संविधानसभा एक बिहंगम दृष्टि

रामप्रकाश साह:सुगौली सन्धि द्वारा स्थापित तथा १९५र्०र् इ. के दिल्ली सम्झौता ने नेपाल-भारत के अर्न्तर्सम्बन्ध को स्पष्ट रुप से रेखांकित किया था। परन्तु उन सम्बधों को प्रथम जन निर्वाचित प्रधानमन्त्री विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला की सरकारको भंग करके राजा महेन्द्र ने निरंकुश पंचायती व्यवस्था लाद दी। इतना ही नहीं, २०२१ साल मे नयाँ मुलुकी ऐन लागू करके दिल्ली सम्झौता की धज्जी उडÞा दी। दिल्ली सम्झौता के समय में राजा त्रिभुवन ने देश सञ्चालन के लिए संविधान सभा बनाने की बात कही थी। लेकिन उनकी यह अभिव्यक्ति सिर्फशब्दों में सीमित रह गई।
इतना ही नहीं राजा महेन्द्र ने पंचायत व्यवस्था को कम्युनिष्ट पद्धति के तर्ज में सशक्त, कठोर और निरंकुश बनाने के लिए ‘गाउँ र्फक राष्ट्रिय अभियान’, ‘पंचायत नीति तथा जाँच बूझ समिति’ आदि बना कर पंचायत व्यवस्था को दर्ीघायु बनाने का प्रयास किया। देश की परिस्थिति का आकलन कर नेपाली कांग्रेस ने ०४६ साल में स्वर्गीय गणेशमान सिंह के नेतृत्व में फाल्गुन ७ गते प्रजातन्त्र दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम मंे भारत के भूतपर्ूव प्रधानमन्त्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर, एम.जे. अकबर एवम् सुब्रम्हण्यम स्वामी आदि नेताओं की अभिव्यक्ति के बाद निरंकुश पंचायती शासन व्यवस्था ध्वस्त हो गई।
उसके पश्चात् राजा वीरेन्द्र ने भी उसी परम्परा को कायम रखने का प्रयास किया। ५८ साल में राजदबार हत्याकाण्ड हुआ। उस समय नेकपा माओवादी का जनयुद्ध चरमोत्कर्षपर था। जनता और देश का दर्द देख कर गिरिजा कोइराला की सरकार जनदवाव झेल न सकी और माओवादी के आगे उसने घुटने टेक दिए। समस्या और परिस्थितियों को भांपते हुए, उन्होंने तत्कालीन एमाले अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल के साथ मिलकर, भारत सरकार के माध्यम से नेकपा माओवादी के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल -प्रचण्ड) के साथ ‘१२ सूत्रीय’ सम्झौता(पत्र पर हस्ताक्षर किया। परिणामस्वरुप माओवादी को सरकार और संसद में प्रवेश मिला, जो अत्यन्त गैरसंवैधानिक था। परन्तु उसके वाद माओवादी का ‘जनयुद्ध’ सफल देखकर आनन(फानन में विभिन्न दल मंे कार्यरत मधेशी नेता ने उपेन्द्र यादव के नेतृत्व मंे फोरम नेपाल नामक संस्था से आबद्ध होकर मधेश आन्दोलन ०६३ साल माघ २ गते से प्रारम्भ  किया। जिसने देश को हिला कर रख दिया।
मगर एक कहावत है- ‘खोदा पहाडÞ और मिली चुहिया’। उपेन्द्र यादव ने अपनी पुरानी पार्टर्ीीाओवादी से मिलकर मधेशी आन्दोलनकारी और शहीदो के खून के बदले सून -सोना) बनाने में सफल हुए और उस बहती हर्ुइ गंगा मंे बहुत सारे मधेशी नेता तथा मन्त्री बन गए। इस तरह की लूट खसोट के कारण संविधान सभा ने ‘थिएटर कम्पनी’ में तबदिल हो कर दो वर्षके बदले चार वर्षमें अपना दम तोडÞ दिया। प्रायः लोग संविधान सभा के चुनाव के बाद भी संविधान नहीं बनने का तर्क प्रस्तुत करते आ रहे हैं और यह भी सम्भव है कि संविधान सभा के माध्यम से ही गणतन्त्र का गला घोट दिए जाए। लेकिन आनेवाला समय ही इसकी सच्चाई के बारे में कुछ बता सकता है।
दक्षिण(पर्ूर्वी, दक्षिण(पश्चिमी एशियायी देश राजनीतिक विवाद से निजात नहीं पा रहे हैं। इसका मूल कारण चीन की बढÞती हर्ुइ महत्वाकांक्षी नीति और बढÞती जनसंख्या दोनों हैं। हांला कि चीन में भी शिक्षित युवा लोकतान्त्रिक अधिकार प्राप्त करने के लिए जान की आहुति देने के लिए भी नहीं हिचक रहे हैं। जिसका ज्वलन्त उदाहरण याँनमान चौक पर लोकतान्त्रिक नारा लगाने वाले युवाआंे को चीन के शासक ने बीच चौराहे पर बुल्डोजर से कुचलकर मार डाला।
नेपाल मे राजतन्त्र के असफल हो जाने के बाद लोकतान्त्रिक नेता गण भी असफलता के शिखर पर तेजी से बढÞने का प्रयास कर रहे हैं। इसी कारण से संविधान सभा लोकतान्त्रिक संविधान बनाने में असफल रही। राजनैतिक  दलों के असफल हो जाने के बाद ब्यूरोक्रेट्स के सर पर कलंक लादने का खेल सभी समझते हैं। इस से ब्यूरोक्रेट्स का कुछ नहीं बिगडेÞगा। लेकिन देश की दिशा और दशा दोनों बिगडÞ जाएगी। इसी का परिणाम है कि पर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र ने अपनी कथित धार्मिकयात्रा मंे खूब वाहवाही बटोरी है। इसके चलते प्रतिक्रियावादी और पर्ूव मण्डले खूब उत्साही नजर आ रहे हैं। लेकिन अब राजतन्त्र का लौट कर आना वास्तविकता से कोसों दूर है।
लेकिन हमारे नेपाल में राजनीतिक दल हों वा राजदरबार सभी पावर हाउस के माध्यम से चलते आ रहें है। पावर हाउस के कारण ही कोई दल नेपाल मंे शक्तिशाली यानी बडÞा दल बनता है तो पावर हाउस के कराण से ही कोई दल सीमित जगह में सिमट कर रह जाता है। ऐसे देश के नेता और मण्डले प्रवृत्ति के लोग जितनी भी लम्बी-चौडÞी बातें करें, उसका कोई अर्थ नहीं होता। संविधानसभा एक बार क्या दस बार बना लीजिए, यदि राजनेता अपना चरित्र नहीं सुधारते हैं और अतीत का विश्लेषण इमानदारी के साथ नहीं करते हैं तो संविधानसभा और उससे बननेवाला संविधान भी जनता की समस्या को हल नहीं कर पाएंगे।
और देश में इसी तरह लूटतन्त्र चलता रहेगा। जनता कराहती रहेगी। इसलिए राजनेता गण अपने को चरित्रवान एवं इमानदार बनाने का संकल्प लें। सरकार किसी भी दल की हो, देश का विकास होना चाहिए। जनता को शान्ति, सुरक्षा मिलनी चाहिए। महत्त्वपर्ूण्ा बात यही है। िि

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