संविधान सभा की हत्या क्यों ?

रामाशीष

राजा महेन्द्र एवं वीरेन्द्र की तानाशाही पंचायती शासन का नेपाल हो अथवा ‘महामानव’ बी. पी. कोइराला का प्रजातांत्रिक नेपाल। ‘लौह पुरुष’ गणेशमान सिंह एवं ‘संत नेता’ कृष्ण sambidhan_sabhaप्रसाद भट्टर्राई का नेपाल हो अथवा लम्बे अर्से तक प्रधानमंत्री पद पर विराजमान रहे नेपाली कांग्रेस नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला का नेपाल। कम्युनिस्ट नेता मनमोहन अधिकारी, माधव कुमार नेपाल और झलनाथ खनाल का नेपाल हो अथवा हजारों निरीह नेपालियों की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद पर कब्जा जमानेवाले माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल एवं बाबूराम भट्टर्राई का नेपाल। इन सभी महान –) हस्तियों के कार्यकाल में, राजगद्दी एवं शासन हथियाए हुए रहने के मुद्दों पर समय-समय पर मतभेद हुए। सरकारें बनीं, गिरीं और तत्कालीन ‘सत्ताभोगी-भत्ताभोगी’ नेताओं में लेन-देन के मामलों पर उठा-पटक हर्ुइं, सहमतियां बनीं और टूटी भी। यहां तक कि उनमें मतभेद के साथ ही घृणित मतभेद भी पैदा हुए। लेकिन हां, एक वाक्य में कहा जाए तो हिन्दी, हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों से मिलते-जुलते चेहरेे एवं बेटी-रोटी के रिश्तेवाले देश की आधी से अधिक आबादीवाले हिन्दीभाषी मधेशियों के मुद्दों पर न तो कभी कोई मतभेद एवं मनभेद पैदा होने की नौबत आयी तथा न ही सहमति जुटाने के लिए एक वर्गविशेष के कांग्रेस-कम्युनिस्ट-राजावादी नेताओं को कोई कसरत करनी पडÞी। उक्त तीनों मुद्दों पर शासक वर्ग के नेताओं को न ही बैठक पर बैठक बुलानी पडÞी और न ही पांच सितारे होटलों या रिसोर्ट में गप्पे मारने का नाटक करना पडÞा।
उक्त चारो ही मुद्दों पर राजा से लेकर राजनीतिक नेताओं तक में एक सोची-समझी-सदाबहार सहमति कायम रहती आयी है और वे अपने इस स्टैंड पर कायम रहते आए हैं कि –
    हिन्दी नेपाल की भाषा नहीं है,
    हिन्दुस्तान, नेपाल को हडपना चाहता है,
    नेपाल के ‘मधेशी’ नेपाली नहीं अपितु हिन्दुस्तानी हैं तथा मारवाडÞी और मधेशी के रूप में हिन्दुस्तान ही तो नेपाल का शोषण कर रहा है, लूट रहा है।
नेपाल के राजा एवं राजदरबार के दूध-पानी में पले-बढेÞ एक वर्गविशेष के शासकों के इसी सोंच का परिणाम हुआ कि ‘गोरखा’ राजाओं के लगभग ढर्Þाई सौ वषर्ाें के शासनकाल में मधेशियों को, दरबार के आहाते में झाडÞू लगाने और गोरखा सिपाहियों के घोडÞे की लीद फेंकने तक के काम पर नहीं लगाया गया। क्योंकि, गोरखा राजाओं के दिलो-दिमाग में इस बात का आक्रोश था कि ‘काठमांडू’ घाटी के मल्ल राजाओं की सेना में १२ सौ ‘तिरहुतिया-सिपाही’ तैनात थे, जिन्होंने गोरखा राजा पृथ्वीनारायण शाह के काठमांडू घाटी पर किए गए हमले का प्रतिरोध किया था। नेपाल के राणा शासकों ने भी अपने १०४ वर्षके शासनकाल में मधेशियों को कोसों दूर रखा, यहां तक कि १९५० में स्थापित तथाकथित प्रजातंत्र में भी मधेशियों को सेना-पुलिस सहित किसी भी राजकाज में टपकने नहीं दिया।
