संविधान पर लगता ग्रहण

रमेश झा:देश में गणतन्त्र को संस्थागत करने के लिए भावी संविधान आने वाला है । यदि संविधान बनकर लागू होता है तो निश्चय ही केन्द्रीकृत शासन पद्धति का अन्त होने वाला है । फलस्वरूप नागरिकों के लिए सम्भावनाओं के अनगिनत द्वार खुलेंगे । इसके लिए राजनेताओं में राष्ट्रीयता, जन उत्तरदायित्वबोध और र्समर्पण भावना आना आवश्यक है । जो भी हो हम सुखद भविष्य की कल्पना को साकार करने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं, पर संविधान पर लगते ग्रहण को देखते हुए सुखद भविष्य का पटाक्षेप क्या हो सकता है –sambidhan_sabha nepal 2013
राष्ट्र संविधान के अभाव में पीडÞादायी प्रसव वेदना में छटपटा रहा है । दूसरी संविधान सभा के आने पर भी यदि प्रसव पीडÞा लम्बी हर्ुइ तो निश्चय ही राष्ट्रीय अस्मिता खतरे में पडÞ सकती है । नये संविधान के मुख्य अर्न्तर्वस्तुओं -संघीयता, राज्य पुनसंरचना, शासकीय स्वरूप, नामाकरण आदि) को लेकर कांग्रेस-एमाले सत्ता पक्ष और एमाओवादी-मधेशवादी जैसे अन्य प्रतिपक्षी बीच विगत के दिनों में अग्रसर मोर्चाबन्दी ने समग्र राजनीतिक प्रक्रिया को ध्रुवीकृत कर दिया है । जिससे पुनः देश दर्ुघटना की ओर बढÞता दिखाई देता है । उत्पीडिÞत, दमित समुदायों की सांस्कृतिक एवं भाषायी पहचान जैसे सशक्तीकरण और क्षमता अभिवृद्धि करना महत्वपर्ूण्ा पक्ष है । सांस्कृतिक-भाषिक स्थिति आत्मविश्वास बढÞाती है तो सशक्तीकरण और क्षमता अभिवृद्धि से सम्मानपर्ूण्ा जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त होता है । ‘वादे-वादे जायते तत्व बोधः’ जैसी दार्शनिक उक्ति भी उक्त बातों की पुष्टि करती है । मानव विकास क्रम को देखा जाए तो भ्रमणशील एवं जिज्ञासु स्वभाव, कल्पनाशीलता, भाइचारा और सहअस्तित्व आत्मविश्वास के रास्ते को विस्तृत करता है । अनेकता में एकता और एकता में अनेकता परापर्ूवकाल से हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक धरोहर रहे हैं । इसी दायरे में हमारे देश में संविधान निर्माण करना सत्तापक्ष एवं प्रतिपक्ष दोनों का कर्तव्य बनता है ।
भविष्य निर्माण की इस गम्भीर घडÞी में उत्पीडिÞत और विभेद को सहते आ रहे वर्गों में पुनः उपेक्षा का शिकार बनाए जाने का त्रास व्याप्त दिखाई देता है, कारण नेपाली कांग्रेस हमेशा पञ्चायती मानसिकता को ही आत्मसात करके ही आगे बढÞने की कोशिश किया है और अभी भी वैसे ही आगे बढÞना चाहता है । जैसे पहले १४ अंचल थे, उसी तर्ज पर नेपाली कांग्रेस आज ७ प्रदेश का प्रस्ताव लेकर आगे बढÞने की कोशिश कर रहा है ो एमाओवादी-मधेशवादी दल आठ प्रदेश तक आने को तैयार हैं । इस विषय में सत्ता तथा प्रतिपक्ष दोनों को विचार-विमर्श के जरिए समाधान निकालना चाहिए । सबसे बडÞी चुनौतीपर्ूण्ा समस्या प्रदेश के नामकरण एवं सीमांकन विषय को लेकर पहली संविधानसभा में भी थी और आज भी जस के तस है । खासकर पूरब में झापा, मोरङ एव्ं सुनसरी एवं पश्चिम में कर्ण्ााली, कैलाली, कञ्चनपुर जिलों को तर्राई प्रदेश से हटाने का काम नेपाली कांग्रेस ने किया है । जिसे एमाले ने भी सुर में सुर मिला कर र्समर्थन किया है, जो सोची समझी राजनीतिक चाल के तहत भविष्य में भिन्न भिन्न दो संस्कृतियाँ आपस में लडÞती रहे । यही पञ्चायती मानसिकता का परिचायक है । अतः संघीयता सम्बन्धी दलीय संवाद इस विषय पर गम्भीर रूप में होना चाहिए । पञ्चायती मानसिकता तथा अनेकानेक संभावित उपेक्षाओं के विरुद्ध प्रादेशिक दलों द्वारा उठायी गई आवाज को अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता ।
