संभालना होगा हमें अपनी विरासत को

डा. प्रीत अरोडा: भारत एक मात्र ऐसा देश है जहाँ पर संस्कृति, सभ्यता और जातिर्-धर्म के लोग रहते हैं जिनकी भाषा, खान -पान, रीति-रिवाज इत्यादि अलग-अलग हैं । इसलिए हमारे पर्ूवजों द्वारा विरासत के रूप में मिली हर्ुइ संस्कृति व सभ्यता उन्नत व समृद्ध है । जहाँ आज विश्व के विकासशील देशों की अग्रिम पंक्ति में भारत का नाम लिया जाता है, वहां आधुनिकता की दौडÞ में हम पश्चिमी देशों की संस्कृति व सभ्यता को अपनाने के कारण अपनी विरासत में मिली भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को नकारते जा रहे हैं । परिणामस्वरूप समाज और देश को आए दिन नईर्-नई समस्याओं और घटनाओं से जूझना पडÞ रहा है । भारतीय इतिहास गवाह है कि हमारे देश के समाज सुधारकों और वीरों ने मातृभूमि प्रेम की खातिर अपना र्सवस्व न्यौछावर करते हुए प्रेम, दया, सद्भावना इत्यादि का संदेश अन्य देशों में भी पहुँचाया । परन्तु दुख की बात है कि आज हम अपनी परम्पराओं व मान्यताओं को र्सवथा भूलाकर पाश्चात्य संस्कृति व सभ्यता की ओर खींचे चले जा रहे हैं । इन सभी परिस्थितियों के पीछे हम और हमारी मानसिकता जिम्मेदार है । मानसिकता के कारण समाज में दुराचार, व्यभिचार व अपराध दिन-प्रतिदिन बढÞ रहे हैं । हमें आए दिन अखबारों से लेकर टी.वी. चैनलों तक हत्या, छेडÞछाडÞ, चोरी, डकैती, बलात्कार व किडनैपिंग इत्यादि जैसी घिनौनी वारदातें पढÞने, सुनने व देखने को मिलती हैं । आज व्यक्ति घर में और बाहर किसी भी कार्यक्षेत्र में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करता ।
पैसा, शोहरत, मान -सम्मान के लिए व्यक्ति अन्धाधुन्ध अपनी ही जडÞों को काटे जा रहा है । सच तो यह है कि हमें किसी सामाजिक संस्था द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘वीर है देश जवानों का’ या ‘ऐ मेरे वतन के लोगों !’ इत्यादि देशभक्ति की धुन सुनने के लिए वहाँ युवार्-वर्ग की बात तो छोडÞो, प्रौढÞ और वृद्धों की उपस्थिति भी न के बराबर दिखती है जबकि इसके विपरीत हमें क्लबों, पार्टियों में आज के बेसिर पैर आइटम गानों की धुन पर युवाओं के साथ-साथ अधेडÞ उम्र के लोगों की थिरकती हर्ुइ एक अच्छी खासी भीडÞ नजर आ जाएगी । आज न तो हम संस्कारों का पालन स्वयं कर रहे हैं और न ही अपनी नई पौध को अच्छे संस्कारों से सींचना चाहते हैं । चूंकि हमारा धर्म वर् इमान सिर्फऔर सिर्फअंधाधुंध पैसा कमाकर ऐशो-आराम भरी जिन्दगी जीना है । आज घिनौनी वारदातों द्वारा हम मानवता को लहूलुहान करके अपनी विरासत की आहुति दे रहे हैं । मैं मानती हूँ परिवर्तन प्रत्येक युग की माँग है पर अगर परिवर्तन ही हमारी जडोँ को खोखला करके तहस-नहस करने लगे तो वैसा परिवर्तन भी किसी काम का नहीं । पुरातनता में नवीनता का संगम उस हद तक ठीक रहता है, जहाँ तक वह हमारी विरासत में मिली सामाजिक व साँस्कृतिक धरोहर को सिरे से खारिज न करे । आज सबसे आवश्यकता है कि हम अपनी भाषा, रीति-रिवाज, खान-पान, त्योहार आदि की गारिमा को बनाए रखें । ये परिवार और समाज का पहला कर्तव्य बनता है कि हम अपने देश के सुखद भविष्य के लिए सभ्य व सुसंस्कृत बनाने वाली नैतिक एवं मानवीय मूल्यों को संजोकर रखें । तभी एक समृद्ध और सुखी समाज की परिकल्पना होगी और हमारी विरासत में मिली संस्कृति व सभ्यता जीवित रह सकेगी ।

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