संकट में मधेश की मांग

सिंहदरबार के मायाजाल में फसने के बाद मधेश मुद्दा कहाँ चला जाता है कहना मुश्किल है । इसलिए मधेश मुद्दा सम्बोधन नही होने तक सरकार में सहभागी होने से सावधान रहे वही मधेशवादी दल के लिए अच्छा होगा ।


मधेशी मोर्चा अर्थात मधेशवादी दल को सरकार में सहभागी होना उचित नही है । इससे पहले भी मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक ने सरकार में जाने के बाद सरकार की भाषा प्रयोग किया है यह किसी से छिपी नही है


मधेशवादी दल जब तक कभी काँग्रेस, कभी एमाले, कभी माओवादी के साथ मिलकर ‘कबड्डी’ जैसा खेल खेलता रहेगा तब तक मधेश की माँग संकट से उबर नही पाएगी, क्याेंकि सत्ता के खेल में सभी के एक ही हैं । आवश्यकता है माँग सम्बोधन के लिए सबसे मिलकर चले वा माँग सम्बोधन नही होने तक मधेश के सभी राजनीतिक दल संघर्ष का रास्ता अपनाबें ।morcha-with-prachand
कैलाश दास
नेपाल की राजनीति में सरकार परिवर्तन होना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि ऐसी सरकार जनता के लिए कम और पार्टी तथा कार्यकर्ता पालन के लिए बनती रही है और आगे भी बनती रहने की पूरी सम्भावना है । अगर ऐसी बात नही होती तो सरकार बनाने से पहले राजनीतिक दल दिन, महीना और साल तक की बन्दरबाँट क्यों करते ? इससे पहले काँग्रेस और एमाले ने सरकार चलाने के लिए किया था, फिर एमाले और माओवादी ने किया और अब माओवादी और काँग्रेस ने किया है ।
इससे जनता को क्या, पार्टी के नेता तथा कार्यकर्ता को भी मालुम नही होता है कि हमारी सरकार की आयु कितनी है ? बस इतनी सी आस जरुर होती है कि भले जितने दिन भी हमारी सरकार बनी रहे, पर हमें कोई मन्त्री पद मिल जाए तो एक बार अवश्य विदेश भ्रमण और एक चुनाव का टेन्सन फ्री हो जाएगा ।
जबकि सत्ता परिवर्तन का मतलव होता है विकास की दशा परिवर्तन, लेकिन यहाँ तो जनता को क्या चाहिए इससे लेनादेना नही है, यहाँ पार्टी की माँग पूरी हुई तो ठीक नही तो सत्ता में रहकर विरोध और फिर सत्ता परिवर्तन की राजनीति चालू हो जाती है । फिलहाल की ही बात करे तो बाढ़ से जनता बेहाल है, किन्तु राजनीतिक दल इससे बिलकुल बेखबर है । होना भी स्वभाविक है क्योंकि अगर अभी अपनी शक्ति जनता सेवा में लगा दी तो अपनी सरकार कैसे बन पाएगी । अगर सरकार नही बनी तो कार्यकर्ता और साँसद भी इस दल से उस दल में छोड़कर चला जाएÞगा कहा नही जा सकता ।

बड़ी बड़ी बाते करनेवाले सभी नेतागण एक बार प्रधानमन्त्री बन चुके हैं, चाहे नेपाली काँग्रेस के शेरबहादुर देउवा हों, एमाले के माधव नेपाल, झलनाथ खनाल, माओवादी के पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ वा माओवादी से अलग हुए नयाँ शक्ति पार्टी के संयोजक बाबुराम भट्टराई । किन्तु एक ने भी ऐसा इतिहास कायम नहीं किया है जिससे जनता उन्हें याद कर सके । फिर यही नेता आनेवाले दिन में कुछ करेंगे कैसे विश्वास किया जा सकता है ।

