संपादकीय

०६२/६३ जनान्दोलन के बाद प्रत्येक जनता की अभिलाषा थी कि अब देश में अहिंसा से प्रेरित शान्तिपर्ूण्ा समाज की स्थापना होगी, प्रजातान्त्र भी मजबूती होगी तथा जनता के प्रतिनिधि के द्वारा नयाँ संविधान निर्माण होगा और समग्र आर्थिक क्रान्ति की धूम मचेगी। पर सती के शाप और सांसदों की अदूरदर्शी सत्तामुखी राजनीति के चक्रव्यूह में फँसकर नेपाली जनता की मनोगत अभिलाषा लावारिस बनकर छटपटा रही है। शान्ति प्रक्रिया अबरुद्ध हो गई है। देश में जनप्रतिनिधियों के संविधान द्वारा जनता के आकांक्षा का उपहास किया जा रहा है। देश की शासन व्यवस्था अस्तव्यस्त हो गई है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी के कारण आम जनता त्राही-त्राही तो कर ही रही है, देश के मेरुदण्ड कहे जाने वाले लाखों युवा वर्ग की असीमित शक्तियाँ विदेशों में जाकर प्रवाहित होने को बाध्य है। औद्योगिक जगत की अवस्था चिन्ताजनक है। देश में संविधानसभा के सदस्यों में व्याप्त सत्ता लिप्सा राष्ट्रियता की कमी और अकर्मण्यता के कारण संविधान निर्माण की समय सीमा बार-बार बर्ढाई जा रही फिर भी नेपाल में नयाँ संविधान के निकट भविष्य में बनने की संभावना संदिग्ध ही है। संविधान के अभाव में सरकारी क्षेत्र लूटतन्त्र रुपी भ्रष्टाचार से आकुण्ठ डुबा है और इसके दुष्प्रभाव से जनता का दैनिक जीवन लुंज-पुंज हो बैठा जा रहा है।
संविधान के अभाव, सामाजिक जागरुकता की कमी तथा राजनीतिक इमान्दारिता की कमी के कारण विगत चार-पाँच वर्षो में किसी को सुनहरा भविष्य मिला है तो संविधानसभा के ६०१ सदस्यों तथा राजनीतिक पार्टियों को। भ्रष्टाचार के दल-दल में फँसी नेपाल की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने के लिए नेपाल में भी एक अन्ना की जरुरत है। भारत में चल रहे भ्रष्टाचार निवारण आन्दोलन जैसे नेपाल में भी किसी न किसी को शुरुवात करनी होगी। नेपाल हमेशा से वीरता और इमान्दारिता का देश रहा है, पर आजकल हमारी बहादुरी को भ्रष्टाचार तन्त्र ने इस तरह आवृत्त कर दिया है कि समाज के किसी भी वर्ग से कोई भी व्यक्ति भ्रष्टाचार निवारण के लिए आगे नहीं आ रहा है। यहा तक की भ्रष्टाचार के खिलाफ जाँच के लिए र्सवाधिकार प्राप्त संस्था भी भ्रष्टाचार में इस कदर व्याप्त है कि उसने निष्पक्षतापर्ूवक जाँच की आशा करना ही मर्ुखता होगी। सुडान घोटाला, पुरातात्विक महत्व वाले हथियार बिक्री घोटाले आदि का मामला उजागर हुआ है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को निर्मूल करने के अभियान की शुरुआत राजनीतिक नेतृत्व तथा सचेत नागरिकों के द्वारा होनी चाहिए। स्वच्छ, निष्कलंक व्यवहार, योजना की पारदर्शिता, उच्च पदस्थ पदाधिकारियों द्वारा हस्तक्षेप मुक्त वातावराण यदि होता है तो भ्रष्टाचारी वर्ग स्वयं सचेत होगा। इसके लिए भारत की जनता जैसे सचेत और जागरुक बनना आवश्यक है।

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