संविधान सभा का प्रतिगमनकारी चरित्र और तमरा अभियान की भावी कार्यदिशा

dibesh jhaसंविधान सभा का दूसरी बार चुनाव होकर नई संविधान सभा का कार्यकाल लगभग आठ महीने पार कर चुका है । इस दूसरे निर्वाचन में तर्राई मधेस राष्ट्रीय अभियान ने भाग नहीं लिया था । अभियान की स्पष्ट मान्यता थी कि, निर्वाचन से पर्ूव ही तत्कालीन सरकार द्वारा विगत में मधेस के साथ हुए समझौतों की पुनर्पुष्टि की जाय ताकि भविष्य में गठित होने वाली सरकार उन समझौतों से मुकर न सके । परन्तु राज्य सत्ता पर काबिज समुदाय ने इस मांग को अनदेखा कर दिया और दम्भ से भरे हुए मधेस केन्द्रित दलों ने उपहास करते हुए चुनाव में भाग लिया । जिसका परिणाम वही हुआ जो अपेक्षित था । ने.का. को प्रत्यक्ष में १०५ और समानुपातिक में ९१ अर्थात कुल १९६, इसी प्रकार से ने.क.पा. -एमाले) को प्रत्यक्ष में ९१, समानुपातिक में ८४ अर्थात कुल १७५, ने.क.पा.-एमाओवादी) को प्रत्यक्ष २६ समानुपातिक ५४, कुल ८० और रा.प्र.पा.-ने) को समानुपातिक में २४ सीटें प्राप्त हैं । सभी मधेस केन्द्रित दलों को कुल मिलाकर ५० सीटें प्राप्त हर्ुइ हैं । बांकी दलों की उपस्थिति नगण्य है । इस प्रकार से कहा जा सकता है कि यही राजनीतिक दल संविधान सभा में निर्ण्ाायक रहेंगे । इसलिये इन दलों के चुनावी घोषणा पत्र का विश्लेषण और इनके नेताओं का वक्तव्य सम्भावित नये संविधान का आकलन करने में प्रमुख होंगे । तमरा अभियान ने अपनी धारणा का निर्माण इसी आधार पर किया है ।
नेपाली कांग्रेस
दूसरी संविधान सभा में सबसे बडी पार्टर्ीीे रूप में पुनर्स्थापित इस दल ने ५ प्रान्तों का प्रस्ताव अपने घोषणापत्र में किया है । स्पष्ट है कि यह दल नेपाल में पहले से स्थापित विकास क्षेत्र को ही नये रूप में प्रान्त का दर्जा देना चाहता है । नवलपरासी में हुए पार्टर्ीीे महासमिति बैठक में भी ७ या १३ प्रदेशों को स्वीकार किया गया था । ने.का. के सभापति ने भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रश्न के जवाब में समग्र मधेस एक प्रदेश को अस्वीकार कर दिया था । मधेस के हितों की रक्षा के लिये समावेशी विधेयक अत्यन्त महत्वपर्ूण्ा है । पिछले व्यवस्थापिका संसद में इस विधेयक की प्रस्तुति में रुकावट लाकर ने.का. ने स्वयं को मधेस के हित विपरीत काम करने वाली पार्टर्ीीे रूप में ही प्रस्तुत किया है । राज्यपर्ुनर्संरचना समिति में भेजे हुए अपने प्रतिनिधियों द्वारा विवाद करवाकर इस दल ने सहमति नहीं होने दिया । संविधानतः प्रत्येक दस वर्षों में होने वाली राष्ट्रीय जनगणना के पश्चात् निर्वाचन क्षेत्र का पुनर्निधारण अनिवार्य है परन्तु ने.