संपादकीय

संवैधानिक संसद बनने के बाद नेपाली जनता ने लम्बी साँस ली थी। उसे लगने लगा था कि अब नेपाली राजनीतिज्ञ सांसद लोग संविधान निर्माण कर नेपाली जनता में व्याप्त भय, अशिक्षा, गरीबी, अशान्ति तथा परमुखापेक्षी अवस्था आदि को हटाकर नेपाल और नेपाली जनता को प्रगति पथ पर लेजाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। पर साढे तीन वर्षके संवैधानिक अभ्यास के वाद भी परिणाम शून्य ही रहा। निश्चय ही इस बीच छोटे-बडे सभी राजनीतिक दल अपने-अपने अन्तरकलह में ही फँसकर रह गया है। दलों के बीच विद्यमान द्वन्द्व और वैचारिक विभेद का प्रतिनिधित्व न करने की एवं हम किसी से कम नहीं जैसी अहंकारी परम्परा संक्रमणकालीन नेपाल के लोकतन्त्र के भविष्य के  लिए अत्मघाती नहीं हो रहा है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है।
लोकतन्त्रिक परम्परा में विचार, विवाद, मतमतान्तर होना कोई बुरी बात नहीं, दार्शनिक सिद्धान्त भी है कि ‘वादे-वादे जायते तत्वबोध’। अर्थात आपसी विवादों और मत भिन्नताओं को दर्ीघकालीन राष्ट्रीय हित को देखते हुए एक निश्चित आधारविन्दु पर विवेकपर्ूण्ा बहस करके निर्ण्र्ाालेना अच्छी बात है। पर जब से नेपाल में लोक तन्त्रात्मक पद्धति शुरु हर्ुइ तभी से कोई भी संधिसम्झौता, योजना, धर्म निरपेक्षता सम्बन्धी निर्ण्र्ााअथवा सत्ता परिवर्तन सब के सब आग्रह, पर्ूवाग्रह, लेनदेन, व्यक्तिगत स्वार्थ आदि जैसे अलोकतान्त्रिक मूल्यमान्यता के अनुरुप हुआ है। नेपाली राजनीति को दिशाबोध करानेवाले राजनेताओं में व्यक्तिवादी सर्वोच्च सोच एवं अहमन्यता के कारण लोकतन्त्र मजबूत नहीं हो पाई है।
निर्धारित समय के भीतर संविान न पाने के कारण राजनीतिक दलों और महत्वांकांक्षी नेताओं के प्रति अविश्वास बढना स्वाभाविक है। इसी का प्रतिफल है कि सर्वोच्च का यह निर्ण्र्ााकि अंतिम बार ६ महीने के भीतर संविधान आना चाहिए, अन्यथा संविधान सभा स्वतः विघटित हो जाएगी। सर्वोच्चका यह निर्ण्र्ाासुनकर जनता प्रफुलित हो गई। कारण सर्वोच्च ने जनता की भाषा बोल दी है। पर सांसद लोगे दुःखी हैं। प्रधानमन्त्री भट्टर्राई एवं सभामुख नेबांङ द्वारा दिया गया संयुक्त निवेदन को दर्ता किए बिना खारिज कर दिया, जिसकी सभी ओर आलोचना हो रही है। सर्वोच्च के इस व्यवहार से राज्य के प्रमुख अंगों -व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) में टकराहट शुरु हो गई है। सभासदों की मान्यता जो भी हो, संघीय लोकतान्त्र को संस्थागत करने के क्रम में यह न्यायिक निर्ण्र्ाानिश्चय ही शान्ति और संविधान निर्माण को प्रभावित कर सकता है।
मधेशियों को सेना में भर्ना के सम्बन्ध में स्वनामधन्य कतिपय नेपाली लोगों, पत्रकारिता जगत से नाता रखने वाले कतिपय पत्रकार बन्धुओं द्वारा व्यक्त विचारों को पढने से लगता है कि कुछ व्यक्ति पर्ूण्ा रुप से पर्ूवाग्रही और मानसिक रुप से रोगी हैं।
संसद में सदस्यों द्वारा समय-समय पर कर्ुर्सर्ीीmेंकते, माइक तोडÞते अर्थमन्त्री का ब्रीफकेश तोडÞते हुए देखा गया, कोई, कभी दण्डित नहीं हुआ। किन्त संसद सदस्य संजय साह द्वारा अपने क्षेत्रीय ज्वलन्त समस्याओं के बारे में बोलने के लिए बार-बार समय माँगने पर भी समय नहीं दिया गया तो साह गुस्से में खडेÞ हो बोलते समय हाथ से लगकर माइक गिर कर टूट गया। तर्सथ साह को १० दिन के लिए निलम्बन और माईक क्षतिपर्ूर्ति देने जैसा दण्ड निर्धारित संसद में भी मधेशी प्रति भेद भाव हो सकता है, इस बात को प्रमाणित करना दुःख की बात है।

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