संकट में संविधान

पंकज दास:संविधान सभा चुनाव से पहले से ही एक साल के भीतर संविधान जारी करने की प्रतिबद्धता जताने वाली राजनीतिक पार्टियों की वर्तमान स्थिति देख कर एक वर्षके भीतर तो क्या निर्धारित ४ वषर्ाें में भी संविधान जारी होने की उम्मीद कम होती जा रही है । यूँ तो चुनाव परिणाम के बाद नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले के शर्ीष्ा नेताओं को यह गलतफहमी हो गई है कि दो तिहाई बहुमत के आधार पर वो अपने तरीके का संविधान जारी करवा लेंगे । लेकिन वो शायद भूल रहे हैं कि इस देश की आधी आबादी वाले मधेशी दलित आदिवासी जनजाति सहित अन्य उपेक्षित वर्गाें के आन्दोलन की उपज है संविधान सभा । हाथ में बन्दुक उठाए सशस्त्र विद्रोह करने वाले माओवादियों के दस वषर्ाें की संर्घष्ा की गाथा है संविधान सभा । और महज एक चुनाव परिणाम के आधार पर अपने ही तरीके का संविधान बनाकर जारी करने की नीयत से संविधान के र्सवस्वीकार्य होने की आशंका भी उतनी ही बढÞती जा रही है ।sambidhan
इस संविधान सभा चुनाव में भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण बडे राजनीतिक दलों का ध्यान संविधान निर्माण से भी अधिक सत्ता के खेल में ही लगा हुआ है । चुनाव परिणाम के दो महीनों के बाद तक सरकार निर्माण नहीं होना, प्रधानमन्त्री चयन होने के १५ दिन बाद तक मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो पाना, मंत्रालय बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों में आपसी खींचातानी होना, एक महीने के बाद तक भी सरकार को पर्ूण्ाता नहीं मिलना ये सब उदाहरण बतलाते हैं कि बडÞे दलों का दो महीने का समय सिर्फसरकार गठन उसे पर्ूण्ाता देने और आपसी विवाद सुलझाने में ही लगा रहा । बात सिर्फबडÞे दलों की नहीं है छोटे दल भी इसी ताक में हैं की कब उन्हें सरकार में जाने का न्यौता मिल जाए और कब वो मंत्री बन जाए । कोइराला सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में छोटे दलों के लिए रखे गए चार मंत्रालय में मंत्रियों का चयन सिर्फइसलिए नहीं हो पाया क्योंकि राप्रपा अभी तक इस बात का फैसला नहीं कर पाई है कि सरकार में र्सर्ूय बहादुर थापा के बेटे सुनील थापा को मंत्री बनाकर भेजा जाए या फिर पशुपति शमशेर राणा के खास और करीबी माने जाने वाले दीपक बोहरा को मंत्री का पद दिया जाए । मतलब साफ है कि सरकार गठन के इस खेल में बडÞे से लेकर छोटे दल तक इस कदर व्यस्त हो गई है कि यह चुनाव संविधान सभा के लिए हुआ है और उनका पहला काम संविधान निर्माण का है यह बात उनके के लिए कोई अहमियत नहीं रख रही है ।
बात सिर्फसरकार गठन मंत्रिमंडल विस्तार तक ही सीमित रहे और यह लगे कि अब इसके बाद दलों का सारा ध्यान अब सिर्फऔर सिर्फसंविधान निर्माण में ही जुटने वाला है तो उम्मीद की जा सकती थी कि प्रतिबद्धता किए गए एक वर्षमें ना सही पर निर्धारित चार वषर्ाें में संविधान निर्माण हो जाएगा और एक बार सरकार बनने के बाद अब संविधान निर्माण की तरफ उन्मुख होंगे । लेकिन यह भी आम जनता की गलतफहमी ही होने वाली है । पहली बार सुशीला कोइराला के नेतृत्व में सरकार गठन के साथ ही इस सरकार के भविष्य को लेकर काफी टिका टिप्पणी शुरू हो गई थी । कोइराला के कुछ निर्ण्र्ाासे उनकी ही पार्टर्ीीें एक बडÞा खेमा उनसे नाराज हो गया है और वह किस तरह से सरकार