राजा, राजदरबार एवं नेपाली प्रजातंत्र के स्वघोषित ठेकेदारों एवं शासकों के मन की इस भडÞांस का समय-समय पर विस्फोट भी हुआ। और इसी कडÞी में, राजा महेन्द्र ने ‘अपने पालतू’ तीन पढÞे-लिखे मधेशी चहेतों को आगे रखकर ‘हिन्दी’ के पठन-पाठन पर रोक लगा दी और १९६५ के जून-जुलाई का ही महीना था, जिसमें अमेरिकी सहयोग से निर्मित पाठयक्रमों से हिन्दी को सदा-सदा के लिए बिदा कर दिया गया। और, इसके साथ ही राजा, राजदरबार एवं कुछ पंडित-पुजारियों एवं सेना सिपाहियों के परिवारों की ‘बोलचाल’ की भाषा को ‘नेपाली’ नाम देते हुए सरकारी कामकाज की भाषा और राष्ट्रभाषा तक का दर्जा दे दिया। जबकि, इससे पहले तर्राई क्षेत्र के सभी स्कूलों तथा राजधानी के शिक्षण संस्थानों में हिन्दी पढÞायी जाती थी। तब, नेपाल की परीक्षाएं बिहार के पटना विश्वविधालय के अर्न्तर्गत संचालित थीं जिसका माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी थी। सन १९६० में राजा महेन्द्र द्वारा ‘बी.पी. कोइराला-प्रजातंत्र’ की हत्या के बाद, स्थापित तीस वषर्ाें के पंचायती शासन तथा १९९० में पुनर्स्थापित बहुदलीय-संसदीय प्रणाली से लेकर आज तक हिन्दी पुनर्स्थापित नहीं हो सकी और उसका निषेध आज भी जारी है।
स्मरणीय है कि पुनर्स्थापित संसदीय प्रणाली के प्रथम प्रधानमंत्री कृष्णप्रसाद भट्टर्राई ने ‘नवभारत टाइम्स’ को दी गई पहली भेंटवार्ता में कहा था कि ‘नेपाल में हिन्दी न केवल तर्राई क्षेत्र के मैथिली, भोजपुरी, थारू तथा अवधी भाषाभाषियों को जोडÞती है अपितु दर्ुगम-पहाडÞर्-पर्वतों के निवासियों को तर्राई क्षेत्र से भी जोडÞती है। क्योंकि, पहाडी लोग जब काम की खोज में तर्राई में आते हैं तो वह टूटी-फूटी हिन्दी भाषा में ही बोलने की कोशिश करते हैं। यही नहीं, हिन्दी भाषा के जरिए ही पडÞोसी मित्र देश भारत के साथ आत्मीय संबंध को प्रगाढÞ बनाया जा सकता है।
नेपाल के सन्त नेता की इस महान वाणी का उनके ही कांग्रेसी चेले-चपाटों ने सम्मान नहीं किया फलस्वरूप नेपाल में हिन्दी आज भी अपनी प्रतिष्ठा के लिए शून्य में ताक रही है। संतोष की बात यह है कि पिछले दो-तीन दशकों में हर्ुइ ‘मीडिया क्रान्ति’ के कारण नेपाल के दर्ुगम क्षेत्रों से लेकर राजधानी एवं शहरी क्षेत्रों के बच्चे-बूढÞे भी न केवल हिन्दी समझते-बोलते हैं बल्कि नेपाल के लगभग चार सौ एफ.एम. रेडियो स्टेशन, चौबीसो घंटे अपने मधुर हिन्दी फिल्मी गीतों, भजनों और पाँप संगीतों के द्वारा हिन्दी को नेपाल के जनजन तक पहुंचाने में अपना अत्यन्त ही महत्वपर्ूण्ा सहयोग दे रहे हैं। क्या, नेपाल के एक वर्गविशेष के शासक इसका जबाब देना चाहेंगे कि भारत के विभिन्न शहरों में नौकरी-चाकरी कर रहे लगभग ८७ लाख नेपाली किस भाषा में बोलते हैं –
इसी प्रकार जहां हिन्दुस्तान-भारत का सवाल है तो राजा महेन्द्र द्वारा निर्धारित उस मानदंड को लागू करने में राजा वीरेन्द्र एवं राजा ज्ञानेन्द्र से लेकर पंचायतवादी, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट तथा माओवादी नेता तक कभी भी पीछे नहीं रहे, जिसमें चीन की आरती उतारने और भारत के प्रति घृणा फैलाने वालों को प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है। जबकि, बेटी-रोटी के रिश्ते से जुडÞे हिन्दुस्तान -इंडिया) के प्रति सकारात्मक सोच रखनेवाले, नेपाल के विकास में हिन्दुस्तानी सहयोग के प्रति कृतज्ञता का भाव रखनेवाले तथा स्नेह-सदभाव व्यक्त करनेवालों को नेपाल का राष्ट्रघाती माना जाता रहा है। वैसे यदि नेपाल के शासकों द्वारा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर, भारतीय राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन, राष्ट्रपति डा. वी.वी. गिरि, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा भारतीय संसद के स्पीकर बलराम जाखडÞ तक नेताओंं तथा कूटनीतिज्ञों के किए गए घोर अपमानों की फेहरिस्त बनायी जाए तो उन किस्से-कहानियों से सैकडÞो पृष्ट भर जाएंगे।