यह तो हुई बड़ी पार्टियाँे की बात । अब हम मधेशवादी पार्टिंयों की बात करें तो यह भी किसी से कम नही है । उन्होंने भी मधेशी जनता को खिलौना ही बना रखा है । जनता की भावना और त्याग से ज्यादा अपने स्वार्थ की राजनीति में ही व्यस्त हैं । २०७२ का संविधान जो काँग्रेस, एमाले, माओवादी, राप्रपा तथा फोरम लोकतान्त्रिक ने लाया है वह मधेशी जनता के लिए किसी भी दृष्टि से उपर्युक्त नही है । यह सभी जानते हैं कि इस संविधान में नागरिकता, राज्य की सीमांकन, समावेशी समानुपातिक सहित दर्जनों ऐसी बातें हैं जिससे मधेशी जनता कभी भी राजनीतिक उचाई तथा उच्च पद पर सहजता से नही पहुँच सकते हैं । मधेशवादी दलो की अगुवाई में संविधान जलाया भी गया । संविधान पुनर्लेखन या संशोधन की बात भी चली ।
वि.सं.२०७२ सावन ३० गते से पहले जब संविधान का मसौदा लाने की बात उठी उसी वक्त मधेश बन्द की घोषणा की गई । उस समय काँग्रेस, माओवादी, एमाले सहित की संयुक्त सरकार थी । वहीं सरकार ने अधिकार के आन्दोलन में मधेशी जनता के उपर लाठियाँ बरसाई, जगह—जगह गोलियाँ भी चली और आन्दोलन लम्बा होता गया । एक तरफ आन्दोलन और दूसरी तरफ संविधान बनाने की प्रक्रिया चलती रही । अन्ततोगत्वा २०७२ साल असोज ३ गते संविधान लागू कर दिया गया । इस संविधान का विरोध मधेश में मात्र नही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर में भी असन्तुष्टि जताया गयी । मधेश में जमकर आन्दोलन हुआ जिनमें ५९ लोगों ने शहादत दी । आज इसलिए यह लिखना उचित है कि यह संविधान ये ही सत्ताधारी ने बनाया है जिन्हें फिलहाल सरकार बनाने और गिराने में मधेशवादी दल ने सहयोग किया है ।
एमाले की सरकार मधेशी जनता के लिए सबसे बडी क्रुर थी, क्योंकि उन्ही के सरकार ने ५९ मधेशी जनता को भून डाला । लेकिन आज वही काँग्रेस और माओवादी मधेशी जनता के लिए कैसे ठीक हो गए जो मधेश विरोधी संविधान लाने में सफल हुए । माओवादी जिसने मधेशवादी दल के साथ बारबार धोखा किया है । हिन्दी के मुहाबरे जैसा ‘चोर—चोर मौसेरा भाई’ है तो सबसे अलग होकर मधेशवादी दल अपनी अडान क्यों नही रखती है ।
माओवादी—काँग्रेस की सरकार में फिर से मधेशवादी दल जाने के लिए आतुर है । वैसे जाने से पहले उन्होने कुछ बुँदागत समझौते की बात की है । क्या यह समझौता माओवादी—काँग्रेस की सरकार चाहकर भी पूरा कर सकती है ? कदापि नहीं, यह सरकार में सहभागी होने की चाल मात्र स्पष्ट होती है, क्योंकि मधेशवादी दल के लिए बहुमतीय सरकार कभी भी मधेशी जनता की माँंग को सम्बोधन नही कर सकती है । मधेश की माँग सम्बोधन करने के लिए सहमतीय सरकार की आवश्यकता है । किन्तु सत्ता लिप्सा के खेल में मधेशवादी दल ने बहुमतीय सरकार की वकालत कर फिर से मधेशी जनता को धोखे में रखने की सजिश में तो नही है यह शंका जनमानस में उपज रही है ।
सरकार की आयु निश्चित है ९ महीने की । फोरम लोकतान्त्रिक, राप्रपा नेपाल जो एमाले की सरकार में थी वही माओवादी की सरकार में लाने की बात चल रही है । ऐसे सरकार में जितने भी समझौता करे पर मधेशवादी दल सहभागी होंगे तो माँग सम्बोधन कम और स्वार्थ पूर्ति होने की सम्भावना बढ़ सकती है । मधेशवादी दल जब तक कभी काँग्रेस, कभी एमाले, कभी माओवादी के साथ मिलकर ‘कबड्डी’ जैसा खेल खेलता रहेगा तब तक मधेश की माँग संकट से उबर नही पाएगी, क्याेंकि सत्ता के खेल में सभी के एक ही हैं । आवश्यकता है माँग सम्बोधन के लिए सबसे मिलकर चले वा माँग सम्बोधन नही होने तक मधेश के सभी राजनीतिक दल संघर्ष का रास्ता अपनाबें ।
अगर मधेशवादी दल सरकार में गई तो फिर से मधेश के मुद्दे को भुलाया जा सकता है । नेतागण देश विदेश के भ्रमण मे अपनी चुनावी रणनीति के चक्रव्यूह रचने में लग सकती है । इसलिए मधेशी मोर्चा अर्थात मधेशवादी दल को सरकार में सहभागी होना उचित नही है । इससे पहले भी मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक ने सरकार में जाने के बाद सरकार की भाषा प्रयोग किया है यह किसी से छिपी नही है । अभी तक देखा गया है कि मधेश का आन्दोलनरत नेता में तब तक धैर्य रहता है जब तक सिंहदरबार के मायाजाल में नही फंसा रहता है । सिंहदरबार के मायाजाल में फसने के बाद मधेश मुद्दा कहाँ चला जाता है कहना मुश्किल है । इसलिए मधेश मुद्दा सम्बोधन नही होने तक सरकार में सहभागी होने से सावधान रहे वही मधेशवादी दल के लिए अच्छा होगा ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz