संकट में संविधान, मुठभेड में देश

kailash das

कैलाश दास

कैलाश दास:८ माघ २०७१ को नेपाल में नयाँ संविधान लागू किया जाना था । किसी कारणवश संविधान नहीं भी आ सका तो उसका मस्ाौदा अवश्य आएगा, प्रमुख दलों का ऐसा दावा था । माघ ८ बीत चुका, न संविधान आया और ना मस्ाौदा । देश मंे फिर वही होना निश्चित प्रायः लग रहा है, जो आम नेपाली नहीं चाहते थे । अर्थात् देश फिर से मुठभेड मंे जाता दिख रहा है । फिर से आन्दोलन का बिगुल बज चुका है ।
सत्ताधारी एमाले-काँग्रेस और प्रतिपक्षी एमाओवादी-मधेशवादी दल बीच संघीयता के नाम पर जो विवाद शुरु से ही देखा जा रहा था वह और भी अधिक गंभीर मोडÞ पर आ खडÞा हुआ है । देश मंे फिर से आन्दोलन होने की सम्भावना देखी जा रही है । विपक्षी एमाओवादी-मधेशवादी ‘सहमति के आधार पर संघीयता सहित का संविधान’ चाहते हैं । इसके अलावा राज्य विभाजन, शासकीय स्वरूप, न्याय प्रणाली आदि इत्यादि भी प्रतिपक्षी दलों की मांग है, दूसरी ओर एमाले-काँग्रेस के संयुक्त सरकार को प्रायः सभी शर्तें मन्जूर हैं । लेकिन पाँच जिला झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, कैलाली, कञ्चनपुर एमाले-काँग्रेस के अनुसार पहाडÞ में होना चाहिए तो एमाओवादी-मधेशवादी मधेश कहते हैं मधेश में । सवाल यहीं पर खत्म नहीं होता है । संघीयता सहित का संविधान एमाले-काँग्रेस को भी चाहिए लेकिन प्रान्त के विभाजन में मधेशी जनता के अधिकार को संकुचित किया गया है, जो आन्दोलन का प्रमुख कारक बनता दिख रहा है । अगर इसमें सहमति नहीं हर्ुइ तो २०६३/०६४ के मधेश आन्दोलन से ज्यादा आक्रामक आन्दोलन होने की सम्भावना है, जिसका रिहर्सल -पर्ूवाभ्यास) माघ ७-८ गते संसद में एमाओवादी-मधेशवादी दल के सभासदांे द्वारा किया गया था । राजनीतिक प्रतिवाद के क्रम में सभासदों द्वारा माइक फेकना, कर्ुर्सर्ीीोडÞफोडÞ करना, गालीगलौज और नारा जुलूस पर््रदर्शन करना निःसन्देह लज्जास्पद माना जाएगा, परन्तु कहते हैं- ‘मरता क्या नहीं करता…।’ एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने मोर्चा सम्बद्ध सभासद द्वारा प्रदर्शित इस व्यवहार को बाध्यात्मक कदम बताया है ।