कुछ ही वर्षपहले नेपाली कांग्रेस नेता तथा प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के कार्यकाल में चितवन जिले के एक ‘लेटरपैडी’ पत्रिका द्वारा फैलाए गए अफवाह की लहर में सैकडÞो भारतीय, मारवाडÞी और मधेशी राजधानी की सडÞकों पर दिन-दहाडÞे पीटे गए और उनके निवास स्थानों पर हमले हुए। बिल्कुल ही निराधार आरोप यह था कि भारतीय सिने-कलाकर ऋतिक रोशन ने नेपाल के बारे में अपमानपर्ूण्ा टिप्पणी की है और कहा है कि उन्हें नेपाल पसन्द नहीं। हाल के दिनों को याद करें तो नेपाल के पर्ूव प्रधानमंत्री तथा माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल ने भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चक्र और भारत के राष्ट्रीय तिरंगे झंडे को एक जूता में दिखाते हुए बडÞे-बडÞे पोस्टर बनवाए और देश भर में उन्हें चिपकाया। इन्हीं माओवादियों ने भारतीय सहयोग से निर्मित स्कूल भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए विशिष्ट अतिथि के रूप में पहुंचे भारतीय राजदूत राकेश सूद पर जूते फेंकवाए। और, अभी-अभी एक तरोताजी चौंकानेवाली घटना सामने आयी है जिसमें नेपाल के सीमा नगर वीरगंज स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास में कार्यरत एक डिप्लोमैट एस.डी. मेहता पर एक अखबार द्वारा यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक रात्रिभोज के दौरान नेपाल के मधेशियों को उकसानेवाली आपत्तिजनक अभिव्यकित दी। इस समाचार के प्रकाशित होते ही भारतीय राजदूतावास ने इसका जोरदार खण्डन किया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने भी इस आरोप से इंकार करते हुए उसे निराधार बताया। यही नहीं उक्त भोज के आयोजकों ने भी संयुक्त बयान जारी कर, उस समाचार को कपोल कल्पित बताया। फिर भी नेपाली नेताओं की संजोयी हर्ुइ बौखलाहट आखिर बाहर आ ही गई। सबसे पहले नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद को अपने कार्यालय में सम्मन किया -औपचारिक रूप में बुलाया) और स्पष्टीकरण मांगा। जबाब में भारतीय राजदूत ने वहां भी उक्त खबर को निराधार बताते हुए उसका खंडन किया। इन सारी प्रक्रियाओं को भारत द्वारा औपचारिक रूप में पूरा करने के बाद भी बताते हैं कि नेपाल के प्रधानमंत्री निवास पर हिन्दुस्तान के खिलाफ एक विशेष मुहिम चलाया गया कि क्यों नहीं, मिस्टर मेहता को ‘आवांछनीय कूटनीज्ञ’ घोषित कर नेपाल से देशनिकाला कर दिया जाए – पता चला कि प्रधानमंत्री निवास पर ही देशनिकाला करने पर सहमति जुटाने के लिए नेपाल की प्रमुख पार्टियों के नेताओं की बैठक बुलायी गई और देश निकाला करने के लिए तैयार किए गए पत्र पर दस्तखत करने को कहा गया। सूत्रों का कहना है कि एक परिपक्व नेता के रूप में परिचित नेपाली काग्रेस सभापति सुशील कोइराला, एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) अध्यक्ष झलनाथ खनाल और माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल तक ने उस पर हस्ताक्षर कर दिया। लेकिन, मामला तो तब बिगडÞा जब पत्र को सरकार में शामिल मधेशी जनाधिकार फोरम -लोकतांत्रिक) के