संविधान संशोधन की प्रक्रिया वास्तविकता या छलावा

मुकेश झाprachand-deuba

नेपाल सरकार ने एक साल की खिंचातानी और चौतर्फी बदनामी उठाने के बाद संविधान संसोधन विधेयक आगे लाया है। यह विधेयक किस उद्देश्य से लाया गया इसका निर्णय तो समय आने पर पता चलेगा क्योंकि १० साल में आए हुए संविधान को हमने देखा और ूदुबाराू हो रहे संसोधन को भी देख रहे हैं। एक ऐसा संशोधन विधेयक जिसका विरोध आंदोलनकारी से ले कर प्रतिपक्ष और सरकार में सम्मिलित सभी कर रहे हैं उसको लाने का औचित्य क्या है? क्या यह संशोधन सिर्फ खानापूर्ति के लिए लाया जा रहा है ? यह संशोधन किस आंदोलन को सम्बोधन कर रहा है ? इस संशोधन को अगर ध्यान से देखा जाय तो यह असफल होने के लिए लाया गया संशोधन ही है जो पारित होने के बाद भी देश और मधेस का कोई हित नही कर सकता।बाहर से देखने के लिए भले ही संसोधन लगे पर अंदर कुछ ख़ास परिवर्तन नही हुआ है।
इस संशोधन की शुरुआत देखें तो लिखा है नेपाल के संविधान संशोधन के लिए बना विधेयक।
विधेयक की प्रस्तावना को देखें तो लिखा है नेपाल के संविधान में संशोधन वांछनीय होने के कारण नेपाल के संविधान का धारा २९६ के उपधारा १ बमोजिम व्यवस्थापिका संसद द्वारा यह संशोधन जारी किया गया।
सवाल यह उठता है कि यह संशोधन विधेयक है या जारी किया गया संशोधन ? यहाँ अपने मन से समझने के बजाय संविधान संशोधन विधेयक की भाषा पर ध्यान देना उचित होगा।
७ बुँदे संशोधन प्रस्ताव के अनुसार माने तो यह सिर्फ प्रस्ताव है तो ठीक है, नही तो अगर बूंदा न १ के अनुसार माने तो यह संशोधन हो चूका है और यह तुरंत लागू हो जाएगा। या यूँ कहें तो लागू हो गया माना जाना चाहिये।
संशोधन के बूंदा न २ को देखने पर नेपाल सरकार के अनुसार भाषा आयोग को भाषा की जिम्मेदारी दी जायेगी इसमें सिर्फ मातृ भाषा की बात कही गई है।
बूंदा न ३ के अनुसार सरकारी काम काज के भाषा के बारे आयोग बनाने की बात कहना सिर्फ बात टालने जैसा ही है, क्योंकि नेपाल के आयोग का काम कारवाही का बहुत उदहारण सामने है जिसके लिए मधेसी आयोग को ले सकते हैं। इस तरह से जब तक आयोग का निर्णय नही आएगा तब तक नेपाली भाषा ही काम काज की भाषा होगी। अगर आयोग किसी कारण वश विघटन हो गया तो ? इसके बारे कोई स्पष्ट नीति भी यह संसोधन नही दे रहा है।
बूंदा न ४ के अनुसार नागरिकता के सवाल पर सिर्फ भाषागत हेरफेर है। पहले भी विदेशी महिला को शादी के बाद अंगीकृत नागरिकता मिलती थी अब भी मिलेगी।तो इसमें संशोधन करने जैसी कोई चीज नही दिख रही है, सिर्फ नागरिकता की चर्चा करने के लिए ही यह बूंदा रखा गया है, उसके अलावा कुछ नही।
बूंदा न ५ में एक तरफ तो जनसंख्या के अनुसार सहभागिता की बात की गई है दूसरी तरफ सदस्य की संख्या ५६ उल्लेख किया गया है। इस के अनुसार इस धारा को कितनी बार संसोधन किया जाएगा ? क्या जब जब देश की जनसंख्या बढ़ेगी तब तब संशोधन हो कर सदस्य संख्या बढ़ेगी या ५६ का ५६ ही रहेगी ?
अगर गाविस नगरपालिका निर्वाचन क्षेत्र जनसंख्या के आधार पर नही हुई तो इस बूंदा से संशोधन से मधेसी थारु आदिवासी जनजाति को कुछ नही मिलने वाला।
बूंदा न ६ में संविधान में नेपाल में कितनी तरह की मातृभाषा है इसका उल्लेख नही था वह उल्लेख करने की बात हुई। छूट को सुधारा गया है।
बूंदा न ७ में प्रदेश के सीमांकन में हेरफेर की गई है लेकिन विवादित क्षेत्र का झापा मोरंग सुनसरी कैलाली कंचनपुर के बारे कुछ भी नही बोला गया।
इस संशोधन से यह स्पष्ट लग रहा है कि सरकार सिर्फ अपनी आयु लंबी करने और प्रचण्ड जी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए ही लाया गया है। देश की समस्या को ताख पर रख कर उलु जुलूल तरीका से लाया गया संशोधन प्रस्ताव् सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय जगत में ढिंढोरा पीटने और सत्ता का समय लंबा करने के अलावा किसी भी दूसरे उद्देश्य से नही लाया गया।
इस संविधान संसोधन विधेयक से देश में निकास के बदले और भी द्वन्द की ही सृजना होगी। क्योंकि एमाले संशोधन शब्द का ही विरोधी है, मधेसी की मांग को यह संशोधन सम्बोधन नही कर रहा है, माओबादी के नेता अपना निर्वाचन क्षेत्र बचाना चाहते हैं तो इसका समर्थन करेगा कौन ?
प्रचण्ड सरकार को यह सोचना चाहिए क़ी ऐसी हरकत जिससे किसी को फायदा नही है करने से क्या होगा हाँ थोडी देर के लिए दिग्भ्रमित कर सकते हैं किन्तु परिणाम शून्य ही होगा । ?

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