संविधान पर सहमति फिर वही ढाक के तीन पात !

बाबुराम पौड्याल:   भले ही अट्ठाहरवें काठमांडू र्सार्क सम्मेलन के बाद के दिनों में सियासी हलकों में सरगर्मियां कुछ तेज जरूर हो रही है, परन्तु उल्झने सुलझने के आसार अब भी नहीं हैं । संविधान बनने की दिशा में गतिरोध बरकरार है । पहली संविधानसभा जिन असहमतियों के चलते विघटित हो गई थी, उस पर अब तक भी कोई खास प्रगति नहीं दिखाई दे रही । संघीय संरचना और उसका स्वरूप और शासन प्रणाली जैसे मुद्दे सहमति के बजाय अब भी जस के तस पडÞे है । चुनाव के समय नेताओं के बयानों से लगता था कि वे विगत की असफलता से अच्छी सीख ले चुके हैं और अब वे वायदे के मुताबिक देश को नई संविधान दे पाने में कामयाब होंगे । तब उनके द्वारा इसी माघ ८ गते के दिन संविधान बनाने की समयसीमा तक घोषणा की गई थी । उनकी यह समयबन्दी भी हाथ से निकलने ही वाली है । राजनीतिक दलों की इस असफलता ने देश के ऊपर से संक्रमण और अराजकता के काले बादल छंटने की संभावना बहुत क्षीण होती नजर आने लगी है । आखिर नेपाली जनता को संविधान के लिए और कब तक इन्तजार करना पडेगा – दलों के अडिÞयल रवैये के चलते जनता की नजर में उनका कद और छोटा पडÞता नजर आता है । इसमें कोई दो राय नहीं कि संविधान पर सहमति जरूरी है । अगर दल मुद्दों पर सहमति करने में असफल हो जाते हैं तो नेपाली जनता को उसी असफलता पर मर मिटने की कोई वाध्यता भी नहीं है । नेपाली जनता तो अमन चैन और तरक्की चाहती है, दलों की गुलामी नहीं ।hindi-magazine_sambidhan
वर्तमान संविधानसभा का राजनीतिक समीकरण तो और भी जटिल सा प्रतीत होता है । दूसरे जनआन्दोलन की प्रमुख आन्दोलनकारी शक्तियां एनेकपा माओवादी, मधेशवादी दल, नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले जैसे दलों के बीच
सहमति की खिचडÞी पक नहीं रही है । संघीयता को लेकर तो खास विवाद तीनों में नही दिखाई देता परन्तु प्रदेशों की संख्या और उस के स्वरूप पर बातें नहीं बन रही है । कमल थापाका राजावाद भी चुनाव में अपनी तरक्की दिखा चुका है । इससे उत्साहित थापा भी संविधानसभा में हंगामा करने का मूडÞ बनाते दिखते हैं । राजावाद के मुद्दे को अब हिन्दुराज्य के धार्मिक लबेदों में आगे लाया जा रहा है । जाहिर है इन दिनों हिन्दुवाद को भी एक मुहिम के रूप में आगे लाने की कडÞी कोशिशें हो रही हंै । बताया जाता है, कई दलों के कुछ बडÞी हस्तियों की भी इसमें संलग्नता है । कयास है कि इसमें पडÞोसी देश भारत के कुछ धार्मिक लोगों का र्समर्थन है । कामरेड प्रचण्ड नेपाली धरती पर साम्यवाद को जातीय लबेदे मंे जिस कदर प्रयोग कर रहे है, वही प्रयोग कमल थापा भी दुहरा रहे हंै । वक्त का मजाक देखिए, कथित क्रान्तिकारी और प्रतिगमनकारी दोनों ने सांस्कृतिक मुद्दे को ही उपयोग करने की ठान ली है । ये दोनों संस्कृति के प्रति लोगों की भावनात्मकता और उसकी नजाकत को भलीभांती समझते हैं । इन दोनों की संविधानसभा में उपस्थिति क्या रंग लायेगी । सभी जानते हैं, सन्त कबीर ने खीरे की उपमा देकर लिखा है “देखन को एक लगै भीतर से फांके तीन” मधेशी दलों की नीयति यही है । उनका अस्तित्व केवल मोरचे के स्वरूप में या फिर बडÞे दल की छतरी के तले ही नजर आता है । मोरचे का मतलब एकता नही वल्कि विभेद में एक होना है । संविधानसभा में उनकी मनोदशा भी यही है । इन दलों में ऐसी कोई  सैद्धान्तिक समस्या नजर नहीं आती जिसके कारण मधेश में अनेक दलों की आवश्यकता पडÞे । मधेश के प्रति राज्य की उपेक्षा का पुराना बर्फअब कुछ पिघल चुका है जो मधेशी जनता के संर्घष्ा का ही प्रतिफल है । अब मधेश को क्षेत्रीयता के सिकुडन से मुक्त होकर राष्ट्रिय रूपमें आगे आने की आवश्यकता है । नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले भी संविधानसभा के गणितको अन्धे की लाठी के रूपमें ले रहे हैं । उन्हे भी यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान को सम्मानित बनाने के लिए हर संभव कोशिश करनी होगी । उन्हे स्मरण करना उचित होगा कि जनता ने पहली संविधानसभा में उन्हे संख्यात्मक दृष्टि से कमजोर घेरे में रख दिया था । सवाल अकेले गणित की नहीं है ।
इसके अलावा संघीयता के विरोधी स्वर भी संविधानसभा में है । इन परस्पर विरोधी राजनीतिक मतों को बरकरार रखते हुये संविधान का र्सवमान्य बनना बिल्कुल असम्भव है । सभी दलों को एक साथ बैठ कर नेपाली और नेपाल और उसकी भौगोलिक, सांस्कृतिक चरित्र को ध्यान में रखते हुये सोचने की आवश्यकता है । शायद इसके लिए दल अब भी तैयार नहीं हैं । नेपाल की राजनीतिक ताकतें अन्दरूनी हिसाब से जितनी अडिÞयल और जिद्दी है बाहरी हिसाब से कहीं अधिक लाचार और आत्मविश्वासहीन है । नेपाल में चल रहे गतिरोध को लेकर बाहर की अच्छी और बुरी शक्तियों की दिलचस्पी बढÞ रही है । पास पडÞोस के चीन और भारत जैसे देशों का भी स्वाभाविक दिलचस्पी है क्योंकि हमारी सीमाएं उन से मिलती हैं और हमारे कतिपय निर्ण्र्ाासे उनका सरोकार हो सकता है । उन पर उनकी मित्रवत् सलाह मशविरे को मनन करना आवश्यक है । फिर भी देश के हित में और बाहरी देशों के साथ कूटनीतिक मर्यादाओं के साथ काम करना आवश्यक है ।
जनता आर्थिक प्रगति और सामाजिक, सांस्कृतिक सुरक्षा चाहती है । विगत के सभी जनआन्दोलनों की मंशा भी यही रही है । जनता ने दलों के नेतृत्व में रक्तपातपर्ूण्ा से शान्तिपर्ूण्ा आन्दोलनों, और चुनावों में असरदार हिस्सा लेकर उनके प्रति जो विश्वास जताया है, उसको स्मरण करना आवश्यक है । अब दलों के नेता जो कुछ भी बोल रहे हों उनके पास फिर जनता को संर्घष्ा के लिए अपील करने का नैतिक आधार शायद ही बचा हो ।  जनता ने राणातन्त्र और राजतन्त्र को जमीनदोज कर दिया है । जनता को उसकी इच्छाओं पर अर्कमण्यता, अराजकता और संक्रमण का कहर बरपाने वाली ताकतों के खिलाफ हल्ला बोल दे, कहनेवाला है कोई ऐसा माई का लाल –

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