संचालन में बाधा उत्पन्न हो और किस तरह से इस सरकार को कमजोर साबित किया जाए इसी उद्देश्य के साथ काम कर रहे हैं । कोईराला के पार्टर्ीींसदीय दल के नेता बनने से लेकर उनके द्वारा मंत्रिमंडल विस्तार किए जाने तक जिस तरीके से पार्टर्ीीे भीतर से ही उन पर घेराबंदी की गई उससे यह बात तो स्पष्ट है कि उनकी राह आसान नहीं है । कोइराला के लिए सिर्फयही परेशानी का सबब नहीं है कि उन्हें अपनी ही पार्टर्ीीे नेताओं से असहयोग मिल रहा है । उनके सत्ता साझेदार रहे एमाले के तरफ से भी कुछ इसी तरह की बात हो रही है । एमाले में संसदीय दल के नेता चयन से लेकर मंत्रिमंडल में नाम भेजे जाने तक की साडÞी प्रक्रिया में जिस तरह से गुटबाजी हावी रही और जिस तरीके का नयाँ गठजोडÞ एमाके के भीतर ही दिखाई देने लगा है उससे इस सरकार के भविष्य को स्पष्ट बतला रहा है । पिछले संविधान सभा चुनाव में तीसरी पार्टर्ीीनकर भी दो दो बार सरकार का नेतृत्व हथियाने में सफल एमाले इस बार कांग्रेस से बस थोडÞी ही कम सिट लेकर सिर्फउप प्रधानमन्त्री में ही अपने आप को सीमित कर ले यह सोचना भी बेकार है । एमाले पार्टर्ीीे जेठ में प्रस्तावित महाधिवेशन के बाद ही इस सरकार का भविष्य खतरे में पडÞने के संकेत अभी से दिखने लगे हैं । एमाले के नेताओं का खुल कर इस बात का बयान देना कि महाधिवेशन के बाद सत्ता नेतृत्व में परिवर्तन होगा, यह कोइराला सरकार के लिए शुभ संकेत तो नहीं ही है साथ ही संविधान निर्माण की आस में बैठी नेपाली जनता के लिए भी यह चिंता का विषय है । आने वाले कुछ महीनों तक इस देश में सिर्फसत्ता परिवर्तन के ही खेल खेले जाने की उम्मीद है ।
इस समय संविधान निर्माण पर थोडा बहुत जोडÞ देने वाली माओवादी और मधेशी दल भी यह राग तब तक अलाप रहे हैं जब तक उन्हें सत्ता में जाने का मौका नहीं मिल रहा है । जैसे ही एक बार सत्ता परिवर्तन का खले शुरू होगा वैसे ही संविधान निर्माण का काम ओझल में पडÞने का खतरा बढÞ जाएगा । बांकी जो भी एक दो या तीन सभासदों वाली पार्टियां है वे भी सत्ता में जाने को लालायित दिख रही हैं । उन्हें भी यह अच्छी तरह से मालुम है कि सिर्फउनके द्वारा संविधान संविधान चिल्लाने से कुछ नहीं होने वाला है इसलिए खामोशी से वो भी सत्ता पाने की अपनी बारी का इन्तजार कर रहे हैं । ऐसा देखा गया है कि संविधान निर्माण पर वाही पार्टियां अधिक जोडÞ दे रही हैं जिन्हें फिलहाल सत्ता में जाने की कोई दूर दूर तक उम्मीद नजर नहीं आ रही है । जिन दलों को जरा भी इस बात का भनक है कि कभी कोइराला खनाल ओली या किसी अन्य की कृपा से उन्हें राज्य या सहायक मंत्री भी बनने का मौका मिल सकता है तो ऐसे नेता बिना वजह संविधान का जिक्र भी अपनी जुबान से नहीं कर रहे हैं ।
संविधान निर्माण कभी भी किसी बडÞे दल की प्राथिकता का विषय रहा ही नहीं । जिस समय पहले संविधान सभा विघटन के बाद से दुसरे संविधान सभा के चुनाव की बात की जा रही थी उसी समय नेताओं की नीयत पर शंका होने लगी थी । पहले दो वषर्ाें में बनने वाले संविधान को चार वषर्ाें में भी बनाने में असफल रहे दलों को अच्छी तरह से मालुम था कि चाहे वो जितनी भी अपनी जुबान से एक वर्षमें संविधान निर्माण की दुहाई देते रहे लेकिन यह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है । इसलिए बडÞे दल नेताओं ने सत्ता संचालन में कोई दिक्कत नहीं आए, कम