संक्रमणकाल की संक्रमित राजनीति

कुमार सच्चिदानन्द:पिछले दिनों म्यान्मार की विश्वप्रसिद्ध एवं नोबेल शांति पुरस्कार से पुरस्कृत प्रजातंत्रवादी नेतृ आंग सान सुकी का नेपाल आगमन हुआ था । वे वीपी जन्मशताब्दी-समारोह के अवसर पर आयोजित ‘रिलिभेन्स आँफ सोसल डेमोक्रेसी’ नामक अन्तर्रर्ाा्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि तथा वक्ता के रूप में आमंत्रित थीं । एक कार्यक्रम में उन्होंने सहज रूप में कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि वे ऐसी जगह हैं जहाँ वर्त्तमान और निवर्त्तमान कुल आठ प्रधानमंत्री उपस्थित हैं । सहज रूप में कही गई यह बात अपने आप में एक तीक्ष्ण व्यंग्य भी है जो हमारी राजनैतिक अपरिपक्वता पर चोट भी करती है । दूसरी तस्वीर यह है कि प्रसिद्ध स्तंभकार विजयकुमार ने अपने साप्ताहिक स्तंभ में लिखा है sambidhan_sabha nepal 2013कि १५ जून की शाम सोसलिस्ट इंटरनेशनल के उपाध्यक्ष शेरबहादुर देउवा के रिसेप्सन में काँग्रेसी कार्यकर्त्तर्ााें का बाहुल्य था । इस कार्यक्रम में शोरगुल इतना अधिक था कि डायस से कौन क्या बोल रहा है, यह सही ढंग से सुनाई नहीं दे रहा था । कार्यक्रम संचालक प्रभात रिमाल ने मुँह खोलकर ही शोरगुल न करने का आग्रह उपस्थित जमात से किया लेकिन यह अप्रभावी रहा । स्थिति यह हर्ुइ कि नेपाली लोकतंत्र की प्रशंसा करने वाली सुकी ने लौटने से पर्ूव समारोह में स्पष्ट कहा कि ‘लोकतंत्र अधिकार मात्र नहीं, कर्त्तव्य भी है । यह एक संस्कृति भी है जिसे स्थापित होने में समय लगता है ।’ ये दोनों तस्वीरें स्पष्ट करती हंै कि आज न केवल हमारा देश राजनैतिक रूप से संक्रमण की अवस्था से गुजर रहा है बल्कि हमारी पूरी राजनीति ही संक्रमण के दौर से गुजर रही है । इस संक्रमित राजनीति से देश के संक्रमण काल का समाधान कैसे होगा और अगर होगा भी तो यह किस रूप में कितना चिरस्थायी होगा, यह यक्ष-प्रश्न देश के सामने है ।
यह सच है कि निर्वाचन को लोकतंत्र का आधार तत्व माना जाता है । हमारे राष्ट्रीय अनुभव में प्रक्रियागत निर्वाचन का कोई अभाव नहीं । संविधानसभा के लिए ही दो बार चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं । इस निर्वाचन में स्वस्थ जनसहभागिता लोकतंत्र के प्रति आमलोगों की प्रबल आस्था का प्रतीक है । हाल ही में सम्पन्न उपनिर्वाचन भी यही संकेत करता है । मौजूदा संविधानसभा में तीस से अधिक राजनैतिक दलों की सहभागिता है । संविधान निर्माण के क्रम में सभासद सभाकक्ष में अपने-अपने दलीय विचार प्रकट कर रहे हैं जिससे और अधिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न हर्ुइ है । संविधानसभा या संसद में सभासदों की उपस्थिति दिनानुदिन घटती जा रही है क्योंकि बहस का परिणाम क्या होगा यह उनको पता नहीं है । वे जानते हैं कि पार्टर्ीीहीप के समक्ष एक न एक दिन उन्हें चित्त होना ही पडÞेगा । संविधान निर्माण का अन्तिम अस्त्र ‘सहमति’ अभी भी प्रभावहीन है । यह भी सच है कि जिस उत्साह और उमंग के साथ जनता ने मतदान किया था उसकी तुलना में चयनित प्रतिनिधियों में दाायित्वबोध की कमी देखी जा रही है । क्योंकि दलीय नेतृत्व के दबाब के कारण ये लाचार हैं । संविधानसभा के भीतर उन्हें बोलने के सिवा और कोई स्वतंत्रता नहीं । नीतिगत निर्ण्र्ाातो नेतृत्व का होता है ।