संवैधानिक अन्तरविषयवस्तु को सत्तापक्षद्वारा सत्ता को सीढÞी बनाकर आगे बढÞने की कोशिश करना दर्ुभाग्यपर्ूण्ा माना जाएगा । कांग्रेस-एमाले संयुक्त अवधारणा बनाने के बाद एमाओवादी तथा मधेशवादी दल अन्य जनजातीय दलों को साथ लेकर भावी हुंकारपर्ूण्ा आन्दोलन की पर्ूव पीठिका तैयार करने में शक्ति संचय कर रहे हैं । इसी प्रकार प्रमुख दलों के बीच दिख रहे मोर्चाबन्दी के कारण देश के आन्तरिक राष्ट्रीय राजनीति में आन्तरिक द्वन्द्व बढÞने की अवस्था विशेष रूप से दिखाई देने लगी है, जिसके कारण आगामी माघ ८ गते की समय सीमा के भीतर संविधान देने जैसे राजनीतिक प्रतिवद्धता को ग्रहण लगने वाली है, जो दुःखद चिन्ता का विषय है ।
संघीयता स्वयं साध्य नहीं है, यह साधन मात्र है । संघीयता सभी समस्याओं का समाधान है अथवा संघीयता प्राप्त कर लेने से सारी समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाएगा, ऐसी करिश्मायी शक्ति की कल्पना करना मर्ूखता है, पर संघीयता के माध्यम से स्थानीय शक्ति स्रोतों का परिचालन करते हुए जनता को अधिकार सम्पन्न करना, राजनीतिक और आर्थिक रुप में समेत देश और समाज को क्रियाशील एवं सृजनशीलता की दिशा में आगे बढा सकते हैं । इन्ही मुख्य उद्देश्यों के साथ संघीय संविधान की जरुरत है । इसके साथ ही स्थानीय स्तर में व्याप्त विभेद, कुण्ठा, अधिकारहीनता जैसी आक्रोश को समाप्त करने के लिए सभी वर्गो, धर्मों जातियों, समुदायों संस्कृतियों तथा भाषाओं को विकसित करने की दृष्टि से अथवा उक्त सभी सम्बन्धित विषयों के आधार को समुन्नत करने के लिए संघीय संविधान बनाना अपरिहार्य है । गणतन्त्रात्मक नेपाल के आने के बाद एकात्मक और केन्द्रीकृत शासन पद्धति लागू है, जिससे सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता पिछडÞेपन का शिकार हो विदेश पलायन करने को बाध्य है, तर्सथ संघीय प्रणाली को स्वीकृत संघीय संविधान के अर्न्तर्गत देते हुए राजनीतिक, आर्थिक, कानुनी शक्ति के साथ-साथ राजकीय शक्ति को विकेन्द्रीत करते हुए सभी क्षेत्र की जनता को शक्ति सम्पन्न बनाने की चेष्टा होनी चाहिए । सामन्ती व्यवस्था, क्षेत्रीय विभेद, अन्यायपर्ूण्ा शक्ति सम्पन्नता और शोषणपर्ूण्ा कार्यशैली को अन्त करने के लिए संघीय संविधान की अपरिहार्यता अनुभव की जा रही है । साथ ही हमारे देश और समाज व्याप्त परमुखापेक्षी स्थिति, निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि ने नेपाली स्वामिमान एवं राष्ट्रीयता को आघात पहुँचा रहा है, इन विन्दुओं को हृदयंगम करते हुए भी संविधान बनाना आवश्यक है ।
कांग्रेस-एमाले जैसे प्रमुख सत्तावादी दलों के द्वारा राज्य पुनसंरचना के साथ साथ अन्य विषयों में आज आकर आधिकारिक विचार संविधानसभा के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं । कांग्रेस-एमाले दोनों संयुक्त रूप में अपनी विचारों को राजनीतिक संवाद समिति में प्रस्तुत करके यह दबाव देना चाहता है कि सभी को हमारी संयुक्त अवधारणाओं को मानना चाहिए कारण दोनों दलों का मिलाकर स्पष्ट बहुमत के आधार पर संयुक्त अवधारणा बनाकर संविधान लाया जा सकता है । इसी ओर संकेत के रूप में एमाओवादी और मधेशवादी दलों का संयुक्त आवेगपर्ूण्ा प्रतिक्रिया पत्रपत्रिकाओं में आने के बाद स्थिति अनिश्चित में बदलती दिखाई देती है । इसके निराकरण हेतु अविलम्ब आपसी विचार-विमर्श के माध्यम से असहमति को सहमति में बदलना जरूरी है ।
विविध राजनीतिक विचारों के पक्षपाती समुदायों जैसे मिथिला, खुम्बुवान, लिम्बुआन, नेवाः आदि भावी संविधान में नही समेटा गया अथवा इन समुदायों की भावना को समावेश कर यदि भावी संविधान नहीं आता है तो भावी संविधान र्सवजन संवद्य एवं र्सवजन मान्य नहीं होगा ।

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