संघीय संविधान आवश्यक

रमेश झा: जब राजा ज्ञानेन्द्र ने संविधान की धारा १२७ के आधार पर सत्ताधिकार को अपने हाथों में लिया तो परिणाम यह हुआ कि सात राजनीतिक पार्टियाँ और माओवादी के बीच १२ सूत्रीय दिल्ली सम्झौता हुआ और ०६२-०६३ का संयुक्त जनान्दोलन सफल रहा । देश में संविधानसभा का मार्ग प्रशस्त हुआ । शान्ति स्थापना, राज्य पर्ुनर्संरचना, समावेशी राज्य व्यावस्था आदि समस्याओं का समाधानार्थ अन्तरिम संविधान और अन्तरिम सरकार का निर्माण हुआ ।
२०६४ माघ १ गते घोषित अन्तरिम संविधान में लोकतान्त्रिक जनआन्दोलन में सक्रिय सहयोग देने वाले मधेशी, जनजाति, महिला और अल्पसंख्यक की आशाओं की उपेक्षा करते देख, अस्तित्व को बोध कराने हेतु मधेशियों ने मधेश आन्दोलन का शंखनाद किया । मधेशियों के शंखनाद से पूरा नेपाल आन्दोलित हुआ । राज्यपक्ष और फोरम नेतृत्व बीच २२ सूत्रीय सहमति के बाद आन्दोलन मत्थर हो गया । पर आन्दोलन साम्य नहीं हुआ । तभी मधेशी पर्टियों के भीतर अस्तित्व खतरे में बोध करने वाले मधेशी नेतागण ने संयुक्त रूप में इस्तीफा देकर मधेश आन्दोलन को सक्रिय किया और संयुक्त मोर्चा बना कर एक बैनर के नीचे दूसरा मधेश आन्दोलन शुरु हुआ इसके बाद गिरिजा सरकार के साथ आठ सूत्रीय सहमति हर्ुइ संविधान सभा में सहभागी होने का निश्चय किया गया । परिणामस्वरुप पहली संविधानसभा में मधेशी तीन पार्टियाँ फोरम, तमलोपा और सद्भावना क्रमशः चौथे, पाँचवें और छठे शक्ति के रूप में आगे आई । लेकिन दूसरी संविधान सभा में मधेशी पार्टियाँ अपने-अपने सत्ता स्वार्थ के कारण इस हद तक धराशयी हो गई कि उनका नामोनिशान मिटने का खतरा बढÞ गया । नेपाली कांग्रेस, एमाले दोनों पार्टियाँ मधेश को सब तरह से नजरअन्दाज करते हुए आगे बढÞ रही है और बढÞती रहेगी । अतः मधेशवादी नेताओं को चाहिए कि अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थ भूलकर मधेशवादी एजेण्डाओं को सर्वोपरि मानते हुए एक हों औsambidhanर शासकीय स्वरूप में बदलाव लाने, संघीयता स्थापित करने तथा र्सवजन संवेद्य संविधान बनवाने की प्रक्रिया में क्षेत्रीय ऊर्जा प्रदान करें । तभी मधेशियों तथा मधेशवादी पार्टियों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है । नहीं तो सरकार में सम्मिलित नेपाली कांग्रेस, एमाले दोनों संघीयता को दरकिनार कर संविधान लागू करने की प्रक्रिया को गति प्रदान करने के लिए कमर कस रही हैं । फलस्वरुप नेपाली कांग्रेस के अर्थमन्त्री रामशरण महत और एमाले अध्यक्ष केपी ओली ने अपने-अपने अर्न्तर्मन के भावों को जगह-जगह पर व्यक्त भी किया है, जो बात प्रिन्ट मीडिया में भी पढÞने को मिल रहा है और जिसका विरोध संसद में फोरम नेपाल का अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने पूरजोर रूप में किया है । इस बात का विरोध एमाओवादी के साथ मोर्चाबन्दी करने वाले सभी मधेशवादी पार्टियों ने महत के वक्तव्य के बारे में सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है । महत की अभिव्यक्ति के विरोध में तमलोपा पार्टर्ीीे भातृ संगठनों ने महत के पुतले के जलाया । महत द्वारा अभिव्यक्त धारणा का विरोध मधेशी बुद्धिजीवियों ने भी किया है ।