मौजूदा संविधानसभा द्वारा आश्विन मासान्त तक मसौदा निर्माण कर कार्तिक में इसे जनता के मध्य ले जाने और माघ ८ गते के अन्दर इसे जारी करने का लक्ष्य रखा गया है । लेकिन इसके सामने सबसे बडÞी चुनौती संघीयता और राष्ट्र का शासकीय स्वरूप है । यह एक स्पष्ट तथ्य है कि विघटित संविधानसभा द्वारा संविधान जारी न किए जा सकने का कारण संघीयता सम्बन्धी विवाद ही था । यद्यपि संविधानसभा की संवैधानिक राजनैतिक संवाद तथा राजनीतिक सहमति समिति राज्य पर्ुनर्रचना सम्बन्धी विवाद का काम शुरु किया है लेकिन परिणाम कितना सकारात्मक होगा कहना मुश्किल है । यह सच है कि एमाले और काँग्रेस विजेता के मनोविज्ञान से इस विन्दु पर सहमति कर चुके हैं । लेकिन संविधानसभा के अन्य दलों को इस मुद्दे पर विश्वास में नहीं लिया गया है । यही कारण है कि इन दलों में सरकार के प्रति व्यापक असंतोष है और इनमें परस्पर मोर्चाबन्दी की भी स्थिति है तथा सडÞक आन्दोलन का भी विकल्प इन्होंने खुला रखा है । शासकीय स्वरूप पर भी दलों में उलझनें जारी हैं । एक बात तो सच है कि गणतंत्र का अभ्यास भले ही नेपाल के लिए नया हो लेकिन प्रजातंत्र का इतिहास नया नहीं है और न ही कोई दल इस रूप में सत्ता में आया है जो पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए सक्षम हो या उसे इस तरह का जनर्समर्थन मिला हो । ऐसे में इस बिन्दु पर विवाद को कम करने के लिए प्रचलित परम्परा का अनुसरण किया जा सकता है । लेकिन नयापन और मौलिकता के आग्रह के कारण हर दल का अपना-अपना राग है । यह बात हमारे राजनेताओं को समझना चाहिए कि विश्व स्तर पर स्वीकृत कोई भी व्यवस्था बुरी नहीं हो सकती । दोष व्यवस्था का नहीं, दोष व्यवस्था के कार्यान्वयन के तरीके का होता है । इसलिए अगर हम विवाद मिटाना चाहते हैं तो प्रचलित परम्परा पर सहमति ढूँढी जा सकती है । लेकिन समाधान की ओर तो हमारी राजनीति अग्रसर ही नहीं है । सवाल है कि चाहे वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, जब हमने मध्यम मार्ग को स्वीकार कर लिया है तो इस बिन्दु पर अनावश्यक खींचतान की आवश्यकता क्या है –
एक तो हमारी संविधानसभा वृहदाकार है । संख्यागत दृष्टि से ६०१ सांसदों का प्रतिनिधित्व इसमें है । निर्वाचन क्षेत्र विकास के नाम पर दस लाख रूपया वाषिर्क इन्हें राज्य द्वारा उपलब्ध कराया जाता है जिसका वे अपनी इच्छानुसार अपने क्षेत्र के विकास में उपयोग कर सकते हैं । मुद्रास्फीति या दूसरे शब्दों में कहें तो महँगाई के कारण इस राशि को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता । आम लोगों द्वारा इस राशि के दुरूपयोग होने का तर्क भी दिया जाता है । सच यह है कि यह एक महत्वाकाँक्षी योजना है जिसके तहत सांसद अपने क्षेत्र में आवश्यकता को देखते हुए बिना किसी जटिल प्रक्रिया इसका उपयोग कर सकते हैं । अगर इसमें अनियमितता के आरोप लगते हैं तो इसका जिम्मेदार हमारा प्रशासनिक तंत्र है । आज ये सांसद दस लाख की जगह ५ करोडÞ की माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं जो वर्त्तमान राशि के पचास गुणा ज्यादा है । संभवतः वे इस मनोविज्ञान में हैं कि ‘हाथी की माँग की जाए मगर घोडÞा भी मिल जाए’ तो ठीक । निश्चित ही सरकार आर्थिक रूप से अक्षमता या