का. ने ही इस अनिवार्यता को पूरा नही होने दिया । गणतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य में दिये अपने भाषण में पार्टर्ीीभापति द्वारा सहमति नहीं हो पाने पर प्रक्रियागत ढंग से निर्ण्र्ाालिये जाने की बात कही गई थी । कुछ ही दिनों पहले पार्टर्ीीपसभापति रामचन्द्र पौडेल ने भी किसी भी कीमत पर संविधान जारी करवाने की बात कही थी । स्पष्ट है कि पार्टर्ीीपने अधिक सभासद होने के दम्भ में है और सहमति की राजनीति छोडÞ चुकी है । २०६३ साल में हुए मधेस आन्दोलन के समय इसी दल के तात्कालीन सभापति स्व. गिरिजा प्रसाद कोइराला प्रधानमंत्री थे । वर्तमान पार्टर्ीीहासचिव कृष्णप्रसाद सिटौला उन दिनों गृह मंत्री थे, जिनके आदेश निर्देश पर पुलिस ने गोलियां चलाईं । जिससे ५० से अधिक मधेसी शहीद हुए और सैकडों की तादाद में निर्दोश मधेसी घायल हुए । इसी दल के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार के अर्थ मंत्री ने भारतीय नम्बर प्लेट वाली गाडिÞयों पर नेपाल प्रवेश में लगने वाले करों में भारी वृद्धि की है । स्वाभाविक है कि इसका असर भी भारत की सीमाओं से सटे हुए मधेस के बाजारों पर ही पडÞेगा । इस प्रकार यह स्पष्ट दिखता है कि नेपाली कांग्रेस पार्टर्ीीांगठनिक रूप से ही मधेस विरोधी है ।
ने.क.पा.-एमाले)
ने.क.पा.-एमाले) के पर्ूव अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने मधेसी पहचान के नारे पर आधारित दलों के कारण सामाजिक सद्भाव बिगाडÞने की बात कही थी । गणतन्त्र दिवस पर उन्होंने ५ प्रदेश या अधिक से अधिक ७ प्रदेश पर सहमति किये जाने पर जोर दिया था । वर्तमान अध्यक्ष के.पी.शर्मा ओली ने स्पष्ट रूप में ५ प्रदेश बनाये जाने की बात की है वह भी उत्तर दक्षिण के रूप में । इस दल में महेन्द्रवादी राष्ट्रवाद का जोर अधिक है, तो उन्हें मधेसियों में राष्ट्रवादिता दिखती ही नहीं । ने.क.पा. -एमाले) को संघीयता जमीन का बंटवारा लगता है । समग्र मधेस एक प्रदेश को वे देश का विभाजन करने की साजिश बताकर सम्पर्ूण्ा मधेसी समुदाय को ही अपमानित करने में कोई संकोच महसूस नहीं करते । इस दल के नेता एवं पर्ूव प्रधानमंत्री माधवकुमार नेपाल द्वारा विशेष सुरक्षा योजना के नाम पर मधेस में हजारों युवाओं को बन्दी बनाया गया और वे आज भी बिना किसी ठोस प्रमाण के नेपाल की जेलों में सडÞ रहे है । मधेसियों के नेपाली सेना में समूहगत प्रवेश को इस दल के नेताओं ने नाभि का बल प्रयोग कर नहीं होने दिया । सामर्थ्य और पहचान की अपव्याख्या करके इनके नेता मधेस को अस्तित्वविहीन बना देना चाहते हैं । मधेस आन्दोलन के दौरान तत्कालीन सरकार और मधेसी दलों के साथ हुए समझौतों को भी मानने से यह दल इनकार करता है । अभी कुछ ही समय पर्ूव सम्पन्न ने.क.पा.-एमाले) के महाधिवेशन में एक भी मधेसी केन्द्रीय पदाधिकारी के रूप में निर्वाचित नहीं हो सका । इस दल के एक बडेÞ मधेसी नेता धर्मनाथ साह ने सहारा टाइम्स को बताया की ओली गुट में होने के बावजूद वे इसलिये नहीं चुने जा सके क्योंकि उस गुट में सिर्फवे ही मधेसी थे ।
ए.ने.क.पा.-माओवादी)
संघीयता के पक्ष में दलील देने वाले इस दल के लिये संघीयता एक रणनीतिक अस्त्र है । माओवादियों के द्वारा जनयुद्ध चलाये जाने के दौरान विशेष रूप से पहाडÞों पर अपने सैन्य संगठन विस्तार अभियान में वहां के विभिन्न समुदायों को आकषिर्त करने हेतु उन्होंने जातीय संघीयता का नारा दिया था । मधेस द्वारा प्रस्तावित संघीयता से इसका कोई लेना देना नहीं है । १४ प्रान्तों का प्रस्ताव करके माओवादी मधेस को खण्डित करना चाहते हैं । समग्र मधेस एक प्रदेश की मांग को अस्वीकार करने का यह एक अप्रत्यक्ष रूप ही है । मिथिला, अवध, भोजपुरा इत्यादि मधेस के लिये लोक लुभावन शब्दावली का प्रयोग वास्तव में सिर्फभ्रम बनाने के लिये है । क्योंकि मधेस में स्थापित इस दल की लगभग सभी सरचनाओं का नेतृत्व गैर मधेसी व्यक्तियों द्वारा ही करवाया जाता रहा है । अत्यन्त अपमानित व्यवहार किये जाने के कारण ही जयकृष्ण गोइत, मातृका यादव जैसे मधेसी नेतागण इस दल को त्यागने पर मजबूर हुए थे । मधेस आन्दोलन के प्रथम शहीद स्व. रमेश महतो की हत्या कर मधेसियों के शान्तिपर्ूण्ा पर््रदर्शन को हिंसक बनाकर उसी बहाने से अपनी जनसेना के परिचालन की कुटिल साजिश करने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है । मधेस आन्दोलन को नेपाली सेना और जनसेना के संयुक्त परिचालन द्वारा कुचलने का प्रस्ताव माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने उसी समय किया था । इससे भी माओवादियों का मधेस के प्रति दृष्टिकोण समझा जा सकता है । मधेसियों का नेपाली सेना में समूहगत प्रवेश को किसी हद तक नेपाली सेना द्वारा स्वीकार किये जाने के बावजूद तत्कालीन बाबूराम भट्र्राई की सरकार के अर्थमंत्री वर्षान पुन द्वारा बजट देने से इन्कार किये जाने के कारण ही मधेसियों का सेना में समूहगत प्रवेश नहीं हो पाया ।
रा.प्र.पा.-ने)
हिन्दुत्व की बैशाखी पर इस संविधान सभा में सिर्फसमानुपातिक सभासद के लिये हल्का जनमत पाने में सफल रा.प्र.पा.-ने) मूल रूप में एक राजावादी पार्टर्ीीै । किसी भी प्रकार के राजतन्त्र में संघीयता सम्भव नहीं होता । इसी अवधारणा के तहत यह दल भी नेपाल में केन्द्रीकृत शासन प्रणाली का पक्षधर ही है । जेठ १५ गते को गणतन्त्र दिवस के अवसर पर पार्टर्ीीे अध्यक्ष कमल थापा ने अमर्ूत संघीयता में न जाने का सुझाव इसी पर्रि्रेक्ष्य में दिया था । तमरा अभियान के दृष्टिकोण में रा.प्र.पा.-ने) चारित्रिक रूप से ही संघीयता विरोधी होने के कारण मधेस के हित विपरीत काम करने वाली पार्टर्ीीै ।
मधेस केन्द्रित दल
दूसरी संविधान सभा में अपनी शर्मनाक उपस्थिति के लिये स्वयं जिम्मेवार ये दल अपने रूप रंग के कारण मधेस को प्रतिविम्बित करने का लाभ पाते रहे हैं । मधेस आन्दोलन के उग्र ताप द्वारा स्थापित इन दलों में व्यक्तिगत स्वार्थ, अराजनीतिक चरित्र, सत्तालोलुपता, गुटबन्दी और मुद्दा का परित्याग कर देने के कारण ये अपने ही समुदाय में उपेक्षित हैं । तमरा अभियान द्वारा निर्वाचन पर्ूव किये गये आकलन अनुरूप ही प्राप्त हुए परिणामों को अभी भी इन दलों ने गम्भीरतापर्ूवक लेने में हिचकिचाहट दिखाई है । एन.