संयोग-वियोग

प्रमोद कुमार पाण्डेय:उन दिनों की वात है जब पृथ्वी पितृस्नेह से वंचित परन्तु मातृ स्नेहरूपी सागर मे प्रफुल्लित मीन के सदृश तैर रहा था। उसे लगता था कि यही वात्सल्य-पे्रम का सागर उसके जीवन का आदि और अंत था। वाल्यावस्था से किशोरावस्था के प्रथम चरण तक तो सबकुछ ठीक-ठाक रहा, परन्तु किशोरावस्था के ऊत्तर्रार्द्ध मंे अचानक एक अप्सरा के सौर्न्दर्य और आकर्षा ने उसे पे्रम के सागर मे अवगाहन करने को मजबूर कर दिया।
साँवला रंग-रूप, विशाल छाती, नवोदित पतली मूँछे, बडÞी-बडÞी आँखे, धन्वाकार भौहें, लम्बा कद, माँसल शरीर और अधरों पर मुस्कान लिए पृथ्वी का रोज अपने कर्तव्य का वहन करने महाविद्यालय समय से पहुँचना, पढÞना और अपने गन्तव्य स्थल की तरफ मुखातिब होना भास्कर के उदय और अस्त होने की दैनिक गति के समान चिरंतन सत्य था। महाविद्यालय मे लडÞकियाँ भी संख्यात्मक एवं गुणात्मक दृष्टिकोण से समतुल्य थीं। लडÞकों की टोली लडÞकियों पर ऐसे फब्तियाँ कसती थी मानो उनके लिए सदैव वासन्तिक होली का ही समय हो। पृथ्वी इन कार्यकलापों से कन्नी काटते हुए अपनी डफली अकेले ही बजाने का प्रयत्न करता था और शायद इसीलिए उसके सहपाठी उसे ‘योगी’ कहकर चिढÞाते थे। कुछ लडकियाँ भी उसे घमंडी होने का चोला पहना चुकी थीं। भले ही ऊपर से कुछ लडÞकियाँ फब्तियों का विरोध करते हुए महाविद्यालय का दरवाजा खट-खटाती थीं ताकि लडÞकों को दण्डित करवाकर उन्हे आचरणशील, अनुशासित, कर्तव्यपरायण, लगनशील छात्रा होने का अघोषित प्रमाण-पत्र प्राप्त हो सके। वस्तुतः वे भी इन फब्तियों का मजा खूब लूटती थीं। कभी-कभी तो उनकी तरफ से भी कटाक्ष-वाणों की वषर्ा होती थीं, जिससे कई छात्र घायल हो चुके थे। फिर उभयपक्षीय ठहाकों से सारा बगीचा गुंजायमान हो जाता था। पृथ्वी भी द्विपक्षीय वार्तालापों को सुनकर आहृलादित हो उठता था। जाने क्यों वह स्वयं तो कुछ बोलने से परहेज करता पर कुछ सुनने को सदैव आतुर रहता था। उसके अर्न्तर्मन को समझना किसी मनोवैज्ञानिक के अतिरिक्त अन्य के लिए दुष्कर कार्य था।
मध्यान्ह का समय था। चिलचिलाती धूप अपनी प्रचंडता का प्रमाण देने के लिए आतुर थी। परन्तु पेडÞों पर बैठे पंक्षियों का कर्ण्र्ाा्रय कलरव और पछुआ पवन की मन्दगति से शरीर का र्स्पर्श करना पृथ्वी के लिए र्स्वर्ग के आनन्द से कम न था। रुमाल से चेहरा पोंछते हुए वह महाविद्यालय के उत्तर में अवस्थित बगीचे मे चहलकदमी कर रहा था कि अचानक एक अप्सरा को सामने देखकर उसके पैर ठिठक गए। उसे लगा मानो शशि ने आकाश को परित्यक्त कर पृथ्वी से निकाह करने का फैसला कर लिया हो। वह इस अप्सरा का नाम एवं पता तो नहीं जानता था पर लगता था कि कोई अदृश्य आकर्षाशक्ति उसे आकषिर्त कर रही हो। गौरवर्ण्र्ाालम्बा डील-डौल, शुक-नासिका, पतली कमर, रक्ताभ सेव तुल्य कपोल जिसपर छोटा सा काला तिल, मोती सरीखे दाँत एवं गोल उन्नत वक्षस्थलयुक्त उस मीनाक्षी के नेत्रवाण ने पृथ्वी के दिल मंे ऐसे प्रवेश किया जैसे किसी भटकती आत्मा ने मनोवांछित शरीर प्राप्त कर लिया हो।
उस नवागन्तुक लडÞकी के बारे मे जानने के लिए उन लडÞकियों से भी उसने सर्ंपर्क किया, जिन्हें वह कभी घास भी नहीं डÞालता था। उसके इस अन्वेषण का लडÞकियों ने भी खूब मजाक उडÞाया। पृथ्वी को लगा कि इस पहाडÞ को खोदने से चुहिया के सिवाय कुछ नहीं निकलने वाली। अन्ततोगत्वा उसे अपनी मित्र-मंडली के आगे घुटने टेकने पर मजबूर होना पडÞा। मित्र मंडली की ओर से अगले हीं दिन उस मृगनयनी का संपर्ूण्ा विवरण उसके सामने प्रस्तुत हुआ।
“शशि” ! नाम पढÞकर वह चौंक उठा। उसके चंचल मन ने उसे इसी उपमा से तो नवाजा था। वह तो शशि से भी सुन्दर और रवि से भी उज्ज्वल थी। अचानक उसे एक कविता याद आ गई।
