संविधान :एक परिवर्तनशील दस्तावेज

गंगेश मिश्र

हठ से काम बनता नहीं,  बिगड़ ही जाता है; सहमति के बिना; जब  एक घर चलाना मुश्किल हो जाता है; तो देश की बात, करिए ही मत। देश, किसी एक वर्ग विशेष का दास नहीं; देश में रहने वाले समस्त नागरिकों की भावनाओं का सम्मान होना ही चाहिए, जो होता दिखाई नहीं दे रहा।
संविधान, मानव निर्मित दस्तावेज़ है; जिसे समयानुकूल परिमार्जित भी किया जाता है; अर्थात् संविधान … एक परिवर्तनशील दस्तावेज़ है।
कौन नहीं चाहता ? कि देश में स्थानीय निकाय निर्वाचन हो; सभी चाहते हैं, परन्तु सत्ता के मद में चूर, मुट्ठी भर लोग जो सत्ता को सब कुछ मानते हैं;  अपनी हठ की बलिवेदी पर देश के सौहार्द को क़ुर्बान कर देना चाहते है।
एक नहीं सात संविधान, लिखे गए इस देश में; हर बार जिसे विश्व का अद्वितीय संविधान कहा होगा, इन आतताइयों ने; आज एक बार फ़िर इन्हें, इस संविधान में खोट नज़र नहीं आता। बार-बार स्वाभिमान और राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाले; ये न तो, स्वाभिमानी हैं; न ही राष्ट्रवादी हैं।जिनकी नैतिकता इक पल में बदल जाती है,  जिसे एक बार दुत्कारते हैं,
अगले ही पल अपने स्वार्थ के लिए पुच्कारने लगते हैं; ” राजा आऊ, देश बचाऊ।” जब इतने प्यारे थे राजा, तो हटाया क्यूँ था ? जैसे बच्चों के हाथों में,  खिलौने नहीं टिकते; देखते ही पाने की ज़िद करते हैं और मिलते ही तोड़ने पर उतारू हो जाते हैं; ठीक वैसे ही व्यवहार की पुनरावृति इन नेताओं की है।
जनता इनसे आस लगाए बैठी रही और ये सत्ता की कुर्सी के लिए, सरकार गिराने और बनाने में लगे रहे। संघीयता झूठ-मूठ की, चुरा लाए कहीं से देखकर; अब इन्हें संघीयता भी रास नहीं आ रही; अब चले हैं स्थानीय निकाय निर्वाचन का ढोल बजाने। ” जसरी भए पनि, चुनाव हुन्छ।” इसका क्या मतलब ? किसके लिए चुनाव करवाना है, किससे चुनाव करवाना है ?
ये संसद का सदन नहीं है, जहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं, जिसके आधार पर यह आत्मघाती संविधान पारित करवाया गया था। जब देश की आधी आबादी को मज़बूर कर, संविधान संशोधन के बिना; चुनाव में शामिल कराने का प्रयास किया जायगा तो जन-विद्रोह अवश्यंभावी है, इसका दुष्परिणाम दिखेगा, जो अभी दिख नहीं रहा है।

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