स्रोत की अनुपलब्धता की बात कहेगी । बीच की अगर कोई राह निकलती है तो उसे स्वागतयोग्य माना जा सकता है, लेकिन इसे सरासर लूट कहकर सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता । हाँ, इतना तो किया जा सकता है कि अगर राशि बढÞती है और उसमें अनियमितता का भय है तो योजनाएँ सांसदों से ली जानी चाहिए और कार्यान्वयन राज्य की किसी निष्पक्ष संस्था द्वारा किया जाना चाहिए । लेकिन जिस तरह यह माँग उभर कर सामने आयी है उससे तो यह साफ संदेश जाता है कि किसी न किसी रूप में हमारे सभासद देश की अर्थव्यवस्था से अनभिज्ञ हैं ।
आज हालात यह है कि द्वितीय संविधानसभा के निर्वाचन के लगभग छः महीने से ऊपर गुजर गए लेकिन २६ सभासदों के मनोनयन की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं की जा सकी है । प्रधानमंत्री सांघातिक रोग के लंबे एवं जटिल इलाज के लिए अमेरिका में हैं । कार्यकारी प्रधानमंत्री वामदेव गौतम ने यद्यपि सभी दलों से नाम माँगने की बात कही है और १५ आषाढÞ तक संविधानसभा को पर्ूण्ाता देने की बात भी कही है । लेकिन यह इतना सहज नहीं है । यह सच है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें कार्यकारी अधिकार दिए हैं, मगर उनके निर्ण्र्ाामें सबसे बडÞी समस्या दलीय असंतुलन पैदा करेगी क्योंकि, दोनों अलग-अलग दलों के होने के कारण निर्ण्र्ााकी अन्तिम जिम्मेवारी कौन लेगा कहना मुश्किल है । क्योंकि इन दोनों दलों में सत्ता साझेदार होने के बावजूद विश्वास का स्वस्थ वातावरण नहीं । इसलिए विडियो काँन्प|mेन्सिंग के द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह लेने की बात भी कही जा रही है । लेकिन इसे मानने के लिए कार्यकारी प्रधानमंत्री तैयार नहीं । आज नेपाल की राजनीति की सबसे बडÞी समस्या है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टर्ीीी क्यों न हो लेकिन दलीय एजेण्डा इतना हावी होता है कि वह नेपाल की सरकार के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पाती और दल विशेष की सरकार बनकर रह जाती है जबकि बहुमत से ये र्सवथा दूर होते हैं । जो थोडÞा बहुत दलीय एजेण्डा से विचलन देखा भी जाता है वह दबाब या मजबूरी के कारण ही । इसलिए किसी भी दल विशेष के पक्ष में राजनैतिक हवा नहीं बन पाती ।
आज देश में भैतिक पर्ूवाधार के विकास की अवस्था यह है कि शेष विश्व के साथ यह तेजी से पिछडÞता जा रहा है जबकि उत्तर और दक्षिण की दो क्षेत्रीय महाशक्तियाँ तेजी से विकास की दिशा में अग्रसर है । यह अन्तर दिनानुदिन गहराता जा रहा है जो किसी-न-किसी रूप में जन-असंतोष का रूप धारण करता जा रहा है । हमारे सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र विकास के नाम पर पाँच करोडÞ की माँग को इसी सर्न्दर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए । लेकिन हमारी राजनीति अभी भी मूलभूत सिद्धान्तों की बात करती है । एक बात तो आईने की तरह साफ है कि कोई भी प्रजातांत्रिक राष्ट्र गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले अपने नागरिकों के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता । भूखे को रोटी और बीमार को दवा देने के लिए पैसा चाहिए, भौतिक पर्ूवाधार के विकास के लिए अर्थ चाहिए । ये संसाधन कहाँ से आएँगे – इसके लिए सिद्धान्तों की नहीं, नीतियों की जरूरत है ।  