जी.ओ.अथवा प्राइवेट कम्पनी की तरह अपने दलों को चलाने की इच्छा रखने वाले इन दलों के नेताओं ने समानुपातिक प्रतिनिधि के मनोनयन में अपने रिश्तेदारों को चुनकर इस आरोप की पुष्टि कर दी है । सत्ता का र्समर्पण और मुद्दों का बिर्सजन कर स्वयं को साक्षी के रूप में उपस्थित कर ये मधेसी दल और इनके नेतागण मधेस को दर्ीघकालीन रूप में शासन में स्वामित्व से वंचित करवाने का काम ही करेंगे । व्यक्तिगत एवं जातीय लाभ हानि की राजनीति में सीमित हो चुके इन दलों के नेताओं की सोच के कारण भविष्य में मधेस को क्षति की संभावना ही अधिक है । अतः तमरा अभियान की नजर में मधेस नामधारी ये दल और इनके नेताओं का पतन ही मधेस की मुक्ति का मार्गचित्र हो सकता है ।
निष्कर्षने.का., ने.क.पा.-एमाले), ने.क.पा. -एमाओवादी) और रा.प्र.पा.-ने) सहित कई दलों के नाम पर पहाडÞी समुदाय के लोग सभासद के रूप में उपस्थित हैं । इस संविधान सभा में निर्ण्ाायक भूमिका में रहे इन चार दलों के सभासदों की कुल संख्या ४७५ है । यह संख्या कुल उपस्थित सभासदों की ८० प्रतिशत से अधिक है । संसदीय व्यवस्था में दलों की केन्द्रीय समिति या संसदीय दल का निर्ण्र्ााही सर्वोपरि होता है । इन चारो दलों में एक ही समुदाय खस आर्य -पहाडी ब्राहृमण क्षेत्री) का वर्चस्व है । जिन्हें संघीयता शब्द से ही भय लगता है । सैकडÞों वर्षों से राज्य सत्ता पर काबिज यह समुदाय किसी कीमत पर अपनी पकडÞ कम होने देना नहीं चाहता । सरकार, सदन, सुरक्षा निकाय और न्यायालयों पर वर्षों की पकडÞ को योजनाबद्ध ढंग से उपयोग करते हुए यह समुदाय संविधान सभा के माध्यम से मधेस की इच्छा अनुरूप का संघीयता होने नहीं देगा । अगर किसी राजनीतिक कारण से बाध्य होकर इस समुदाय को संघीयता स्वीकार करना ही पडÞा तो यह एक ऐसी संघीयता का निर्माण करवाएगा जिसमें इसी समुदाय का वर्चस्व बना रहे । जहां तक मधेस केन्द्रित दलों की भूमिका का प्रश्न है तो अपने ही कार्यकर्ताओं को ठगने में लगे हुए इनके नेताओं से कुछ भी आशा करना र्व्यर्थ है । इस संविधान सभा में साक्षी के रूप में उपस्थित होकर ये मधेस को पराधीन बनवाने में ही योगदान देंगे । इस संविधान सभा से पहचान युक्त संघीयता सहित का संविधान बनाने में असफल रहने की सम्भावना है । अगर किसी सूरत में संविधान बन ही जाता है तो वह घोर मधेस विरोधी होगा । ऐसी स्थिति में सशक्त जनदबाव ही एकमात्र उपाय बच जाता है । इसीलिये तमरा अभियान मधेसी जनमानस को वर्तमान राजनीतिक अवस्था से परिचित करवाने तथा सडÞक संर्घष्ा एवं जनदबाव के अन्य लोकतान्त्रिक उपायों के लिये तैयार करने हेतु प्रयासरत है । मधेसी जनमानस को प्रशिक्षित करना और संर्घष्ा के लिये तैयार करना ही अभियान की भावी कार्यदिशा है ।
-लेखक तमरा अभियान के विदेश विभाग प्रमुख हैं)

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