संविधान या नश्ल की लड़ाई ?

मनोज कुमार कर्ण:२४ अगस्त सन् २०१५ सोमबार के दिन कैलाली जिला के टिकापुर में पुलिस के मुताबिक पुलिस के एसएसपी लक्ष्मण न्यौपाने सहित कुल सात पुलिस और एक तीन वर्ष के नाबालक का अधिकारवादी आन्दोलन अनियन्त्रित हो जाने से विभत्स हत्या कर दिया गया है । दोष आन्दोलनकर्मी थारु ÷ मधेशी पर थोपा जा रहा है जो बिल्कुल साम्प्रदायिकता पर आधारित मानसिकता है । हालात ऐसे हंै कि वहाँ राज्य नियन्त्रित तथा पहाड़ी समुदाय की पकड़ रही निजी प्रिन्ट मीडिया, रेडियो÷एफएम और टेलिविजन एकतरफा समाचार बना रहा है । जाहिर है कि समाचार भी केवल पहाड़ी खस समाज के पक्ष में ही होगा । कुछ लिखने से पहले मैं अपनी निजी राय बता दूँ कि मैं हिंसा को बढ़ावा देना कतई नहीं चाहता और मैं तो यह चाहता हूँ कि चाहे सुरक्षाकर्मी या फिर आन्दोलनकर्मी, जो कोई भी टेबल टॉक को छोड़कर यदि हत्या और हिंसा में विश्वास करता हो तो उससे केवल मानवता के सवाल पर हम घृणा करें । यह लिखते हुए मैं सावधान हूँ कि मेरी भाषा का यह अर्थ नहीं है कि किसी कर्मचारी निर्दोष सुरक्षाबल को पर मधेश में कोई आक्रमण करे या फिर आन्दोलनकर्मी को घेरकर कोई मारे और वो आत्मरक्षा भी न कर सके पर आत्मरक्षा शब्द का गलत इस्तेमाल करनेवालों का कड़ी से कड़ी सजा भी दी जाय । दूसरा मेरा अहम सवाल पहाड़ी समुदाय के पकड़वाले मीडिया से है जो सन्तुलित समाचार बनाने की जगह केवल पहाड़ी जनता और पहाड़ी सुरक्षाकर्मी का पृष्ठपोषण करता है ।
२४ अगस्त यानी ७ भाद्र २०७२ को टिकापुर में घटना कैसे हुई हमें पूर्णरुपेन अध्ययन अनुसन्धान करना होगा । ऐसी ही घट्ना मार्च २१ तारीख सन् २००७ में रौतहट जिले के गौर में मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल और माओवादी के लड़ाई में करीब उनतीस पहाड़ी माओवादी क्यान्टोन्मेन्ट लड़ाका हत्या हुई थी । इन दो डाटा से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि मधेशी जनता हिंसक हैं । हमें क्या नहीं भूलना चाहिए कि यह केवल गैरराज्य पक्ष का डाटा हैं और ऐसे कितने अधिकारकर्मिंयों को नेपाल के पहाड़ी हुकुमत बहुत वर्ष पहले से बेपता करते आ रहे हैं । मधेश विद्रोह के दौरान तत्कालीन गृहमंत्री काँग्रेस के कृष्ण प्रसाद सिटौला ने तो एक ही सुर में राज्य संयत्र द्वारा ५४ मधेशी को मौत के घाट उतार दिया था । वे मधेशी लोग केवल मधेशी थे । उन्हें थारु, मुसलमान, मधेशी के नाम पर विभाजन किया पहाड़ी बाहुल्य पार्टियाँ काँग्रेस, एमाओवादी और एमाले जैसे कट्टर मधेशी अधिकार के विरोधियों ने । हालसाल में नेपाल माता संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रवाला संविधान देने के प्रसवावस्था में हैं । नेपाल में संघीयता का नींव ही मधेश विद्रोह का परिणाम है । जब जब इस देश में सत्ता के खातिर राजसंस्था के खिलाफ पहाड़ी पार्टियाँ काँग्रेस या माओवादी नक्सलियों ने शान्तिपूर्ण या फिर हतियारबन्द आन्दोलन किया, उस में मधेशी जनता और मधेश की भूमि अहं भूमिका निभायी हैं । पर जब भी वे सत्ता में पहँुचते हैं तो मधेशी के साथ षड्यन्त्र