इस सर्न्दर्भ में चाहे देश की आन्तरिक नीति हो या विदेशनीति, इसमें जब तक आमूल-चूल परिवर्त्तन नहीं होता, सिद्धान्तों की कोई भी संजीवनी यहाँ कारगर नहीं हो सकती । जो भी स्रोत संसाधन हैं उसके पक्षपातपर्ूण्ा विभाजन का आरोप सरकारें झेलती आ रही हैं और यह परंपरा बदस्तूर जारी है । करों के बोझ से आम लाग दबे हुए हैं, अनियंत्रित महँगाई की मार उन्हें झेलनी पडÞ रही है । ऐसे में जिस दूरदर्शिता की अपेक्षा हमारी राजनीति से की जा रही है उसका र्सवथा यहाँ अभाव देखा जा रहा है ।
नेपाल की राजनीति की सबसे बडÞी समस्या यह है कि यहाँ सक्रिय किसी भी दल में कोई ऐसा वटवृक्ष नहीं जिसकी छाया में पार्टर्ीीौर संगठन चैन की साँस ले । यही कारण है कि प्रायः सभी महत्वपर्ूण्ा दल आन्तरिक रूप में स्पष्ट रूप से दो-तीन धाराओं में विभाजित है और कोई भी नेता र्सवमान्य बनने की अवस्था में नहीं हैं । राजनीति का अर्थ इनके लिए तर्क-कर्ुतर्क का महाजाल निर्माण करना मात्र है जिसमें उलझकर आमलोगों की आकांक्षाएँ मछली की तरह तडÞपकर दम तोडÞ दे । इसके लिए राजधानी का वातानुकूलित मौसम भी कम जिम्मेवार नहीं क्योंकि पहाडÞ की दर्ुगम्यता और हिमालीय क्षेत्र की र्सद हवाएँ उन्हें रास नहीं आती और तर्राई-मधेश का धूल-धक्कडÞ तथा गर्म हवा के झोंके भी उनमें जनसेवा के प्रति विकर्षा उत्पन्न करते हैं । पदीय लिप्सा और महत्वाकाँक्षा का भूत इतना प्रबल है कि अपनी सर्वोच्चता की हत्या कर हमारे नेता फिर से पार्टर्ीीे आन्तरिक चुनावों में संलग्न होकर अपने कद पर प्रश्नचिह्न लगा लेते हैं । इसका बेहतर उदाहरण एमाले का आगामी महाधिवेशन है जिसमें दो दिग्गज नेता आपस में दो-दो हाथ करने की मनःस्थिति में हैं । विडम्बना यह है कि इनमें  से एक लगभग पन्द्रह साल तक पार्टर्ीीा नेतृत्व कर चुके हैं । कुछ दिन पर्ूव नेपाली काँग्रेस और नेकपा माओवादी भी इसी प्रक्रिया से गुजरे हैं । एक बात तो इन दलों को समझना ही चाहिए कि जिस आन्तरिक लोकतंत्र के नाम पर हम संगठन में चुनाव का अभ्यास करते हैं और यह आदत बन जाती है तो, इससे दलों के भीतर आन्तरिक अनुशासन का क्षय होता ही है, जिसका खामियाजा अन्ततः देश को भुगतना पडÞता है । नेपाल के सारे महत्वपर्ूण्ा दल इस रोग से ग्रसित हैं ।
आज अवस्था यह है कि प्रधानमंत्री सांघातिक रोग से ग्रसित हैं । पार्टर्ीीौर संगठन दोनों की जिम्मेवारी उनके कंधों पर है । ऐसी अवस्था में वे राष्ट्र को दिशा देने और नए संविधान के साथ संक्रमण काल को समाप्त करने में कितना सक्षम होंगे, इसका मूल्यांकन समय सापेक्ष्य है । दल के भीतर गुटबंदी इतना प्रबल है कि वे उदारतापर्ूवक अपना दायित्व किसी को देने की स्थिति में भी नहीं हैं । फिर उनकी स्वास्थ्य-अवस्था को देखते हुए दूसरे दल के नेताओं की आँख भी इस पद पर टिक गई है और अटकलों का बाजार गर्म होने लगा है । संभावना जहाँ-जहाँ आँकी जा रही है, उन्हें भी सुस्वस्थ नहीं कहा जा सकता । सवाल उठता है कि क्या हमारे देश का आगामी नेतृत्व बीमार हाथों में ही होगा – यह सच है कि उम्र के साथ व्याधियाँ आतीं हैं और इससे कोई भी अछूता नहीं रह सकता । मगर ऐसे समय में स्वयं को सक्रिय राजनीति से अलग रखने की प्रवृत्ति भी हमें विकसित करनी चाहिए अन्यथा लम्बे दौडÞ के लिए उन पर तो भरोसा नहीं ही किया जा सकता । आज जो परिस्थिति बन रही है उसमें स्पष्ट है यथाशीघ्र सरकार के नेतृत्व के लिए नेपाली काँग्रेस और एमाले जैसे दलों के भीतर तो महाभारत होगा ही ये दोनो पार्टियाँ भी कुरुक्षेत्र के मैदान में उतरेंगे । ऐसे में सहमति और सहकार्य का संतुलन निश्चित रूप से बिगडÞने की संभावना है । अब सवाल उठता है कि क्या यह राजनैतिक खींचतान ही हमारे देश की नियति है –
