संविधान बनने से पहले स्थानीय निकाय का चुनाव

                                                                                   “जनमत संग्रह द्वारा संघीयता न देने की साजिश”

रामाशीष:नेपाल मंे नया संविधान बनाने के लिए दूसरी बार कराए गए चुनाव के सम्पन्न हुए पांच महीने बीत चुके हैं । फिर भी संविधान सभा गठन की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हर्ुइ है क्योंकि उसमें सरकार द्वारा मनोनीत की जानेवाली २६ सीटें अभी भी खाली पडÞी हैं । अन्तरिम संविधान के अनुसार संविधान सभा की २६ सीटों के लिए, देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करनेवाले विशिष्ट व्यक्तियों में से सरकार द्वारा मनोनीत किए जाने का प्रावधान है । जबकि, बांकी बची अन्य चार खाली सीटों पर उप-चुनाव कराया जाना है । ये सीटें दो-दो स्थानों से विजयी संविधान सभा सदस्यांे द्वारा एक-एक स्थान से सदस्यता त्यागने से खाली हर्ुइ हैं ।ajad madhesh
नेपाली कांग्रेस सभापति सुशील कोइराला के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) की मिलीजुली सरकार के बनने में यद्यपि तीन महीने लगे लेकिन वह भी अब काम कर रही है । फिर भी, सरकार में शामिल दोनों ही पार्टियां, संविधान बनाने पर कम तथा स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के लिए कुछ अधिक ही जोर दे रही हैं । सरकार के प्रवक्ता तथा सूचना मंत्री मिनेन्द्र रिजाल ने हाल ही में दावा किया कि चुनाव की तिथि शीघ्र ही घोषित कर दी जाएगी । जबकि, सरकार में शामिल नेकपा एमाले संसदीय दल के नेता के. पी. शर्मा ओली का दावा है कि स्थानीय निकायों के चुनाव बरसात से पहले संभव नहीं । लेकिन, अब जबकि संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण की तालिका भी जारी कर दी गई है और कहा गया है कि आगामी माघ ८ गते को संविधान का प्रारूप -ड्राफ्ट) जारी कर दिया जाएगा, तो भी प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने १९ दिसम्बर को झापा की एक सभा में कहा ‘स्थानीय निकाय के चुनाव का कोई विकल्प नहीं है, उसे शीघ्र ही कराना आवश्यक है । मालूम हो कि संविधान सभा में तीसरी बडÞी पार्टर्ीीकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) तथा मधेशी दलों के विरोध के कारण स्थानीय निकायों के चुनाव की चर्चा में थोडÞी कमी आयी थी कि अब चुनाव टल गया लेकिन इसी बीच प्रधानमंत्री कोइराला ने झापा में उसे ‘अपडेट’ कर दिया है । और जो कुछ भी हो, लेकिन किसी भी शासक दलों ने यह घोषणा नहीं की है कि ‘स्थानीय निकायों का चुनाव संविधान निर्माण के बाद ही होगा’ ।
साफ है कि सरकार में शामिल नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले – दोनों ही प्रमुख पार्टियां संविधान निर्माण के पहले ही स्थानीय निकायों के चुनाव कराकर, देश भर के ३९१५ गांव विकास समितियों -पंचायतों) और ९९ नगरपालिकाओं पर कब्जा जमा लेने के दांव में हैं । ताकि, देशभर के गांवों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक के लिए आबंटित विकास बजट-राशि को अपने हाथों में लिया जा सके । और, इसी के सहारे गांव-शहरों पर अपनी पार्टर्ीीा दबदबा बनाए रखते हुए अपने कार्यकर्ताओं का पालन-पोषण करते रहें । उनसे लेवी बतौर हर महीने केन्द्रीय पार्टर्ीीार्यालय के लिए ‘भ्रष्ट-आय कमीशन’ वसूलते रहें ।
मालूम हो कि सीमापार भारतीय प्रान्तों के गांवों में स्थानीय निकायों -गांव पंचायतों) के चुनाव, पार्टर्ीी रूप में नहीं होते । इसलिए, भारतीय गांव पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के चुनावों के सम्पन्न हो जाने के बाद भी समाज में आपसी सद्भाव पर कोई असर नहीं होता । जबकि, नेपाल में यह चुनाव पार्टर्ीी रूप धारण कर लेते हैं और संलग्न पार्टियों के बीच अपने उम्मीदवारों को जिताने की होडÞबाजी होती है । फलस्वरूप, चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद भी शान्तिपर्ूण्ा गांवों में भी आपसी वैमनस्य कायम रहता है । काफी लम्बे अर्से तक झगडÞे-मुकदमें चलते रहते हैं ।
अब जरा नेपाल के स्थानीय निकायों की संरचना को देखें । हर गांव विकास समिति में ९ वार्ड होते हैं । नगरपालिका में भी कमो-वेश ९ वार्ड ही होते हैं । लेकिन हां, काठमांडू में १७ वार्ड हैं । यही वार्ड, गांव एवं नगरों की आन्तरिक व्यवस्था संचालन करने की सबसे छोटी इकाई हंै । हर वार्ड कमिटी में एक प्रमुख सहित छ निर्वाचित सदस्य होते हैं । इनमें से किसी को भी मासिक वेतन नहीं मिलता । लेकिन हां – इसीमोड, यू.एन.डी.पी, एस.जी.पी, इम्पावरमेन्ट नेपाल फाउन्डेशन -य.एस.) और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी -यू.एस.) आदि विदेशी संघ-संस्थाओं की ओर से विकास निर्माण के लिए बडÞे पैमाने पर सहयोग राशि आया करती है । इन राशियों की जमकर बन्दर-बांट हुआ करती है । उक्त विदेशी सहयोग तथा सरकार द्वारा आबंटित बजट राशि की छीन-झपट से ही गाविस एवं नगरपालिका सदस्यों की नेतागिरी का धंधा फलता-फूलता है और उनका गुजर-बसर होता है । विकास निर्माण पर तो मुश्किल से २५ प्रतिशत राशि भी नहीं लगायी जाती । हाल ही में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार पिछले दस पन्द्रह वषर्ाें में स्थानीय निकाय के चुनाव नहीं कराए गए जिस कारण स्थानीय निकायों के कर्मचारियों द्वारा लगभग १६ अरब रुपये का ‘घपला’ या ‘भ्रष्टाचार’ किया गया ।
गणितीय हिसाब से देखें तो पता चलता है कि हर गाविस के ९ वार्डर्ाा में, प्रति वार्ड छ सदस्य के हिसाब से, ४५ सदस्य निर्वाचित होते हैं । देश भर में ३,९१५ गाविस तथा ९९ नगरपालिकाएँ हैं । कुल मिलाकर ४,०१४ गाविस के ३६,१२६ वार्डर्ाा के लिए, प्रति वार्ड छ सदस्य के हिसाब से कुल १, ८०,६३० सीटों के लिए चुनाव होते हैं । नेपाली कांग्रेस के प्रति निष्ठावान तथा राजधानी के जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार माथवर सिंह वस्नेत बताते हैं – मान लें कि एक उम्मीदवार के चुनाव प्रचार में कम से कम पांच-सात र्समर्थक कार्यकर्ता भी लगेंगे तो, चुनाव के द्वारा देश भर में करीब-करीब १० लाख कार्यकर्ता संचालित होंगे । इन उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं पर पार्टियां अच्छी-खासी रकम भी खर्च करेंगी । इन्हीं ‘खाए-पीए कार्यकर्ताओं’ की संख्या बल का अनुमान लगाकर शासक पार्टियां, नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले), झटपट में स्थानीय निकाय का चुनाव करा लेना चाहती हैं । ताकि, इसी संचालित संख्या बल के बूते पर ‘संविधान निर्माण’ में सबसे बडÞी बाधा ‘संघीयता’ को ही ‘सर्न्दर्भ-विहीन’ बना दिया जाए । और, यदि इसके बाद भी अधिक चीख-चिल्लाहट मचे तो जनमत संग्रह कराकर, अन्तरिम संविधान में अंकित ‘संघीयता’ को ही सदा-सदा के विदा कर दिया जाए । क्योंकि, ‘संघीयता’ तो मूल-अन्तरिम संविधान का अंग है ही नहीं । यह तो ठहरी मधेश-विद्रोह से पैदा हर्ुइ ‘सौतेली सन्तान’ भी नहीं, ‘लावारिश औलाद’ । जिसे अपनाने को, ‘हठधर्मिता पर अडÞे हुए एक क्षेत्र-विशेष, वर्ग विशेष’ और जाति विशेष के नेता, उनकी पार्टियां, सेना-पुलिस और शासकों की फौज, कतई तैयार नहीं ।
स्मरणीय है कि इससे पहले निर्वाचित संविधान सभा भी मुख्यतः ‘संघीयता’ के सवाल पर ही बिना किसी निर्ण्र्ाानिष्कर्षके विघटित हो गई । तब, नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले ने ‘संघीयता’ की जिस धारणा को प्रकाशित किया था, उससे तो साफ-साफ दिखता था कि ‘संघीयता’ देने पर, कम से कम नेपाली कांग्रेस और नेकपा -एमाले) तो तैयार नहीं थी । उनलोगों की यही सोंच थी कि यदि मधेशी अधिक चिल्ल-पांे मचाते हैं तो नेपाल के नक्शे पर उत्तर-दक्षिण लाईन खींचकर, पांच-सात प्रान्त बना दिए जाएं । और, उक्त सभी प्रान्तों में मधेशियों को सदा-सदा के लिए ‘अल्पसंख्यक’ बनाकर, घुट-घुटकर गुलाम की जिन्दगी जीनेे को बाध्य कर दिया जाए । तब संविधान सभा में सबसे बडÞी ‘एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी)’ और उनके नेता संघीयता अपनाए जाने पर तो जरूर जोर देते रहे । लेकिन, विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत १० या ११ प्रान्त बनाने की सिफारिश को उनलोगों ने भी दमदार र्समर्थन नहीं किया । आखिर क्यों – यहीं प्रमुख पार्टियों के नेताओं की नीयत में खोट दिखी और आज भी दिखती है । उन सबों की बद्नीयती के कारण ही पिछली संविधान सभा ‘टांय-टांय फिस्स’ हो गयी । उस वर्गविशेष को इस बात का भारी भय है कि यदि भौगोलिक, भाषिक तथा जाति-जातियों की संस्कृति के आधार पर प्रान्त बनेंगे तो, उनका क्या हश्र होगा – उनका किस प्रान्त में शासन होगा – केन्द्र में उनकी क्या स्थिति रहेगी – क्योंकि, उनकी जाति-बिरादरी के लोग, किसी क्षेत्र विशेष में तो सीमित हैं नहीं । इस हालत में सत्ता का सुख सदा-सदा के लिए उनके हाथ से जाता रहेगा ।
लेकिन, हाँं, वर्तमान संविधान सभा में तीसरी सबसे बडÞी पार्टर्ीीकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) और भारतीय सीमा से लगे तर्राई क्षेत्र की मधेश केन्द्रित पार्टियां, वर्तमान सरकार के इस इरादे को भली-भांति भांप चुकी हैं । उनका स्पष्ट आरोप है कि नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी), स्थानीय निकायों का निर्वाचन कराकर, जहां संविधान निर्माण की प्रक्रिया को ही फिर से वषर्ाें पीछे धकेल देना चाहती हंैं । वहीं दूसरी ओर, संघीय राज्य बनाने के अन्तरिम संविधान के संकल्प को ही ओझल में डाल देना चाहती हैं । माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल, पोष्टबहादुर बोगटी और पार्टर्ीी्रवक्ता दीनानाथ शर्मा आदि ने तो यहां तक घोषणा कर दी है कि कांग्रेस और नेकपा एमाले की बद्नीयती को उनकी पार्टर्ीीौर देश की जनता भली-भांति समझ चुकी है । इसलिए उनकी पार्टर्ीीसंविधान निर्माण से पहले स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के हर प्रयास को विफल कर देगी । क्योंकि, दूसरी बार निर्वाचित संविधान सभा का पहला काम संविधान का निर्माण करना है, न कि चुनाव कराना । जबकि, मधेशी हित की ठेकेदार पार्टियां, चुनाव में अपने नेताओं की हर्ुइ शर्मनाक हार तथा उनके द्वारा अपनी ‘राजनीति-निरक्षर’ पत्नियों को निर्लज्जतापर्ूवक संविधान सभा में ठेले जाने के कारण, डिमोरेलाइज्ड हैं, हतप्रभ हैं । वह अभी भी संघीयता के खिलाफ रची जा रही साजिश का खुलकर विरोध नहीं कर रहे हैं । क्योंकि, उन्हें अभी भी सत्तासीन प्रमुख पार्टियों के मालिक-नेताओं से, ”सरकार द्वारा आरक्षित सीटों’ में से एक-एक सीट की ‘बफादारी-भीख’ मिल जाने की उम्मीद है” ।
प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के नेतृत्ववाली ‘नेपाली कांग्रेस – नेकपा -एमाले)’ सरकार के नेताओं की बडÞबोली घोषणाओं पर वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक किशोर नेपाल ने दिलचस्प चुटकी ली है । वह एक स्थानीय दैनिक के सम्पादकीय पृष्ट पर प्रकाशित लेख में कहते हैं – ”संविधान एक वर्षके अन्दर बनेगा”- यह, अल्पभाषी कोइराला द्वारा र्सवाधिक दोहराया जानेवाला वाक्य है । जबकि, मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘यदि किसी दूर-दराज के केन्द्र’ द्वारा नये नेपाल के लिए लिखा हुआ ‘नया संविधान को अवतरित’ होना है, तो एक वर्षके अन्दर ही संविधान आ जाएगा । और, यदि ऐसा नहीं है, तो प्रधानमंत्री के उक्त कथन को ‘ब्रहृम वाक्य’ साबित होना तो दूर, उसके नजदीक पहुंचने की भी संभावना नहीं दिखती” । वह आगे बताते हैं ‘संविधान सभा गठित हुए तीन महीने से भी अधिक हो रहे हैं । फिर भी, संविधान सभा में न तो उत्साहजनक वातावरण है और न ही बहस और विवादों की गहमागहमी ।
नेकपा एमाले महासचिवर् इश्वर पोखरेल ने तो यहां तक कह दिया है कि ‘संविधान बन जाने के बाद भी उसकी विभिन्न धारा-उपधाराओं के प्रावधानों को लेकर विभिन्न प्रकार के आन्दोलन होने की संभावना को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता । वैसी स्थिति में स्थानीय निकाय का चुनाव कराना संभव नहीं होगा, और चुनाव टलता चला जाएगा । इसलिए भी, संविधान निर्माण के पहले चुनाव कराना आवश्यक है । नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष रामचन्द्र पौडÞेल भी कह चुके हैं कि यदि इस वक्त चुनाव नहीं हुए तो अगले छह-सात वषर्ाें तक चुनाव नहीं हो सकेगा । इसका साफ अर्थ है कि रामचन्द्र पौडÞेल यह जानते हैं कि अगले पांच वर्षमें भी संविधान बनने की कोई संभावना नहीं है ।
पहले संविधान निर्माण, तब स्थानीय निकाय के चुनाव, के पक्षधरों का कहना है कि जब पिछले दस-पन्द्रह वषर्ाें तक चुनाव नहीं हुआ, तो अब और एक वर्षरुक जाएं, तो कौन सा हिमाल पिघलकर मैदान बन जाएगा – आखिर एक वर्षमें कितने अरब रुपये का घपला हो जाएगा – इसलिए जब सत्ताधारी कांग्रेस -कम्युनिस्ट नेता, जनता को बार-बार यह विश्वास दिला रहे हैं कि एक वर्षके अन्दर ही संविधान बन जाएगा, तो फिर नये संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार आखिर क्यों न स्थानीय निकायों के चुनाव कराए जाएं – पर्यवेक्षक कहते हैं कि ”सच्चाई तो यह है कि सभी शासक दलों के नेताओं से लेकर नौकरशाही तक संविधान निर्माण के पहले ही स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के पक्षधर हैं । वह सभी जानते हैं कि संविधान सभा में घोषित संविधान निर्माण तालिका के अनुसार माघ ८ गते तक किसी भी हालत में संविधान नहीं बन सकता” क्योंकि इससे पहले की संविधान सभा में भी संविधान निर्माण तालिका में १२ बार परिवर्तन किया गया था और फिर भी संविधान नहीं बन सका था ।
इन सब के बीच अभी जिन प्रमुख नेताओं के हाथ में सत्ता की डोर है उनके अतीत को जब हम खंगालते हैं तो उनके प्रतिनिधित्व पर नेपाली जनता को शंका ही होती है । प्रधानमंत्री सुशील कोईराला, अर्थमंत्री जिनके पास स्वयं अर्थ की कोई कमी नहीं है रामशरण महत और उप प्रधान और गृहमंत्री वामदेव गौतम ये वो प्रमुख नेता हैं जिनके हिस्से में सबसे महत्वपर्ूण्ा पद हैं । किन्तु इनकी रानीतिक कुण्डली को देखते हुए नही. लगता कि ये संघीयता बनने देने के पक्ष में हैं । इनमें से किन्हीं पर पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आइ. एस. आइ. के साथ गुप्त सम्बन्ध का आरोप है तो किन्हीं को पाकिस्तानी दलाल की संज्ञा दी जा चुकी है, तो कोई महाभ्रष्ट की पदवी से सम्मानित हो चुके हैं । बहरहाल इन सभी स्थितियों में भी नेपाली जनता और खासकर मधेशी जनता इनसे उम्मीद लगाए हुए है कि शायद इनके हाथों कोई कल्याणकारी कार्य निष्पादित हो जाय ।

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