करते रहना नेपाल का इतिहास रहा है । मधेशी जनता पर डिवाइड एण्ड रुल अर्थात्, फोडो और राज करो की नीति रही है । टीकापुर के घट्ना से पहले वर्तमान गृहमंत्री एमाले कम्युनिस्ट तथा ‘दक्षिण विरोधी’ के नाम से देश में मशहूर वामदेव गौतम ने सप्तरी के भारदह में राजीव राउत, सुर्खेत में तीन आन्दोलनकर्मी, जाजरकोट जिले में एक को सुरक्षाबल के गोली से मरवा दिया है । इन्होंने टिकापुर घट्ना के कुछ ही दिन पहले नयाँ बानेश्वर में दलित हरेक पार्टी के सभासद् अपना हक अधिकार की माँग कर रहे पर सुरक्षाकर्मी की अन्धाधुन्ध लाठी बरसवाई थी जिसकी संविधानसभा में तीव्र आलोचना हुई । करीब पन्द्रह साल पहले अभिनेता हृतिक रौशन के सरल भाषा को टुइस्ट कर पहाड़ी जनता में मधेशी और दक्षिण पड़ोस पर एकसाथ साम्प्रदायिक भड़काव कराने वाला और कोई नहीं थे बल्कि यही वामदेव हैं जिस घटना के दौरान यह स्तम्भकार काठमाण्डू घांटी में ही अपनी कालेज की पढ़ाई पूरी कर रहा था । टिकापुर घट्ना के बाद भी फिर गौर में भारत में इलाज कराते जा रहा राजकिशोर ठाकुर को मधेशी आन्दोलनकर्मी कह सुरक्षाफौज द्वारा मार दिया गया । इतना ही नहीं, टिकापुर के घट्ना पश्चात् दाङ्ग, सर्लाही, गौर, टिकापुर सब जगह सेना का गश्त राष्ट्रपति के बिना नोटिश पहाडीÞ प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और इनके पार्टी के अध्यक्ष मंडल के इच्छा पर लगाया गया फिर भी चौधरी थर का सभासद् के घर, रेस्टुराँ और एफएम स्टेशन में आग लगा दी गयी । फिर राजमार्ग के थारु के छोटेमोटे दुकानों की तो बात ही क्या करनी ?
नैतिकता तो यह कहती है कि टिकापुर घटना की जिम्मेदारी राज्य को और खासकर गृहमंत्री तथा देउवा, रावल और भट्ट नेताओं को लेना ही होगा । तत्काल गृहमंत्री राजीनामा दे और गिरफ्तार आन्दोलनकर्मी को छोड़ा जाय तथा सेना को बैरेक में वापस बुलाया जाय ।
यह कैसी विडम्बना है कि नेपाल के पश्चिम में देउवा, रावल और भट्ट तीन दल के अलग नेता एक मुद्दा पर मधेश विरोधी होकर अड़के हैं तो पूरब में झापा, मोरंग और सुनसरी मधेशी जिले को उल्टा पहाड़ प्रदेश में एमाले के सुप्रिमो केपी ओली और काँग्रेस के महामंत्री कृष्ण सिटौला अड़े हुए हैं और साम्प्रदायिक मधेशी को कहते हैं । आज मधेशवादी दलों का राजनैतिक मांग लोकतंत्र के वृहत परिभाषा पर काँग्रेस को पूरा कर वामपन्थी दलों को भी उस राह पर ले जाना चाहिए था जैसा कि विगत में काँग्रेस सभापति तथा प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने आत्मनिर्णय का अधिकार सहित एक मधेश प्रदेश का मांग पर हस्ताक्षर किया था । नेपाल के नेता लोकतंत्र पर आधारित कम से कम रबर्ट ए. डाहल का ‘लोकतंत्र के बारे में’ किताब पढें । मधेशी जनता नेपाल के पड़ोसी देश तथा युएनओ जैसे निकाय से विनम्र आग्रह करती हैं कि चार पाँच नेता स्वयं की इच्छा अनुसार बहुसंख्यक आदिवासी, जनजाति, मधेशी आदि के अधिकार को अपहरण कर बनाए गए संविधान को मान्यता न दें ।
(लेखक पाटन संयुक्त कैम्पस, ललितपुर में अध्यापनरत हैं)

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