हाल ही में भारत में सम्पन्न सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में प्रचण्ड बहुमत से चुनाव जीते और प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी क्षेत्रीय स्तर पर पडÞोसी देशों के साथ सम्बन्धों के मामले में अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील दिखलाई दे रहे हैं और उन्होंने नेपाल भ्रमण की इच्छा भी जतलायी है । अब तक जो उनके काम-काज का अंदाज रहा है उससे स्पष्ट है कि वे पदाधिकारियों द्वारा तैयार किया गया पन्ना पढÞने वाले प्रधानमंत्री नहीं । इससे उनकी विदेश नीति पर ब्यूरोक्रेट्स का प्रभाव घटने की संभावना है । उनकी संभावित यात्रा की पृष्ठभूमि तैयार करने के क्रम में भारतीय विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज का नेपाल भ्रमण प्रस्तावित है । यह एक सच्चाई है कि नेपाल में भारत सबसे बडÞा निवेशकर्त्तर्ााै और भूटान तथा अफगानिस्तान जैसे देशों की तुलना में उसका निवेश नेपाल में काफी कम है । विकास का स्वप्न देख रहे नेपाल के लिए यह एक महत्वपर्ूण्ा अवसर है । लेकिन प्रधानमंत्री बीमार और विदेश में हैं तथा कार्यकारी प्रधानमंत्री के माथे पर महाधिवेशन और संगठन के आन्तरिक चुनाव का बोझ है । इस यात्रा को फलदायी बनाने के लिए पशुपति और जानकी मन्दिर के दर्शन के सिवा और क्या एजेण्डा होगा, इस पर सघन गृहकार्य की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास विवादित पर्ूवाग्रहों के सिवा और कुछ नहीं है, जबकि शपथ-ग्रहण समारोह के बाद  नेपाल के प्रधानमंत्री के साथ हुए द्विपक्षीय वार्त्तर्ााें उन्होंने स्पष्ट रूप से विकास-निर्माण के एजेण्डे के साथ आने की बात कही थी । लेकिन इस तरह की कोई कार्यनीति हमारे सामने नहीं है ।
एक बात तो यहाँ सक्रिय राजनैतिक दलों को समझना चाहिए कि शिक्षा और संचार माध्यमों के विकास के कारण उनकी चालों का निहितार्थ तो आमलोग समझ ही लेते हैं, इसलिए लोगों को गुमराह कर राजनैतिक रूप से वे अवसर प्राप्त भी करते हैं तो वह चिरस्थायी नहीं हो सकता । जनता सचेत और संवेदनशील है, वह तर्क और कर्ुतर्क को समझती है । यही कारण है कि किसी दल के प्रति उनकी चरम आस्था नहीं । इसके प्रमाण विगत के चुनाव परिणाम हैं । इसलिए देश को अगर संक्रमण से निकालना है तो नेपाल की राजनीति को संक्रमण से निकालना होगा । देशहित में नवीन और परम्परामुक्त मनोविज्ञान से नीतियाँ बनानी होगी । सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों पर राजनीति और सरकार को अग्रसर होना होगा अन्यथा राष्ट्र के संक्रमण रूपी आईने पर भले ही तत्काल धूल पडÞ जाए लेकिन कभी भी इसकी परत साफ हो सकती है और फिर इस तरह की स्थिति की सृजना हो सकती है जिसे हम ‘संक्रमणकाल’ कह सकते हैं । J

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