संविधान सभा या बीरबल की खिचडी

कुमार  सच्चिदानन्द सिंह

विगत जनान्दो लन के  बाद “मार्गचित्र” शब्द का प्रयो ग ने पाली राज नीति के  क्षे त्र में बहुत व्यापक स् तर  पर  हुआ था औ र  लगभग हर  राजने ता की  जुबान पर  यह शब्द राज कर ता था । दे श के  हर  ने ता इसके  भविष्य का मार्गचित्र तै यार  कर ते  नजर  आते  थे । इस दिशा में उन्होंने  कै सी लकीरें खींची है  इसका अनुमान न तो  उन्हें है  औ र  न दे श की निरीह जनता को  ही । सब कुछ अनसुलझा औ र  अनबुझा । इसी तर ह “अर्जुनदृष्टि” शब्द का भी व्यापक प्रयो ग आजकल हो  र हा है । हर  ने ता इसी की बात कर ते  है । महाभार त में तो  एक ही अर्जुन थे , इसलिए उन्होंने  लक्ष्य का भे दन कर  लिया । ले किन हमारे  यहाँ तो  छः सौ  एक अर्जुन हैं जो  लक्ष्य का संधान कर  ताबडतोड बाण चला र हे  हैं, ले किन सभी लक्ष्य से  भ्रमित हो  दे श को  लहूलुहान कर  र हे  हैं औ र  निरीह जनता मूक बनकर  तमाशा दे ख र ही है । सवाल है  कि हमारे  ने ता जितना निरीह आम लो गों ओ  समझते  हैं, क्या वे  वास् तव में इतने  कमजो र  हैं – आम लो गों के  अन्दर  असन्तो ष का गुबार  कितना गहन है , इसका अनुमान मौ जूदा प्रधानमंत्री श्री खनाल से  अधिक शायद किसी को  नहीं । ले किन जिस दिन यह निरीह सा दिखलराई दे ने  वाला आम आदमी पूरी  राजनीति पर  तमाचा उठाने  की मनःस्थति में आ एगी, उस दिन की भयावहता की कल्पना तो  हम कर  ही सकते  हैं ।
मौ जूदा संविधान सभा दे श की जनता के  लिए कल्पवृक्ष या अलादीन का चिराग तो  नहीं ही बन सकी है , हमारे  ने ताओं के  लिए तो  यह कामधे नु बन ही गयी है । नव-संविधान सभा की अवधार णा तो  आम लो गो ं के  लिए बीर बल की खिचडी बन गई है । यद्यपि मुगल बादशाह जहाँगीर  ने  इसे  लजी जा कहा था । सच में किन्हीं(किन्हीं परि स्थतियों में यह लजीज औ र  सुपथ्य हो ती भी है । यही कार ण है  कि आम लो ग इसके  लिए जिज्ञासु औ र  तृषित हैं, ले किन हमारे  ने ता हैं जो  वाणी की आँच लगातार  दे  र हे  हैं । ले किन यह खिचडी किस अवस् था में पहुँची है  इसकी खबर  ले ने  की फुर्सत किसी को  नहीं । हो  भी कै से  – जो  कामधे नु इच्छित मुराद पूरी कर  ही र ही है  उसकी उपयो गिता -अनुपयो गिता पर  बहस चलाने  की जरुर त भी क्या है  – इसलिए आज जब संविधान सभा की बढर्ई गई अवधि भी समाप्त हो ने  लगी है , इसके  प्रति उचित गम्भीर ता सक्रिय राजनै तिक दलों में नहीं दे खी जा र ही है । आडी-तिर छी रे खाएँ खींची जा र ही है , उलटी- सीधी बातें की जा र ही है , ले किन ये  बातें जन विश्वास को  समे टने  में असक्षम है ।