अध्यक्ष तथा गृहमंत्री विजय कुमार गच्छदार के पास दस्तखत करने के लिए भेजा गया और उन्होंने उस सहमतिपत्र पर दस्तखत करने से साफ-साफ इंकार कर दिया। सुशील कोइराला जैसे परिपक्व नेता ने मात्र एक अखबारी खबर के आधार पर भारतीय डिप्लोमैट को निकालने के लिए तैयार किए गए सहमति पत्र पर दस्तखत किया इस में आर्श्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि वास्तविकता तो यह थी कि भारत विरोधी भावनाओं से ग्रस्त उक्त सभी नेताओं की बौखलाहट थी, जो इस निराधार घटना से फूटकर बाहर आ गयी।
अब मामला मधेशियों का- तो मधेशियों के प्रति नेपाल के एक वर्ग विशेष, जातिविशेष के शासकों की उसी सोच का परिणाम था कि राजा वीरेन्द्र ने १९७४-७५ में दरबार पालित-पोषित लोगों द्वारा भारत-नेपाल सांस्कृतिक केन्द्र में तोडÞफोडÞ कराया और इसके तुरन्त बाद राजधानी के गली-मुहल्लों में फल-फूल एवं शाक-सब्जियां बेचकर जीवन-बसर कर रहे भारी संख्या में मधेशियों को यह कहते हुए खुले ट्रकों में ठूंस-ठूंसकर सीमापार के भारतीय नगर रक्सौल में ठेलवा दिया कि वह सभी हिन्दुस्तानी हैं। इस पर भारतीय सीमा से लगे हुए तर्राई क्षेत्र के कुछ जागरूक मधेशी बुद्धिजीवी एवं राजनीतिक नेता चौकन्ना जरूर हुए लेकिन शासन की तानाशाही के कारण उस कार्रवाई के विरोध में चूं करने की भी हिम्मत नहीं जुटा सके।
मधेशियों को तो सबसे भारी झटका तब लगा, जब राजा वीरेन्द्र के शासन द्वारा डा. हर्कबहादुर गुरूंग के नेतृत्व में १९८३ में एक बर्साई-सर्राई आयोग गठितकर, उसकी रिपोर्ट में तर्राई के भूमिपुत्र मधेशियों को भारतीय करार दिए जाने का स्पष्ट संकेत था। तानाशाही पंचायती शासन के इसी षडयंत्र का पर्दाफाश करने तथा संभावित देश निकाला की स्थिति से निबटने के लिए नेपाल सदभावना परिषद नामक एक गैर-राजनीतिक संगठन बनाया गया। और, वयोवृद्ध मधेशी नेता बाबा रामजन्म तिवारी एवं नेपाली कांग्रेस नेता गजेन्द्र नारायण सिंह के नेतृत्व में अपने अधिकार के लिए मधेशियों का संर्घष्ा प्रारंभ हुआ। उसी का परिणाम हुआ कि १९९० के जन-आन्दोलन के बाद निर्मित संविधान द्वारा स्थापित बहुदलीय संसदीय प्रणाली के तहत कराए गए १९९१ के निर्वाचन में नेपाल सदभावना परिषद ने ‘नेपाल सदभावना पार्टर्ीीका रूप ले लिया। जो आज कुकुरमुत्ते की तरह राजनीतिक दुकानों के रूप में फैलती ही जा रही है। जो भी हो, विभाजित सदभावना पार्टियों के अतिरिक्त आज कई अन्य मधेशी नेतृत्व की पार्टियों द्वारा राजसत्ता में मधेशियों की समानुपातिक हिस्सेदारी के लिए संर्घष्ा जारी है। मंजिल दूर नहीं, क्योंकि विभाजित मधेशी पार्टियों के बीच मधेश एवं मधेशियों के अधिकारों की मांग पर कोई विवाद नहीं। वैसे भी यह स्वयंसिद्ध है कि ‘खेतों में सूखे हुए धान के पौधे से जमीन पर झरे हुए धान के दानों से उगनेवाले पौधों में भी धान ही फलेगा, मकई-गेहूं कदापि नहीं।
उम्मीद थी कि लगभग पन्द्रह-बीस हजार निर्दाेष एवं निरीह देशवासियों की नृशंस हत्या के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री की गद्दी पर विराजमान हुए पुष्पकमल दहाल और डा. बाबुराम भट्टर्राई के माओवादी शासन में लगभग र्ढाई सौ वषर्ाें से गुलामी का जीवन जीते आ रहे देश की आधी से भी अधिक आवादीवाले मधेशियों को भूगोल, भाषा और संस्कृति के आधार पर अपनी पहचान का प्रदेश अथवा प्रान्त मिलेगा, जिनमें वह अपने मधेशी बुजर्ुगाे, विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों के सहयोग से विकास की गति तेज कर सकेंगे। मधेश से विदेशों में पलायन हो रही युवाशक्ति को अपने प्रान्त में ही रोक सकेंगे और प्रान्त के विकास में लगा सकेंगे। उनकी अपनी सुरक्षा व्यवस्था होगी तथा वह सेना और पुलिस सेवा से लेकर देश की अन्य सेवाओं में अपना समुचित स्थान पा सकेंगे।
