई और राष्ट्रपति ने इसे मान लिया।
इसी तरह उन्होंने माओवादी अध्यक्ष प्रचण्डÞ से भी मुलाकात कर फिलहाल सरकार को हटाने के बजाए अगले चुनाव पर ध्यान केन्द्रित करने का आग्रह किया था। राष्ट्रीय सहमति के नाम पर बाबूराम सरकार की बली चढÞाने और खुद को महान नेता साबित करने की सोच में पहुंच चुके प्रचण्डÞ से भारतीय राजदूत ने पूछा था कि आखिर किस आधार पर नई सरकार का गठन किया जाएगा – परिवार से लेकर पार्टर्ीीक में कमजोर बनते जा रहे प्रचण्डÞ, बाबूराम भट्टर्राई की लोकप्रियता और पार्टर्ीीे भीतर उनके बढÞते वर्चस्व से भी दोनों नेताओं के बीच प्रतिस्पर्द्धर्ााैसा माहौल दिखता है और यही कारण है कि प्रचण्डÞ र्सार्वजनिक रूप से सरकार परिवर्तन करने का बयान देते नजर आते है। लेकिन भारतीय राजदूत ने जब उनसे पूछा कि आखिर किस आधार पर और कौन सी संवैधानिक धारा के तहत नई सरकार बन पाएगी – भारतीय राजदूत ने यह भी समझाय कि लोकतंत्र में चुनाव ही र्सवाेत्तम विकल्प माना जाता है इसलिए सभी राजनीतिक दलों को चुनाव की ओर अपन ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
इसका असर हुआ और प्रचण्डÞ को भी अपन रूख बदलना पडÞा। अगले दिन पार्टर्ीीी केन्द्रीय समिति की बैठक में उन्होंने जो राजनीतिक दस्तावेज पेश किया उसमें साफ लिखा था कि माओवादी पार्टर्ीीर्तमान परिस्थिति में सरकार परिवर्तन के पक्ष में नहीं है। प्रधानमंत्री को हटाए जाने को लेकर पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल के जबाब में भी प्रचण्डÞ ने कहा था कि उनकी पार्टर्ीीी इस बात को लेकर एक मत है कि इस समय सरकार परिवर्तन नहीं होगा। उसी दिन सद्भावना पार्टर्ीीे द्वारा किए गए र्सवपक्षीय सम्मेलन में भी प्रचण्डÞ ने विपक्षी दलों के द्वारा विकल्प नहीं देने और सिर्फसरकर परिवर्तन की मांग को खारिज कर दिया।
प्रचण्डÞ के अलावा अन्य नेताओं से भेंट के दौरान भी भारतीय राजदूत ने यही बात समझाई कि लोकतंत्र में चुनाव अपरिहार्य होता है। देश को अधिक दिनों तक अस्थाई राजनीति के भरोसे नहीं छोडÞा जा सकता है। उनके इस कूटनयिक प्रयास ने काम किया और कल तक सरकार परिवर्तन की मांग कर रहे नेता भी अब चुनाव की तैयारी के र्समर्थन में बयान देने लगे हैं। हां यह बात अलग है कि दलों के बीच यह सहमति होना बांकी है कि चुनाव संविधान सभा का होना चाहिए या संसद का। कांग्रेस एमाले सहित कुछ अन्य पार्टियां संसदीय चुनाव के पक्ष में हैं और सरकार या सत्तारूढÞ पार्टियां भी इसमें लचकता अपना सकती हैं।
उधर प्रधानमंत्री और सरकार में शामिल अन्य दलों को इस बात के लिए मना लिया कि देश में द्वंद्व फैलने नहीं देना है तो विपक्षी दलों के कहे अनुसार ही एक तिहाई बजट ही लाई जाए। जब राजनीतिक सहमति बन जाएगी तब पर्ूण्ा बजट लाया जाना उचित रहेगा। राजनीति में समाधान के लिए समझौता का सिद्धांत अपनाना ही उचित रहता है। सरकार द्वारा एक तिहाई बजट लाया जाना, राष्ट्रपति द्वारा सरकार को बर्खास्त नहीं करना, विपक्षी दलों द्वारा सरकार परिवर्तन की जिद को छोडÞकर चुनाव और सहमति के लिए तैयार होना, यह सब ऐसी घटना हर्ुइ जिसकी कल्पना शायद कम ही लोग कर रहे थे। लेकिन भारतीय राजदूत के शटल डिÞप्लोमेसी की वजह से यह वाकया नहीं हुआ और देश एक गम्भीर संकट में फंसते-फंसते बच गया।
चुनाव चाहे जिस महीने में हो, इसकी भूमिका आने वाले दिनों में महत्वपर्ूण्ा होने वाली है। विघटित संविधान सभा के द्वारा उठाए गए सभी प्रश्न और विवादों में इस बार के चुनाव में जनता की तरफ से एकमुष्ठ जबाब आने वाला है। बीते चुनाव के द्वारा संविधान निर्माण का जनादेश मिला था लेकिन नए चुनाव से जनता सभी विवादित विषयों पर अपना पक्का फैसला देगी। आने वाले चुनाव में मिले जनादेश के बाद हमारे नेताओं को भी संविधान बनाने में उतनी कठिनाई नहीं हो। इसी बीच जयन्त प्रसाद की सूझबूझ और मर्यादित कूटनैतिक व्यवहार तथा कार्य कुशलता के कारण राष्ट्रपति, सरकार और राजनीतिक दलों के नेताओं को आने वाले अकल्पनीय संकट से बचा लिया है। अब शायद ही राष्ट्रपति की तरफ से सरकार निर्माण में हस्तक्षेपकारी भूमिका हो। सरकार नहीं होने की ऐसे अवस्था में राष्ट्रपति के पक्ष में सुरक्षा अंगों खासकर नेपाली सेना के भी हावी होने का खतरा फिलहाल टल गया है। राजनीतिक घटनाक्रम में सुरक्षा अंगों के हस्तक्षेप से देश में एक बार फिर चरम द्वंद्व में फंसने का खतरा बढÞ गया था। और वह द्वंद्व यदि सशस्त्र होता तो और अधिक खतरनाक हो सकता था। हजारों नेपाली जनता का खून सडÞकों पर फिर बहता। इस सच्चाई को हमें नहीं भुलाना चाहिए कि देश में इस समय हिंसा शिथिल मात्र हुआ है। इसके साथ जुडÞा आक्रोश अभी भी सक्रिय है और ऐसे समय राजनीतिक उत्तेजना बढÞाने का काम हुआ तो शिथिल पडÞ चुकी हिंसा फिर से अपना विकराल रूप धारण कर सकती है। इस वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद के द्वारा राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और राजनीतिक दलों को दिया गया सुझाव का महत्व और अधिक बढÞ गया है। सरकार और चुनाव का लाख विरोध करने के बावजूद इसके अलावा दूसरा अच्छा विकल्प भी नहीं है। देश को एक बडÞे संकट से बचाने वाले संकटमोचक की भूमिका निर्वाह करने वाले जयन्त प्रसाद के सुझाव को मानने में ही सरकार की, नेताओं की और इस देश की भलाई है।

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