संघीयता बिना संविधान हमें अमान्य है, यह बात संघीय लोकतान्त्रिक मोर्चा द्वारा व्यक्त किया जा चुका है । मोर्चा की बैठक के बाद सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने कहा कि संघीयता बिना संविधान किसी भी मूल्य पर स्वीकार्य नहीं है । मोर्चा ने महत-ओली की अभिव्यक्ति को स्पष्ट करने के लिए सत्तारुढÞ दलों से कहा है । बैठक में भावी रणनीति के बारे में विचार विमर्श हुआ । कांग्रेस, एमाले तथा सभामुख सहित प्रक्रिया अनुसार आगे बढÞने की पृष्ठभूमि में दलों और कार्यव्यवस्था समिति में इस सर्न्दर्भ में महत्वपर्ूण्ा छलफल होने वाला है । मधेशवादी पार्टियों ने चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि संघीयता की बात नहीं मिली और सरकार प्रक्रिया में जाने की बात करती रही तो हम सब संविधान सभा से ही बाहर हो जाएंगे । यदि सत्तारुढÞ दलों के द्वारा संघीयता को निष्प्राण बनाने का प्रयास किया गया तो संघीय मोर्चा सशक्त रुप में प्रतिरोध के लिए आगे आ सकती है । मोर्चा में पाँच मधेशी पार्टर्ीीएमाओवादी तथा अशोक र्राई की पार्टर्ीीहभागी है ।
मधेशवादी पार्टियों के युवा नेता तथा बुद्धिजीवियों ने संविधान में संघीयता तथा मधेश के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक तीसरा मधेश आन्दोलन करने का विकल्प नहीं है । यह निश्चित है कि मधेश में वर्तमान मधेशी नेतृत्व करने वाले नेताओं में आन्दोलन करने की क्षमता नहीं है । इसके लिए युवा वर्ग को नेतृत्व लेना होगा । युवा वर्ग को भी चाहिए कि सभी वर्गो, विचारों तथा क्षेत्रों को समेटते हुए प्रभावकारी अग्रसरता दिखाएं । इस पक्ष में फोरम लोकतान्त्रिक के युवा नेता कपिलेश्वर यादव ने कहा कि मधेशी पार्टियों के युवा नेता लोग सूझ-बूझ के साथ आगे नहीं बढेÞ तो मधेशी राजनीति मंे और भी विषम समस्या आने वाली है । राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टर्ीीे प्रवक्ता तथा युवा नेता केशव झा ने मधेशी वर्तमान नेतृत्व पर आरोप लगाते हुए कहा है कि संघीयता सहित नये संविधान के कई विषयों पर मधेशियों को वाईपास किया जा रहा है । फिर मधेशी नेतृत्व वर्ग मौन है । इसी क्रम में मधेशी बुद्धिजीवी तुलानारायण साह ने कहा कि सत्तारुढÞ पार्टियाँ प्रक्रियाजन्य करके मधेशी तथा एमाओवादी को डÞरा रही है । और उनका यह भी कहना था कि कांग्रेस, एमाले प्रक्रिया अनुरूप संघीयता सहित विवादित विषयों का समाधान करेंगे । उन्होंने यह भी कहा कि सभी प्रमुख दलों के साथ साथ वर्तमान मधेशी नेतृत्व के प्रति असन्तुष्ट युवा वर्ग ही आन्दोलन का नेतृत्व करेगा । वामबुद्धिजीवी खगेन्द्र संग्रौला ने कहा कि एमाओवादी में आए ह्रास के कारण परिवर्तनकारी शक्तियाँ दिग्भ्रमित हो गई हैं । उन्होंने मधेशी युवाओं को सचेत होकर आगे बढÞने को कहा । लेखक उज्ज्वल प्रर्साई ने तो यहाँ तक कहा कि प्रशासनिक संघीयता का लाँलीपाँप दिखा कर सत्तारुढ प्रमुख दल मधेश में अधिक विशेष समस्या सृजित कर रहे हैं ।
६ दशकों से संघीयता मधेशी राजनीति की केन्द्रीय मांग रही है । पर सत्तारुढÞ दल ने कभी इसके प्रति ध्यान नहीं दिया । आगामी संविधान निर्माण के सारथियों को मधेशियों के भीतर जो वेदना है, उसे समझना ही होगा । किसी भी वर्ग के लिए राजनीतिक स्थायित्व महत्वपर्ूण्ा है । सत्तारुढÞ दलों को भी चाहिए कि क्षेत्रीय संकर्ीण्ाता से ऊपर उठकर मधेशियों में व्याप्त त्रास को अन्त करें । ऐसा न होने पर अन्ततः नई ऊर्जा के साथ मधेशी युवा वर्ग के लिए आन्दोलन करना उनकी नियति बन जाएगी । यदि ऐसा हुआ तो इसका दुष्पपरिणाम सत्तारुढÞ दलों के साथ सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता को सहने के लिए बाध्य होना पडÞेगा । अतः आने वाले संविधान में संघीयता के साथ समानुपातिक संवैधानिक प्रतिनिधित्व की प्रतिवद्धता होनी चाहिए ।

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