लेकिन सारा गुडÞ गोबर हो गया। मधेश आन्दोलन की सबसे बडÞी उपलब्धि ‘संघीय राज्य’ की कल्पना साकार नहीं हो सकी। दो वर्षों के लिए निर्वाचित ६०१ सदस्योंवाली संविधान सभा ने संविधान निर्माण के लिए चार वर्षका समय लिया फिर भी संविधान नहीं बन सका और संविधान सभा आत्महत्या करने को विवश हर्ुइ। अभी तक प्रकाशित संविधान निर्माण संबंधी अभिलेखों से तो यह स्पष्ट हो गया है कि ‘अन्त में संघीयता के सवाल पर ही विवाद पैदा हुआ और जेठ १२ की आधी रात को देश को डावांडोल राजनीतिक भंवर में छोडÞ संविधान सभा ने सत्ताभोगी-भत्ताभोगी निकृष्ट चरित्र के विलासी नेताओं और जनता से अलबिदा कह दिया।
संविधान सभा द्वारा गठित आयोग के सदस्य तथा नेवार विद्वान प्रो. कृष्ण हाथेछू की मानें तो इसका कारण केवल ‘ब्रहृमणवाद’ था। सरकार में शामिल एक पार्टर्ीीे नेता के यह कहने में दम था कि प्रान्तों की संरचना या तो संविधान सभा राज्य व्यवस्था समिति की रिपोर्ट के आधार पर की जाए या संविधान सभा द्वारा गठित आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर। राजनीति शास्त्र ज्ञाता प्रो. हाथेछू के अनुसार संविधान सभा राज्य समिति की रिपोर्ट के आधार पर यदि राज्यों का गठन होता तो उसकी सिफारिश के १४ प्रान्तों में से १० प्रान्त ‘ब्राम्मण-क्षेत्रीय’ बहुल होता और चार आदिवासी-जनजाति-मधेशी-थारू बहुल प्रान्त बनता। इसी प्रकार यदि आयोग की सिफारिशों के आधार पर १० प्रान्त बनाए जाते तो उनमें से ९ प्रान्त आदिवासी-जनजाति-मधेशी-थारू बहुल बनता और केवल एक ही प्रान्त ब्राहृमण-क्षेत्री-बहुल होता -खस, पर्वते अथवा नेपाली भाषा बोलनेवालों में ‘ब्राहृमण’ जाति से ‘पहाडÞी’ मूल के ब्राहृमण तथा ‘क्षेत्री’ जाति कहने से ‘पहाडÞी’ मूल के ‘क्षत्रिय’ अथवा ‘राजपूत’ जाति का बोध होता है।)
लेकिन, भला यह कैसे बर्दास्त हो राजा एवं राजदरबार की छाया में लगभग ढर्Þाई सौ वषर्ाें से सत्ता पर हाबी ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ जातियों के नेताओं को। फलस्वरूप, नेपाली कांगे्रस के सभापति सुशील कोइराला, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) के अध्यक्ष झलनाथ खनाल और एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल ने बन्द कमरे में मिलीभगत कर ली और झटपट में एक सिफारिश प्रकाशित करा दी। यदि उस सिफारिश के आधार पर राज्यों का गठन होता तो ११ प्रान्तों में से १० ब्राहृमण-क्षेत्री-बहुल प्रान्त बनता और देश की लगभग ८०-८५ प्रतिशत आबादीवाले ‘आदिवासी-जनजाति-मधेशी-थारू बहुल समुदाय बहुल केवल एक ही प्रान्त बन पाता। फलस्वरूप, इस तीसरे विकल्प को मानने से माओवादी सरकार में शामिल मधेशी मोर्चा के नेताओं ने इनकार कर दिया और कहा- नेपाल के अन्तरिम संविधान में संघीय राज्य का प्रावधान रखा जाना मधेश आन्दोलन की ऐतिहासिक उपलबिध है जिस आन्दोलन के दौरान लगभग पांच दर्जन मधेशी आन्दोलनकारियों को अपनी आहुति देनी पडÞी, उन्हें