“ संबैधानिक कानून तो होगा ! मगर इसमे मताधिकार नहीं होगा !! ,,

अाषाढ २९ गते
 सर्व देव ओझा
“ संबैधानिक कानून तो होगा ! मगर इसमे मताधिकार नहीं होगा !! ,, (सन्दर्भ ; जिल्ला समन्वय समिति निर्वाचन का )
नेपाल का संबिधान २०७२ जब से जारी हुआ तभी से ये सम्बिधान जनचाहना एवम जनाकान्छा की भावना विपरीत है इस बात का बिभिन्न राजनितिक दलों , समुदायों , संघ संस्थाअाें और अन्तराष्ट्रीय समुदायों द्वारा विरोध किया जाता रहा है ! अभी भी कितनो दिनों तक इस सम्बिधान में किये गए प्रावधानों की गलतियाँ दैनिक ज्यों ज्यों आगे बढ़ते जायेंगे त्यों त्यों परत दर परत खुलती जायेंगी और इसकी कोई अभी सीमा भी नहीं दिखाई दे रही है ! वैसे भी मै कोई संबैधानिक विद व संबैधानिक व्याख्याकार व विश्लेषक तो नहीं हुँ , फिर भी मेरे अपने विचार और मेरा अपना लेखन शैली शायद इसके लिए स्वतन्त्र  है कि समय समय में इस सम्बिधान में हुए अधिकान्श कमियों और गल्तियों में से कुछ हद तक यहाँ के राजनीतिक पार्टियों , राजनीतिक कर्मियों तथा जनमानस और देश के कुछ कानून विद , विश्लेषको एव संचार माध्यमों के मार्फ़त आप लोगों तक पहुचाने का प्रयास जरुर करे ! वैसे मैंने इस सम्बिधान के जारी पूर्व संध्या से लेकर संबिधान जारी होने तक और जारी हुए सम्बिधान के विभिन्न व्यवस्थाओ , कानूनी अधिकारों में किये गए असमानताओ और विभेदों के बारे में अपने फेस बुक , ट्यूटर , और विभिन्न पत्र पत्रिकाओ के माध्यम से  अपना विरोध तथा समय रहते इसमे सुधार करने के उद्देश्य से समय में इसके विभिन्न पहलूओ पर अपना विचार देता रहा हूँ! अभी हाल में ही मैंने इस सम्बिधान में हुए कानूनी व्यवस्था में शपथ ग्रहण करने और करवाने के ऊपर अपनी जिज्ञासा सहित प्रश्वाचक चिन्ह लगाया था लेकिन शायद उसका मुझे कोई सही सकारात्मक जबाब से मेरी जिज्ञासा का समाधान किसी मित्र से नहीं प्राप्त हुआ ! ऐसे बहुत से प्रश्न और कमियों से भरपूर रहा ये नेपाल का सम्बिधान २०७२ में आज पुनः   बढ़ रहे कार्यान्वयन प्रकिया में एक नई व्यवस्था और उसके कानूनी व्याख्या के अपवाद की कमी को अपनी जिज्ञासा समझ कर यहाँ के बुद्धिजीवी , कानून ज्ञाता , विश्लेषक , और राजनितिक कर्मीयो के बीच लाने का एक छोटा प्रयास फिर से है । शायद समय में सलाह और इसका उपाय निकला जा सके यही मेरा प्रयास होगा ! आज मै देश में जबरजस्त रूप से संचालित स्थानीय निर्वाचन के प्रथम चरण और दूसरे चरण के पश्चात् तयारी में रहे तीसरे चरण के स्थानीय निर्वाचन को सरकार अपने बहुबल और अपनी सरकारी मेशिनरी के सदुपयोग से शायद असोज २ गते तक किसी भी रूप में सम्पन्न करा ही लेगी ! फिर भी मेरी जिज्ञासा और प्रश्न इसी से थोडा हट के मगर इसी में अन्तर्निहित है ! अब दो चरणों के स्थानीय निर्वाचन के बाद सामने आ खडी है संघियता के मर्म और भावना