संविधान सभा की अवधि बढा दी जा एगी । बढनी भी चाहिए । इसकी वै धानि कता पर  सवोर् च्च न्यायालय भी मुहर  लगा चुकी है , इसलिए आम लो ग इसके  औ चित्य पर  बहस कर ने  के  लिए तै यार  नहीं । ले किन आज जब लगभग इसकी भी अवधि समाप्त ही र ही है  तो  एक बार  यह सवाल उठाया ही जा सकता है  कि इस बढी हरुइ अवधि में इसने  दे श को  क्या दिया – महीनों की लम्बी का मचलाऊ सर कार  जिसके  अस् ितत्व को  मानने  के  लिए  ाज्य का कोर् इ भी संयन्त्र तै यार  नहीं था । एक तो  बजट विहीन दे श, जिससे  राष्ट्रीय औ र  अन्तर्राष्ट्रीय स् तर  पर  यह संदे श गया कि यह दे श न तो  समय पर  बजट ला सकता है  औ र  न यह संविधानसभा समय पर  सर कार  बना सकती औ र  न संविधान ही । इस शून्य-अवस् था का लाभ जिन्हें उठाना था उठाया, जिन्हें राजयो ग था भो गा, ले किन दे श ने  इसकी कीमत चुकाई । अर्थतन्त्र ठप्प, विकास अवरुद्ध । शांति व्यवस् था की बदतर  स्िथति औ र  एक तर ह से  पूरी अराजकता का आलम ।…औ र  सबसे  बढकर  राष्ट्र की पूरी राजनै तिक चे तना का सर कार  निर्माण की प्रक्रिया में संके न्द्रन । इसका खामियाजा किसी न किसी रुप में दे श के  संभावित संविधान को  भुगतना पडा । क्योंकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया लगभग पी तर ह शि थिल हो  गई ।
सात महीने  की सर कार  विहीनता के  बाद दे श को  जो  सर कार  मिली वह तो  औ र  भी निरीह औ र  लाचार । एक तर ह से  यह रीढÞ विहीन सिद्ध हर्ुइ है । कभी पाटी के  सहयागी दलो ं का दबाब तो  कभी आन्तरि क दबाब के  कार ण यह सर कार  लुंज पुंज अवस् था मे  है  औ र  निर्ण्र्नता की स्थति में है । यही कार ण है  कि सर कार  गठन के  तीन महीने  बाद भी मंत्रीमण्डल का विस् तार  नहीं हो  पाया है  ।
खै र , मंत्रिमण्डल का विस् तार  हो  या नहीं, सर कार  चले  या नहीं, संविध ान बने  या नहीं (उससे  इस सर कार  को  मतलब भी नही । सर कार  का ने तृत्व कर  इतिहास बनाना इसका मूल उद्दे श्य था औ र  वह पूर ा हो  चुका । इतना तो  साम ान्य लो ग भी जानते  हैं कि अगर  महान लक्ष्य की ओ र  हम बढते  है  तो  पहले  घर  को  विश्वास मे ं ले ना चाहिए । ले किन यहाँ तो  घर  में आग लगाकर  कुछ पाने  का प्रयास हुआ था । इसलिए जो  हा लात है ं वह अप्रत्याशित नहीं । वास् तव में यह सर कार  जितनाष्ट्र का है  उससे  अधिक किसी दल विशे ष की मह त्वाकाँक्षाओ ं  का पो षक है । इसलिए इसका आन्तरि क विर ो ध चर म पर  है  औ र  इससे  संविधान या अन्य कोर् इ लक्ष्य पूरा नहीं हो  सकता, यह बात लगभग सिद्ध है । किसी भी क्षण समीकर ण बदल सकता है  औ र  कभी भी इसके  दिन खत्म हो  सकते  हं ।