पुलिस की गोलियों से भून दिया गया। मधेशी नेता पहले से ही चौकन्ने थे। क्योंकि संघीय शासन की घोषणा करनेवाले माओवादी, नेकपा एमाले और नेपाली कांग्रेस तक ने, मिलीभगत करके अन्तरिम संविधान के मूल ड्राफ्ट से संघीयता के प्रावधानवाले पेज को ही निकलवा दिया था और यदि उसके विरोध में मधेश आन्दोलन नहीं हुआ होता तो उसी समय संघीयतायुक्त संविधान के निर्माण का रास्ता सदा-सदा के लिए बन्द कर दिया गया होता। यहीं सवाल उठता है – क्या संविधान सभा की हत्या ब्राहृमणवादी चक्रव्यूह में हर्ुइ –
संविधान सभा के स्वतः अवसान ने यह साबित कर दिया कि चौथा मुद्दा अर्थात हिन्दुस्तानियों के नाक-नक्श से मिलते जुलते हिन्दीभाषी मधेशियो के मामले पर कांग्रेस, कम्युनिस्ट, माओवादी, राजावादी तथा अन्य शासक जातियों के नेतृत्ववाली अन्य पार्टियों में इस बात पर सहमति और एकजुटता अघोषित रूप से कायम है कि नेपाल में भूगोल, भाषा और संस्कृति के आधार पर संघ राज्यों की स्थापना किसी भी हालत में नहीं हो पाए।
लेकिन, इस बार मामला केवल हिन्दीभाषी मधेशियों का ही नहीं है। इस बार तो पहाडÞर्-पर्वतों के भूमिपुत्र आदिवासी, जनजाति, थारू, दलित एवं राजधानी के मूल भूमिपुत्र नेवार जाति के लोगों ने भी मधेशियों के साथ ही अपने इतिहास, भूगोल, भाषा एवं संस्कृति के आधार पर संघीय राज्य की मांग हेतु संर्घष्ा करने के लिए कमर कस ली है। नेपाली संवत २००७ साल, अर्थात् १९५० में नेपाल में राणा शासन के अन्त के बाद राजा एवं राजदरबार की छाया में देश की ८०-८५ प्रतिशत आदिवासी, जनजाति, मधेशी आबादी पर एकछत्र राज्य करते आ रहे ‘अल्पमत ब्राहृमण-क्षेत्री-नेताओं एवं शासकों की ‘फूट करो और राज्य करो’ की षडयंत्रकारी नीतियों के विरोध में पहाडÞर्-पर्वतों के मूल निवासियों से लेकर तर्राई के मधेशी, थारू एवं राजधानी के नेवार जाति के नेता एक मंच पर आ चुके हैं। देश की प्रमुख पार्टियों में वषर्ाें से कार्यरत आदिवासी जनजाति, नेवार, थारू एवं मधेशी नेताओं ने संघीयता के सवाल पर अपनी पार्टियों से स्पष्ट धारणा की मांग की है और यहां तक कि अपनी पार्टियों की केन्द्रीय समिति की बैठकों का वहिष्कार करना शुरू कर दिया है। उन्होंने राजधानी के खुलामंच पर आयोजित विशाल संयुक्त जनसभा में ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ जातियों के नेताओं के षडयंत्र का खुल्लमखुल्ला विरोध करना शुरू कर दिया है और राज्यसत्ता के हर क्षेत्र में अपनी समानुपातिक हिस्सेदारी पाने के लिए संर्घष्ा की घोषण कर दी है।
उक्त तथ्यों के आलोक में देश के ‘ब्राहृमण-क्षेत्री विरोधी तापमान को देखने से ऐसा लगता है कि नेपाल के शासन सत्ता पर काबिज ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ नेताओं, अफसरों तथा विदेशी डालरों से संचालित गैर-सरकारी संघ-संस्थाओं पर केंचुली मारकर बैठे हुए ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ दादाओं की शामत आ चुकी है, अब खैर नहीं दिखता। देखना है ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ नेतृत्व को इस भष्मीभूत करनेवाले तापमान का भान भी है या नहीं तथा समय रहते वह अपने कुत्सित कारनामों से बाज आ रहे हैंं या नहीं –