नारा जुलुस लगाते हजारौं के संख्या मे नेता तथा कार्यकर्ता

नारा जुलुस लगाते हजारौं के संख्या मे नेता तथा कार्यकर्ता

madhesh andolan

मधेश

किसी दल विशेष के राजनीतिक स्वार्थ और उच्च वर्गीय शासक को निरन्तरता देने  के उद्देश्य से यदि संविधान आता है, तो इसका विरोध स्वाभाविक है । एक ऐसा संविधान जिसमें मधेशी, दलित, अल्पसंख्यक, मुस्लिम आदि पिछडÞा वर्ग, धर्म, सांस्कृतिक क्षेत्र मंे बसने वाले उपेक्षित, दमित और सामाजिक मूल प्रवाह से वंचित वर्ग का अधिकार कटौती किया गया हो, तो ऐसे संंविधान का विरोध होना नाजायज नहीं माना जा सकता । ऐसे तो, सत्ताधारी एमाले-काँग्रेस गठवन्धन और एमाओवादी नेतृत्व के मधेसी मोर्चा सम्मिलित प्रतिपक्षी मोर्चा दोनों अपने आपको संविधान का सच्चा पक्षधर बता रहे हैं । दोनों की लिखित प्रतिवद्धता थी कि माघ ८ गते संविधान लाएँगें परन्तु जो हुआ वह हम सबके सामने है । सत्ताधारी दल आधी अधूरी संघीयता देना चाहते हैं । पर्ूव के झापा, मोरंग, सुनसरी तथा सुदूर पश्चिम के कंचनपुर, कैलाली पर खस पहाडÞी समुदाय का अग्राधिकार सुनिश्चित करना चाहती है । दूसरी ओर एमाओवादी नेतृत्व का मोर्चा इसके विरोध मंे हैं । सही मायने में कहा जाय तो फिलहाल संघीयता की राह में मुख्य बाधा यही है । जो संविधान सभा १ में नहीं था । आखिर रातांे रात मधेस को विभाजन करने का ये ‘ग्रैण्डडिजायन’ आया कहाँ से – आखिर किसके दिमाग की उपज है – मधेस विरोधी यह खुराफात –
पर्ूर्वी नेपाल के तीन जिला पर एमाले अध्यक्ष केपी ओली, काँग्रेस महामन्त्री कृष्णप्रसाद सिटौला और नेपाली काँग्रेस के दिग्गज कोइराला परिवार का बोलवाला रहा है । दूसरी ओर मधेस आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव और सदावहार नेता फोरम लोकतान्त्रिक अध्यक्ष विजयकुमार गच्छेदार की भी अच्छी पकडÞ मानी जाती है । खस पहाडÞी समुदाय का नेतृत्व करनेवाली काँग्रेस और एमाले पर्ूव के तीन जिला को एमाओवादी द्वारा प्रस्तावित खम्बुवान प्रदेश मंे मिला कर कोशी प्रदेश बनाना चाहते हैं । जिससे मधेसी और आदिवासी जनजाति दोनों अल्पमत मंे पडÞ जाएँ और प्रस्तावित कोशी प्रदेश मंे भी खस पहाडÞी ही मुख्यमन्त्री बने । ऐसे ही सुदूर पश्चिम के थारुओं को सत्ता मंे आने से रोकने के लिए कंचनपुर और कैलाली को सुदूर पश्चिम प्रान्त मंे मिलाने का षड्यन्त्र हो रहा है ।
भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ भी सहमति के आधार पर संविधान लाने के लिए बार-बार दबाव देते रहे हंै । फिर भी एमाले-काँग्रेस की सरकार कभी प्रक्रिया तो कभी सहमति की रट लगाकर आनन फानन में संविधान को अनिश्चिता में डाल रही है । वैसे तो आम जनता अभी तक गणतन्त्र की अनुभूति शान्ति और विकास से नहीं, राजनीतिक अस्थिरता, अराजकता, हत्या-हिंसा, बेरोजगारी, अपराध, बन्द हडÞताल, अशिक्षा, बेरोजगारी तथा बढÞ रही वैदेशिक रोजगारी से की है ।
जाहिर है कि संघीयता सहित का संविधान एमाओवादी-मधेशवादी मुख्य एजेण्डा है तो एमाले-काँग्रेस का भी । र्फक सिर्फइतना है कि एमाओवादी-मधेशवादी सहमति के आधार पर संघीयता सहित का संविधान खोज रहे हंै तो एमाले-काँग्रेस जनता का अधिकार कम और राजनीतिक फायदा ज्यादा । हाँ, संविधान में सभी पक्षों को संतुष्ट करना मुश्किल है । लेकिन पहाडÞी मधेशी बीच की जो भावना है उसे खत्म करने के लिए आवश्यक है विवाद रहित संविधान निर्माण हो । अगर्रर् इमानदारीपर्ूवक संघीयता सहित का संविधान एमाओवादी-मधेशवादी और एमाले-काँग्रेस चाहते तो झापा, कैलाली, मोरङ्ग, सुनसरी जिला मेंं विवाद ही नहीं होता । ऐसा लगता है यह प्रदेश नहीं देश विभाजन हो रहा है । जिसके लिए एक बार फिर से संविधान निर्माण अनिश्चितता में  है । यह राज्य सीमाकंन हो रहा है राष्ट्र नहीं । अगर यह पाँच जिला मधेश में है तो इसे मधेश प्रदेश में होना चाहिए मधेशी दलों का ऐसा तर्क है । वहीं एमाले-काँग्रेस पहाडÞ के किसी प्रदेश में होना चाहिए इस पर अडÞे हैं । अगर राज्य का विभाजनर् इमानदारी से किया जाए तो पहाडÞ के लोग मधेश में रहे, चाहे मधेश लोग पहाडÞ में, हैं तो सभी नेपाली ही ।
लेकिन यह सम्भव नहीं है, क्योकि खस शासकांे ने मधेश और मधेशी जनता प्रति राणा शासन काल से लेकर अभी तक इस प्रकार से विभेद किया है कि अब विश्वास करना कठिन हो गया है । इसके बहुत सारे उदाहरण भी हैं । हाल में ही भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का जनकपुर भ्रमण, नेकपा एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली का मधेश और भारत के यूपी, बिहार जैसी विवादित अभिव्यक्ति, मधेश के विकास प्रति बजट निकास में आनाकानी से सिद्ध होता है कि देश एक है लेकिन दिल दो है । अगर यह विभेद गणतन्त्र में अन्त हो चुका होता तो आज फिर से मधेश आन्दोलन जन्म नहीं लेता । सीके राउत जैसी विचारधारा जन्म नहीं लेती । अब वह समय नहीं रहा, जहाँ से नेतागण जीत कर जाते थे और वहीं की जनता के ऊपर शोषण, दमन किया करते थे ।  मधेशी राजनीतिक दल भी इस प्रकार परिपक्व हो चुके हैं कि हर मुसीबतों का सामना कर सकते हैं । हाँ, एमाले काँग्रेस की सरकार सत्ता में है तो दमन की सम्भावना है लेकिन दबा नहीं सकते हंै ।
एमाओवादी-मधेशवादी के लिए भी यह समय बहुत ही संवेदनशील है । उन्हें भी ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिसका परिणाम देश को भुगतना पडÞे । राजनीतिक लर्डाई विचारों से लडÞा जाता है, भौतिक संरचना से नहीं । सत्तापक्ष की जिम्मेदारी सम्पर्ूण्ा राष्ट्र की होती है अगर यहाँ विभेद किया गया तो किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती है ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: