संविधान में जो शब्द, खण्ड है ही नहीं उसका संसोधन किसके लिए और क्यों ?: डा.मुकेश झा

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डा.मुकेश झा , जनकपुर ,६ मई | मधेस आंदोलन वैतरणी नदी है और संविधान संसोधन उसका गाय। उस गाय के पूंछ पकड़े बिना कोई भी वैतरणी नदी पार नही कर सकते। चाहे कितना ही बड़ा अनैतिक कार्य करें बस मधेस आंदोलन और संसोधन के लिए किया कह दो सारा दोष समाप्त। इसका ताजा उदाहरण नेपाल सरकार के उप प्रधान तथा गृहमंत्री विमलेंद्र निधि जी का इस्तीफा प्रकरण है। निधि जी ने नेपाल के सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायधीश शुशीला कार्की के विरुद्ध लगाए गए महाभियोग से क्रुद्ध हो कर इस्तीफा दिया परन्तु दो ही दिन में बड़े नाटकीय ढंग से अपना इस्तीफा वापस ले लिया। जानकी नवमी के अवसर पर अपने गृह नगर जनकपुरधाम आए माननीय विमलेंद्र निधि ने भी इस्तीफा वापस लेने का कारण वही “वैतरणी की गाय” संसोधन की पूंछ पकड़ ली। उन्होंने पत्रकार से बात करते हुए कहा “संसोधन मार्फ़त संविधान कार्यान्वयन करने के लिए पार्टी अध्यक्ष शेर बहादुर देउवा तथा प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल ने आग्रह किया तो हमने अपना इस्तीफा वापस ले लिया।” विमान स्थल में पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए “मधेसियों की मांग पूरा करते हुए घोषित स्थानीय तह की निर्वाचन सफल कराने के लिए उन्होंने अपनी इस्तीफा फिर्ता लेने की बात कही, “संघीय लोकतांत्रिक गणतांत्रिक संविधान कार्यान्वयन से बड़ा कार्यभार और कुछ भी नही है, इसी दायित्व को निर्वाह करने के लिए मैंने इस्तीफा फिर्ता लिया है। इतना बड़ा आत्मज्ञान दो दिन में कहां से आया यह तो वही जाने परन्तु वर्तमान में जो संविधान संसोधन की जो बातें चल रही है और जो संसोधन विधेयक सरकार ने दर्ता करवाई है उसपर एक नजर डालना आवश्यक है।

पिछले एक साल में जो संसोधन की बाते हुई उसमे दो तरह के संसोधन की बात की गई, एक सात बूंदे संसोधन और दूसरी धारा २७४ की संसोधन। सात बूंदे संसोधन में सरकार ने जो प्रस्ताव लाया था उस प्रस्ताव से मधेसियों को कुछ हासिल होने वाला नही था इसलिए उसमे परिमार्जन करने के बाद दर्ता कराने की बात कही गई लेकिन वह आज तक नही हुआ। अब धारा २७४ की जो संसोधन प्रस्ताव दर्ता हुआ है उस पर एक नजर डालें। नेपाल के संविधान २०७२ के भाग ३१ अंतर्गत धारा २७४ है जिसमे संविधान किस तरह संसोधन हो सकती है वह प्रवधान रखी गई है। मधेसवादी पार्टीयों की माने तो उनका कहना है कि इस धारा को संसोधन किये बिना संविधान संसोधन नही हो सकती है। उनकी बात को मानते हुए नेपाल सरकार ने धारा २७४ संसोधन के लिए विधेयक लाया जिसमे कुल पाँच धारा/उपधारा संसोधन होनी है। इस संसोधन विधेयक में क्रम संख्या १ में धारा ७ के संसोधन की बात है जिसे यहां नही लिया जा रहा। संसोधन विधेयक के क्रम संख्या २ में धारा २७४ के उपधारा ४ को संसोधन की बात है और उसमें प्रदेश की सीमांकन बदलने के प्रावधान की बात कही गई है जिसमे “सहमति” शब्द को हटाकर “परामर्श” शब्द रखी जायेगी। संसोधन विधेयक के क्रम संख्या ३ में उपधारा ४ के खण्ड (क) के संसोधन की बात लिखी हुई है, जबकि नेपाल के संविधान २०७२ के धारा २७४ के उपधारा ४ अंतर्गत खण्ड (क) है ही नही। जो खण्ड है ही नही उसमे संसोधन की बात कहाँ ? फिर भी क्रम संख्या ३ में कही गई है कि धारा २७४ के उपधारा ४ के खण्ड क से “सबै” शब्द हटाइने, अर्थात उस खण्ड क में जो “सभी” शब्द है वह हटाया जाएगा। अब बताइये जो खण्ड ही नही उसका व्यख्या भी हो रहा है और संसोधन भी ! इसी तरह संसोधन विधयेक के क्रम संख्या ४ में धारा २७४ के उपधारा ८ से “सभी” शब्द हटाने की बात कही गई है जब कि धारा २७४ के उपधारा ८ में भी कहीं भी “सभी” शब्द का जिक्र नही। इस तरह संविधान संसोधन का जो विधेयक सरकार ने दर्ता करवाई उसमे संविधान में जो शब्द और जो खण्ड है ही नही उसको संसोधन करने की बात कर रही है। वैसा संसोधन किसके लिए, क्यो ? और ऐसा संसोधन को वैतरणी की गाय बना कर बड़े बड़े दिग्गज पार उतरना चाहते हैं।

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