ऐ सा नहीं है  कि संविधानसभा के  अवधि- विस् तार  का कोर् इ सकार ात्मक परि णाम नहीं र हा । एक बात तो  निश् िचत है  कि विगत १४ गते  जे ठ के  बाद क्या हो गा, यह एक महाप्रश्न था । र ाष्ट्र मे ं अर ाजकता, गृहयुद्ध आदि की संभावना एँ जतलाई जाने  लगी थी, प्रतिगामी श क्ितयो ं के  सिर  उठाने  की बात की जा र ही थी । संविधानसभा के  इस अवधि-विस् तार  ने  एक साल के  लिए इन अटकलो ं को  टाल दिया । इसने  र ाजनै तिक दलो ं को  यह मार्ग भी दिया कि सालभर  की इस अवधि मे ं संविधान-निर्माण हो  या नहीं, सर कार  बनाने -बिगाडÞने  का अभ्यास कर े े ं औ र  समय समाप्त हो ने  पर  विध ायी अधिकार ो ं का प्रयो ग कर  पुनः अवधि बढÞा ले ं । दे श औ र  जनता इस बात से  आश्वस् त र हे गी कि दे श सर कार  विहीन नहीं है  । संविधानसभा जीवित है  औ र  वह अपना काम कर  र ही है  । ने ता भी खुश क्यो ंकि पे शागत रुप मे ं र ाजनीति से  सुख भो ग का अवसर  उनके  पास है  । र ाजनीति के  धूँधले  वातावर ण मे ं नए-नए समीकर णो ं के  बनने -बिगडÞने  औ र  अपने -अपने  नाम को  इतिहास मे ं लिखवाने  के  लिए हो डÞबाजी का अवसर  है  । एक बात तो  सच है  कि खे ल चाहे  हमार ी र ाजनीति जितना खे ले ं, ले किन एक न एक दिन उसे  अपनी जमीन पर  जाना ही है  जहाँ न जाने  कितने  तमाचे  कितने  रुपो ं मे ं उनका इन्तजार  कर  र ही है  ।
एक कहावत है  कि “डूबते  को  तिनका सहार ा” । ऐ सी ही स् िथति मौ जुदा सर कार  की भी है  । संविधान का समय पर  न बनना प्रायः निश्चित है  । इसलिए सर कार  इसकी अवधि बढाने  की मनःस् िथति मे ं आ चुकी है  औ र  र्समर्थक दलो ं की भी इस् ामे  विमति नहीं हो  सकती क्यो ंकि यह सभा एक तर ह से  फुटबाल का मै दान है  । जब तक यह है  तब तक खे ल का अवसर  है  । इसलिए इसे  जीवित र खना उनकी मजबूर ी है  । लगभग यही हालात यहाँ की र ाजनीति मे ं भी है ै  । सवोर् च्च न्यायालय ने  संविधान न बनने  तक संविधानसभा के  जीवित र हने  की बात क्या कह दी, इसे  इन्हो ंने  अभय दान के  रुप मे ं लिया । कर्तव्य औ र  दायित्वहीनता की स् िथति तो  पहले  भी दे खी जा र ही थी ले किन अब इस पर  न्यायपर कता का मुहर  भी लग गया है  । हमार े  जन प्रतिनिधि इस बात को  पूर ी तर ह भूल चुके  है ं कि जन विश्वास ले कर  वे  इस सभा मे ं पहुँचे  है , मनो नीत हो कर  नहीं । यह जनविश्वास उन्हे ं मात्र दो  वषोर् ंं के  लिए मिला था, पाँच वषोर् ं के  लिए नहीं । अगर  इस दिशा मे ं प्रगति हो ती र हती तो  अवधि बढाने  का औ चित्य भी हो ता । ले किन जिस अवस् था से  यह सभा गुजर  र ही है , उसमे ं इसका औ चित्य इसके  छः सौ  एक सभासदो ं औ र  मौ जूदा सर कार  को  ही समझा र ही है  ।