से कम चार वषर्ाें तक सत्ता में भागीदारी बनी रहे, र्सवाेच्च अदालत के द्वारा बीच में ही संविधान सभा भंग करने का आदेश ना आ जाए और चार वषर्ाें के बाद भी संविधान नहीं बने तो कम से कम एक वर्षके लिए तो इसकी समयावधि को बढाया जा सके, इन्हीं सब कारणों से संविधान निर्माण के स्थान पर सत्ता को प्राथमिकता में रखते हुए ४ वषर्ाें का कार्यकाल तय किया गया । भले ही उनके मुख से भाषणों में एक वर्षमें ही संविधान निर्माण की बात आती हो लेकिन उनके दिल में यही चलते रहता है कि चार साल का समय है इसलिए कोई जल्दबाजी भी नहीं करनी ।
संविधान सभा का स्वरूप इस बार जो देखने को मिल रहा है उसे देख कर भी संविधान निर्माण पर आशंका बढÞ गई है । खुद संविधान सभा के भीतर से ही बडÞे दल के जिम्मेवार नेताओं के द्वारा ही इसकी आशंका जताई जाने लगी है । चाहे वो एमाओवादी दल के अध्यक्ष प्रचंड हों या फिर राप्रपा नेपाल के अध्यक्ष कमल थापा । संविधान सभा के दूसरी या तीसरी बैठक से ही संविधान नहीं बनने की आशंका जाहिर होने लगी थी । संविधान सभा की बैठक अभी तक एजेंडाविहीन बनी हर्ुइ है । अभी संविधान नहीं बना लेकिन उसके प्रमाणीकरण को लेकर कांग्रेस और एमाले के बीच में शीतयुद्ध चलने लगा है । संविधान सभा की बैठक संचालन के लिए बनी एक समिति की बैठक सिर्फइसलिए कोई निर्ण्र्ाानहीं कर पा रही है क्योंकि कांग्रेस और एमाले के नेता किसी भी मुद्दे को लेकर एक नहीं हो पा रहे हैं । अभी तक संविधान सभा की पहली बैठक को छोडÞ कर कोई भी बैठक ५ मिनट से अधिक नहीं चली है । यह दर्ुभाग्य ही है कि जिस संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का चुनाव किया गया उसी संविधान सभा की बैठक महत्वहीन बनती जा रही है । सबसे बडÞी समस्या इस समय स्वामित्व को लेकर होने वाला है । कांग्रेस एमाले सहित कुछ अन्य पार्टियाँ पुराने संविधान सभा से किए गए कामों का स्वामित लेने की बात कर रही है वहीँ इस बार संविधान सभा में चौथी शक्ति बन कर आई राप्रपा नेपाल इसके विपक्ष में है । उसका तर्क है कि जब पहले संविधान सभा असफल हो गई और जनता ने नयाँ जनादेश दिया है तो पुराने संविधान सभा के द्वारा किए गए किसी भी सहमती को कैसे स्वीकारा जा सकता है । आने वाले दिनों में संविधान की एक एक धारा और एक एक पंक्ति पर विवाद होने की संभावना दिख रही है । जिस संघीयता को आधार बनाकर पहला संविधान सभा विघटन होने दिया गया वह तो सबसे ज्वलंत है ही । संघीयता को लेकर कांग्रेस एमाले भले ही एक जगह आ जाएं लेकिन मधेशी दलों को उनकी संघीयता स्वीकार होगी या नहीं यह भी बडÞा प्रश्न है । दो तिहाई बहुमत का दंभा भरने वाले कांग्रेस एमाले के नेता सहमति नहीं होने पर बहुमत के आधार पर भी संविधान निर्माण कर उसे जारी करने की जो बातें कर रहे हैं उससे यदि संविधान बन भी जाए तो उसे देश का एक बडÞा तबका स्वीकार करेगा या संविधान जारी करने के दिन ही उसकी प्रति को जलाया जाएगा यह आने वाला दिन ही बताएगा । फिलहाल चिंता का विषय यही है कि जिस संविधान सभा के लिए चुनाव हुआ है और जिस संविधान निर्माण की आकांक्षा तीन करोडÞ नेपाली जनता में पल रही है उनकी भावनाओं का सम्मान होता है या फिर नेता अपनी पुरानी सत्तामुखी स्वभाव की वजह से संविधान निर्माण को ही ओझल में डाल देते हैं ।

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