यह बात सच है कि नेपाल के सभी ‘ब्राहृमण-क्षेत्री’ जातियों के लोग, नेता अथवा अफसर नहीं हैं और न ही सभी ब्राहृमण-क्षेत्री सुखी सम्पन्न ही हैं। लेकिन, यह भी कटु सत्य है कि नेपाली शासन पर दशकों से केंचुली मारकर बैठे नेताओं एवं अफसरों में लगभग ९०-९५ प्रतिशत संख्या ब्राहृमण-क्षेत्री, दो जातियों की है। आज नेपाली कांग्रेस, एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) तथा सत्तासीन एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) के अध्यक्ष क्रमशः सुशील कोइराला, झलनाथ खनाल तथा पुष्पकमल दहाल, सभी पहाडÞी ब्राहृमण, अर्थात ब्राहृमण जाति के हैं जबकि एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) से टूटकर अलग हर्ुइ पार्टर्ीीेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी के अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण हैं, जिनका असली नाम मोहन प्रसाद पौडÞेल है, यह भी ब्राहृमण ही हैं। इसी प्रकार नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाले) के अध्यक्ष सी पी मैनाली भी ब्राहृमण जाति के हैं। इसके साथ उक्त सभी पार्टियों के केन्द्रीय अथवा जिला समितियों के महत्वपर्ूण्ा पदों पर अधिकांश ब्राहृमण जाति के नेताओं का ही बहुमत है।
दोलखा तामांग एकता समाज के अध्यक्ष तथा बौद्ध धर्म संरक्षण सरोकार समन्वय, नेपाल के प्रवक्ता अमरदीप मोक्तान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि नेपाल के ब्राहृमण इतने धर्ूत और चतुर हैं कि अब उन्होंने बौद्ध धर्म के मठों पर भी कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। इसी का परिणाम है कि लगभग १७ हजार निर्दाेष नेपालियों की हत्या करानेवाले एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टर्ीीमाओवादी) के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल ने भगवान गौतम बुद्ध के जन्मस्थल लुम्बिनी पर भी अपना दाबा ठोक दिया है और उसके विकास के नाम पर लगभग ७ सौ अरब रुपये का चीनी सहयोग, ऐंठने के प्रयास में लगे हुए हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि माओवादी दहाल का बुर्द्धधर्म से दूर का भी रिश्ता-नाता नहीं है। इसलिए नेपाल के सभी बौद्धमार्गियों एवं संगठनों ने पुष्पकमल दहाल के इस दुष्प्रयास का जमकर विरोध किया है और इसकी जानकारी न केवल लुमिबनी विकास में सहयोग करनेवाली चीन -हांकांग) की संस्था एपेक को दी है बल्कि यूनीडो सहित विश्व भर के बौद्ध संघ-संस्था-संगठनों को भी दहाल की साजिश से लिखित रूप में अवगत करा दिया है।
मोक्तान बताते हैं कि पुष्पकमल दहाल आजकल अपनी तुलना सम्राट अशोक से करने लगे हैं जबकि सच्चाई यह है कि लगभग १७ करोडÞ रुपये के आलीशान भवन और करोडÞों रुपये की बिलासी गाडिÞयों को भोगनेवाले दहाल ऐसा कहकर नेपाली जनता की आंखों में दिन-दहाडÞे धूल झोंक रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि विलासितापर्ूण्ा जीवन जी रहे दहाल इन दिनों यह सोचकर अति चिन्तित हैं कि यदि उनकी पार्टर्ीीध्यक्ष अथवा लुम्बिनी विकास की भारी भरकम गद्दी खिसकी तो जिन १७ हजार लोगों को जनयुद्ध के नाम पर मौत की नींद सुला दी गई, उनके आक्रोशित भाई-बन्धु पुष्पकमल दहाल के साथ कैसा सलूक करेंगे – मोक्तान के अनुसार जनयुद्ध के दौरान मारे गए लोगों में लगभग साढÞे ८ हजार तो तामांग जाति के थे।
-लेखक पिछले चार दशकों से राजधानी में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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