के सिद्धान्तों के विपरीत और नेपाल के सम्बिधान २०७२ के धारा ५६ के राज्य को संरचना में हुए तीन तह के सरकार में स्थानिय तह में ही एक साैतेला बच्चा भी अपना एक अलग हक़ जमाये हुए बैठ गया है ओ है धारा ५६(४) में जिल्ला सभा का व्यवस्था ! यहाँ भी नहीं थका तो फिर इसी संबिधान के धारा २२० में विना कोई अधीर सूची का जिल्ला सभा र जिल्ला समन्वय समिति का भी बीजारोपण भी हुआ है ! अब जिल्ला सभा र जिल्ला समन्वय समिति के आगे होने वाले निर्वाचन और इसके प्रक्रिया में जरा गौर से देखे और विश्लेषण करे ? यही पर मेरा एक बहुत बड़ा जिज्ञासा और प्रश्न भी खड़ा हुआ ! देश का सबसे बड़ा मूल कानून सम्बिधान होता है यहाँ इसी के अधीन जन्म हुआ ऐन बड़ा दिखाई दिया है हो सका इसके बात ऐन से भी बड़ा नियमावली हो जाय ? क्या पता कुछ दिन पश्चात् इस नियमावली से बड़ा मंत्रिपरिषद का कोई निर्णय व मन्त्रालय का कोई परिपत्र व निर्देशन ही कामयाब हो जाय ! यहाँ कोई असंभव नहीं है ? अब इसी पर मेरी जिज्ञासा है की इसे कानूनी भूल कहे की सम्बैधानिक त्रुटि या गल्ती ? जरा अब नीचे गौर करे ! नेपाल के संबिधान और इसी के आधीन बने कानून को दोनों एक साथ देखे तो पता यही लगता है की “ संबैधानिक कानून तो होगा ! मगर इसमे जन अधिकार नहीं होगा !! ,, यहाँ नीचे जरा ध्यानपूर्वक गौर करे ? ( यह नेपाली भाषा में ही जैसे का तैसा है ) …. (1) संविधानको धारा २२०(१)मा जिल्ला सभा र जिल्ला समन्वय समितिको व्यवस्था , और (2) संविधानको धारा २२०(२) जिल्ला सभामा जिल्ला भित्रका गाउ कार्यपालिका अध्यक्ष र उपाध्यक्ष तथा नगर कार्यपालिका प्रमुख र उपप्रमुख सदस्य रहनेछन ! (3) संविधानको धारा २२०(४) सम्बन्धित जिल्ला भित्रको गाउ सभा वा नगर सभाको सदस्य जिल्ला समन्वय समितिको प्रमुख , उपप्रमुख वा सदस्य पदको उम्मेदवार हुन् योग्य हुनेछ ! जिल्ला समन्वय समितिको प्रमुख , उपप्रमुख वा सदस्य पदमा निर्वाचित भएमा त्यस्तो व्यक्तिको गाउ सभा वा नगर सभाको सदस्य पद स्वतः रिक्त हुनेछ ! अब इस संबिधान के धारा २२०(४) में बिधिवत सम्बन्धित जिला अन्तर्गत गाउ सभा वा नगर सभा के सदस्य ही जिला समन्वय समिति के प्रमुख , उपप्रमुख वा सदस्य पद के लिए योग्य उम्मेदवार हो सकते है ! अब इसके बाद फिर यहाँ स्थानीय तहको निर्वाचन सम्बन्धी व्यवस्था गर्न बनेको ऐन २०७३ का व्यवस्था देखे ? ( यह नेपाली भाषा में ही जैसे का तैसा उतार है ) …. (१) दफा २ को परिभाषामा उल्लेख गरिएको छ र त्यसको उप दफा (ड) मा जिला समन्वय समितिको मतदाता भन्ने व्याख्यामा उप दफा ४ मा जिल्ला समन्वय समितिको प्रमुख , उप प्रमुख र सदस्यको लागी प्रमुख , उपप्रमुख , अध्यक्ष र उपाध्यक्ष ! (२) दफा २ को उप दफा (न) मा “सदस्य ,, भन्नाले गाऊपालिका , नगरपालिकाको वडा सदस्य तथा गाऊपालिका , नगरपालिकाको वडा सदस्य सम्झनु पर्छ र सो शब्दले अध्यक्ष , उपाध्यक्ष , प्रमुख , उपप्रमुख र वडा अध्याक्षलाई समेत जनाउछ ! (३) दफा ६ को निर्वाचन प्रणाली को उप दफा ६(५) मा जिल्ला समन्वय समितिको लागी सम्बन्धित जिल्ला सभाका सदस्यले सम्बन्धित जिल्ला भित्रको गाउ सभा वा नगर सभाको सदस्यहरू मध्येबाट एक जना प्रमुख , एक जना उप प्रमुख , कम्तीमा तीन जना महिला र कम्तीमा एक जना दलित वा अल्पसंख्यक समुदायका व्यक्तीलाई निर्वाचित गर्ने छ ! (४) दफा १७ मा “ उम्मेदवारको मनोनयन ,, मा दफा १७(२)मा एक जना प्रस्तावक र एक जना समर्थकको समेत व्यवस्था अनिवार्य गरिएको छ र त्यसैको दफा १७(२) को (१)(घ) मा जिल्ला समन्वय समितिको प्रमुख , उप पप्रमुख र सदस्यको लागी सम्बन्धित जिल्ला सभाको सदस्य, !
अब देखें ऊपर के दोनों कानूनों में अर्थात नेपाल के संबिधान २०७२ ने धारा २२०(४) में सम्बन्धित जिले के गाँव सभा वा नगर सभा के सभी सदस्य को जिल्ला समन्वय समिति के प्रमुख , उपप्रमुख और सदस्य पदो के लिए योग्य उम्मीदवार कहा है ! ठीक इसके विपरीत “ स्थानीय तहको निर्वाचन सम्बन्धी व्यवस्था गर्न बनेको ऐन २०७३ ,, के दफा २ में सदस्यों को उप दफा (ड) में मतदाता होने से बाहर रख दिया है और इन्ही सदस्यों को फिर उम्मेदवार होने के लिए योग्य मानकर मनोनयन पत्र के दफा १७(२) में प्रस्तावक और समर्थक होने को भी स्वविकार किया है ! और उप दफा ४ मा जिल्ला समन्वय समितिको प्रमुख , उप प्रमुख र सदस्य का मतदाता के रूप में केवल प्रमुख , उपप्रमुख और अध्यक्ष , उपाध्यक्ष को ही अधिकार प्रदान किया गया है ! और यही व्याख्या पुनः इसी कानून के दफा ६(५) में निर्वाचन प्रणाली में भी स्पष्ट व्याख्या भी किया गया है ! अब भला सोचे यहाँ सभा के सदस्य के रूप में सभी वडा अध्यक्ष तक को सदस्य का मर्यादा दिया गया है , नेताओ और पार्टियों की गुलाम बंदी कायम रखते हुए उन सदस्यों में से जिल्ला समन्वय समिति के प्रमुख , उपप्रमुख और सदस्य पदो उम्मेदवार भी बनाने का प्रावधान किया गया है लेकिन ये सभा के सदस्य वा सभी वडा के अध्यक्ष गण देश की आज के नेताओ और पार्टियों की गुलामी और नियन्त्रण से कही बाहर न भागने पावे इसी लिए ही इन सभी को मतदाता और मताधिकार से बाहर कर दिया गया ! जो की सर्वथा विश्व सर्वमान्य कानून विपरीत ही नहीं इस संबिधान के भावना और उनके अधिकारों को कुंठित किया गया है साथ ही मौलिक हक़ और कर्तव्यों से भी बंचित रखने का एक बहुत बड़ा संयन्त्र और घात भी है ! इसी लिए आज के शीर्षक के शुरू में ही मैंने लिखा है “ संबैधानिक कानून तो होगा ! मगर इसमे जन अधिकार नहीं होगा !! ,, सभी शुभ चिन्तक मित्रों को जो समय अनुकूल हो रहे गलतियों के प्रति सम्बंधित निकायों तथा मुझे भी सकारात्मक और सुधारात्मक रूप उचित सल्लाह प्रदान करे !
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