“उत्सुक होकर शिशु ने पूछा, माँ क्या होगा उसके वाद –
रवि से उज्ज्वल शशि से सुन्दर वधू तुम्हारे घर आएगी
उस विवाह उत्सव के वाद।”
अब तो रोज पृथ्वी अपने आपको उस शशि रूपी रवि की परिक्रमा करने से रोक नहीं पाता था। उसकी मित्र-मंडली के अन्य ग्रह भी उसका साथ बखूबी निभाते थे। शायद आग दोनों तरफ लगी थी। मिलने की ललक दोनों में थी। तभी तो उनका दैनिक मिलन बिंदु बगीचा बना और इसके साक्षी दोनों तरफ की मित्रमण्डली। शशि का सरल, सुसंस्कृत एवं सुशील स्वभाव तो उसके दिल पर राज करने लगा। उस लडÞकी के लिए पृथ्वी उसका प्राणनाथ बन चुका था। इस अनुभूति का इजहार करना दोनों की सोच में लोहे का चना चबाने के समान था। शशि का स्वभाव और पृथ्वी की ओर उसका झुकाव कुछ लडÞकियों को खटकता भी था। दोनों ही मानसिक रूप से मानसरोवर में जल-क्रीडÞा का आनन्द दो हंसो के जोडÞे के समान ले रहे थे। यह सिलसिला मूक संकेत के रूप में चलते हुए एक दिन अचानक दिल का दरवाजा तोडÞकर उभय ओष्ठों के प्रयास से आखिर कानों तक पहुँच ही गया। एकान्तपर्ूण्ा वातावरण ने दोनों को आलिंगनवद्ध होने के लिए प्रोत्साहित कर दिया। सर से पाँव तक दोनों झंकृत हो उठे मानो किसी सर्ुकर्म के परिणामस्वरूप जीव का व्रहृम से मिलन हो गया। तथापि भविष्य में एक दूसरे का होकर रहने की भीष्म प्रतिज्ञा के साथ न चाहते हुए भी जुदा होना पडÞा।
द्वय माताश्री मेरी बात मानकर शायद शशि को अपना बना लेंगे, इसी कामना के साथ पृथ्वी सिर पर पाँव रखकर घर भागा। छुक-छुक करती हर्ुइ टे्रन सरपट दौडÞ रही थी परन्तु वह इसकी गति से कदापि संतुष्ट नहीं था। काश, वह ड्राइवर होता तो टे्रन को दौडÞाकर नहीं वरन् उडÞाकर अपने घर तक ले जाता। घर पहुँचते ही अपनी बातें उसने रखीं और माता द्वय ने इसे शिरोधार्य कर लिया। यह शुभ संदेश तो वह कबूतर बनकर अपनी पे्रयसी एवं मित्रों को शीघ्रातिशीघ्र बताना चाहता था।
महाविद्यालय पहुँचकर मित्र मंडली को ढूँढने के लिए, उसने आकाश पाताल एक कर दिया। अंततोगत्वा उसने उन्हें उसी बगीचे में पाया। बडÞे गर्व और उत्कंठा से इस सुखद संदेश को सुनाकर वह इसमें चार चाँद लगवाना चाहता था। मगर यह क्या, लगता था उन्हें साँप सँूंघ गया हो – सबके सब वैसे ही चुप थे जैसे अर्थी निकलते समय पडÞोसी और ग्रामीण।
पृथ्वी ने एक साँस में डाँटा- अरे ! क्या तुम्हें गोवध लगा है या किसी की मौत का मातम मना रहे हो।
र्सर्वेश ने चुप्पी तोडÞी – हाँ यार ! कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। उसके नेत्र अश्रुमय हो गए। फफकते हुए बोला। तुम्हारी शशि ……….तुम्हारी शशि अब इस दुनिया मे नहीं रही। कल घर जाते वक्त एक ट्रक के ठोकर से बुरी तरह जख्मी हो गई और देखते ही देखते काल के गाल मे समा गई।
पृथ्वी फफक-फफक कर रो रहा था। उसके मित्र उसे दिलासा दे रहे थे। जो बगीचा कभी ठहाकों से गूंँजता था आज वहाँ सन्नाटा फैला था। पेडÞ पर बैठे विहगवृंद भी शायद सुर में सुर मिलाकर रो रहे थे। महाविद्यालय में एक दिन की छुट्टी कर दी गयी परन्तु पृथ्वी के लिए तो शायद यह छुट्टी सदैव के लिए हो गयी। वह लगातार शून्य को घूरता रहा मानो उसमे वह शशि को ढूँढ रहा हो। उसे लगा कि वह भी आत्महत्या करके अपनी शशि के पास पहुँचे और उससे पूछे कि उसकी क्या खता थी जो वह उसे मुत्युलोक के शोक-सागर मंे अकेले डुबकी लगाने के लिए छोडÞ कर आ गयी। मगर आत्महत्या करना तो कायरों का काम है। उसे तो परिस्थिति से लडÞना सीखना चाहिए। अब वह समझ चुका कि शशि तो आकाश की चीज है। वह कभी पृथ्वी से मिल ही नहीं सकती।

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