संर्घष् से ही सफलता मिलती हैः चा“द तारा

संर्घष् मानव जीवन का अभिन्न अंग है । जिस व्यक्ति ने इस सच्चाई को समय पर ही समझ लिया और सलिके से उसका सामना किया वह सफल हो जाता है । बात कर रही हूँ, शेख चाँद तारा की । चाँदतारा राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं । एक तो मधेशी उसमें भी मुस्लिम समुदाय की, नेपाल में इतने उँचे ओहदे पर पहँुचने वाली चाँदतारा

shekh chand tara

चा“द तारा

सम्भवतः नेपाल की ही पहली महिला हैं ।
वीरगञ्ज की चाँद तारा का बचपन एक शिक्षित परिवार में बिता । पिता मोहम्मद आरिफ तात्कालीन पञ्चायत नीति तथा जाँचबुझ समिति के सदस्य थे । मुस्लिम समुदाय में लडÞकियों को पढÞाया नहीं जाता लेकिन चाँदतारा के परिवार ने उन्हंे पढÞने का अवसर दिया । तीन भाई और दो बहनें थी । लेकिन उन्हे हमेशा लगता था कि उनके साथ विभेद हो रहा है । घर का कामकाज बहनों को करना पडÞता था । कई बार घर में भी इसके लिए विरोध जताया । उन्हे लगता है कि पर्ढाई में भी उनके साथ विभेद किया गया । भाई को मेडिकल पढाया गया लेकिन उन्हंे वीरगञ्ज के ठाकुर राम क्याम्पस में कार्ँमर्स पढÞना पडÞा । वैसे ये अलग बात है कि उन्होने कार्ँमर्स की पर्ढाई भी अच्छे तरीके से की, और मस्लिम समुदाय से प्रथम श्रेणी में बी कम पास करने वाली वह ठाकुरराम क्याम्पस की पहली छात्रा थी । फिर १८ वर्षकी उम्र में शादी हो गयी । सम्भवतः घर के वातावरण ने ही चाँद तारा को व्रि्रोही स्वभाव का बना दिया । यद्यपि ऐसा कुछ वह नहीं कर सकी, जिससे उनके खुद के घर में हो रहा विभेद कम हो । पढर्Þाई खत्म करने के बाद वह वीरगञ्ज स्थित नेशनल मेडिकल कलेज में बतौर एकाउन्टेन्ट काम करने लगीं । लेकिन वहाँ भी उन्हे लगा कि उनके साथ विभेद हो रहा है । और वह हमेशा इस विभेद से लडÞती रही । मुस्लिम समुदाय में महिलाओं को बर्ुका पहनना लगभग अनिवार्य है लेकिन चाँदतारा ने उसे नहीं स्वीकारा । जिसके लिए उन्हंे बहुत कुछ सुनना पडÞा । उनका कहना है- तर्कहीन बातों में मुझे विश्वास नहीं ।
इसमें कोई दो मत नहीं कि महिला को कम आँका जाता है हमारे समाज में । महिला के पास पर्याप्त क्षमता है लेकिन उन्हे अवसर ही नहीं दिया जाता है । उनकी इच्छा को मसल दिया जाता है । चाँदतारा का कहना है कि गल्ती महिला की भी है, वह व्रि्रोह नहीं करती । अन्याय को सहन करना सबसे बडा अपराध है यही सोचकर वह राजनीति में कूद गईं । उन्हे लगा कि जब तक महिलाओं को राजनीति में अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक आगे बढÞना कठीन है । और वह कूद गईं राजनीति में । पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतक होने के कारण उन्हे ज्याद दिक्कत तो नहीं हर्ुइ, लेकिन उन्हें घर से खास कर पिताजी की ओर से दबाव था कि राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीा नेपाली काँग्रेस से आबद्ध हों । अपने पिता की राजनीतक आस्था को उन्होने स्वीकार नहीं किया और वह जुड गई २०६४ साथ में हुए मधेश आन्दोलन से । मधेशी जनअधिकार फोरम के व्यानर के नीचे रह कर उन्होंने सक्रिय रुप से मधेश आन्दोलन में भाग लिया । उन्हंे लगता था कि यह आन्दोलन मधेशी जनता को अधिकार दिलाने में रामवाण साबित होगा ।
कुछ हद तक आन्दोलन सफल भी हुआ और संविधानसभा निर्वाचन की बात आयी । फिर वे तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीी सदस्य बन गई । ससुरालवाले विल्कुल विरोध में थे । कई बार उन लोगों ने कहा कि घर की इज्जत खत्म हो गई । लेकिन जब वह राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष भी बनीं तब सब कुछ जैसे ठीक हो गया ।
वह कहती हंै- आदमी के हर कदम पर दिक्कतें आती हैं, उससे घबराना नहीं चाहिए । लक्ष्य सही होना चाहिए और उसे हासिल करने के लिर्एर् इमानदार और लगनशील हो कर आगे बढÞना चाहिए, सफलता तो मिलेगी ही ।
आयोग के अध्यक्ष बनने के बाद वह अपने आप को महिला सशक्तिकरण में लगा चुकी हैं । उन्हे लगता है महिला की पहली आवश्यकता शिक्षा है और उसके बाद रोजगारी । और फिर उसके बाद राज्य के हर तह में महिला सहभागिता । वह बहुत करना भी चाहत्ाी हैं इस क्षेत्र में, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता के कारण बहुत कुछ नहीं कर पायी हैं ।
आयोग के अध्यक्ष होने के बाद वह विश्व के कई राष्ट्र घूम चुकी हैं । वह कहती हैं- वास्तव में नेपाल की महिला की अवस्था दयनीय है । विभेद घर से शुरु होता है, फिर स्कूल में, काँलेज में, दफ्तर में । राजनीति में लगने के बाद उन्हे लगा कि वहाँ तो और ज्यादा विभेद है । बेचारी महिला घर का कामकाज खत्म करके देश और समाज के लिए कुछ करें, ऐसा सोचकर राजनीति में आती हैं लेकिन उनका काम या कहें योगदान को सही मूल्यांकन नहीं होता । और वहाँ भी उन्हे पिछले बेन्च पर ही बैठना पडÞता है । प्रकृति ने महिला को संयम के रुप में बहुत बडा हथियार दे रखा है लेकिन यही हथियार उन्हंे जीवन में पछाडÞ देता है । उनकी संयमता को समाज कमजोरी के रुप में लेता है । दहेज, डाइन जोगन, यौन शोषण, बाल विवाह आदि जितनी भी महिला से संबन्धित अपराध हैं, इस्ाी कमजोरी की उपज है । वह कहती हैं- समाज की सोच में ही परिवर्तन आवश्यक है । दस्तावेज में लिख देने से समानता नही आयेगी, दस्तावेज में लिखी बातों को व्यवहार में उतारना होगा ।
फिर भी वह खुशी व्यक्त करती हैं कि समय बदल रहा है । थोडÞा सा ही सही लेकिन महिला प्रति के दृष्टीकोण में बदलाव आया है लेकिन संर्घष्ा जारी है । यह बहुत लम्बा भी हो सकता है, बस जरुरी है सलिके से इसका सामना करना । वह दिन दूर नहीं जब सफलता हाथ आयेगी ।
प्रस्तुतिः कञ्चना झा

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