सवाल उठता है  कि क्यो ं हमार ी र ाज नीति लक्ष्य से  दिग्भ्रमित दिखलाई दे  र ही है , क्यो ं हम यह नहीं समझा पा र हे  कि यह एक अवसर  है  जिसका उपयो ग कर  दे श को  एक मुकम्मल संविधान दिया जा सकता है  औ र  सदियो ं से  दबी-कुचली जनता की भावन ाओ ं को  समे टने  का प्रयास किया जा सकता है  – इसका मूल कार ण है  कि दलगत हित औ र  व्यक्तिगत मह त्वाक ाँक्षा से  ऊपर  हमार ी र ाजनीति नहीं उठ पायी है  । तीन महत्वपर्ूण्ा र ाजनै तिक विचार धार ाएँ र ाष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर  र ही है  औ र  तीनो ं मे ं वै चारि क टकर ाव की स् िथति है  । दे श की शासकीय संर चना, संघीयता आदि मुद्दो ं पर  तीनो ं ही दलो ं मे ं अपनी डफली अपना राग की स्िथति है  । हमारा ने तृत्व यह नहीं समझ पा र हा कि किसी भी दल को  जनता ने  स् पष्ट बहुमत नहीं दिया है  । इसका साफ-साफ संदे श है  कि जनता उन्हे ं  मिल बै ठ कर  संविधान बनाने  का संदे श दे  र ही है  । उग्र वामपंथ औ र  उग्र दक्षिणपंथ की विचार धार ाएँ उसे  स् वीकार्य नहीं । उसे  तो  एक उदार -मध्यम मार्ग चाहिए, अमन औ र  शांति चाहिए, उदार  अर्थनीति औ र  सामाजिक न्याय चाहिए । एक ऐ सा र ाष्ट्र चाहिए जो  आत्मनिर्भर ता की दिशा में कदम बढाए औ र  जनता के  कर ो ं का बो झ कम हो , तथा साहूकार ी की नीति पर  चलने  वाली सर कार ो ं का अन्त हो  । ले किन इन बातो ं को  नजर  अन् दाज कर  अवसर  के  संसाधन के  लिए, अप नी अपनी दलगत नीतियो ं को  कार्यान्वित कर ाने  के  लिए जो  सिद्धान्त विहीन समझौ ते  हो  र हे  हैं औ र  समीकर ण बन र हे  हैं, उसके  आधार  पर  अगर  हम किसी लक्ष्य को  प्राप्त कर  भी ले ते  हैं तो  उसे  चिर स् थायी नहीं माना जा सकता है
विगत जनान्दो लन-२ ने पाल की तत्कालीन राजतंत्रात्मक शासन-व्यवस् था के  विरुद्ध थी औ र   मधे श आन्दो लन दे श की प्रचलित शासन प्रणली के  विरुद्ध । निश्चित ही इस आन्दो लन ने  दे श की र ाजनीति को  गम्भीर ता से  प्रभावित किया । यह सच है  कि इसके  प्रभाव से  उत्पन्न मधे शवादी शक्ति याँ आज ने पाल की र ाजनीति मे ं महत्वपर्ूण्ा स् थान र खती है  । यह अलग बात है  कि आज यह विभाजित औ र  भ्रमित अवस् था में है  और राष्ट्रीय राजनीति की वै चारि क अराजकता का समावे श इनकी नीतियों में भी दिखलाई दे ता है । ले किन इस शक्ति को  कमजो र  मानकर  उपे क्षा कर ना,एक तर ह से  मधे श को  गुमर ाह कर ना हो गा । दरुभाग्यवश मधे शी ने तृत्व भी सत्ता के  समीकर णो ं के  प्रति तटस् थ नहीं है  इसलिए इस लाँलीपाँप के  आधार  पर  मधे श को  भ्रमित कर ने  के  प्रयासो ं का परि णाम कभी भी नकार ात्मक हो  सकता है  । अभी जो  जन विश्वास खण्डित नजर  आ र हा है  वह कभी भी मुद्दो ं के  आधार  पर  संवे दनशील बन सकता है  । संयो गवश मधे श के  मुद्दो ं के  प्रति जो  संवे दनशीलता र ाष्ट्रीय र ाजनीति मे ं दे खी जानी चाहिए वह नहीं दे खी जा र ही ।संघयिता जै से  मुद्दे  से  विचलन का मूल कार ण यही है  । इसलिए कहा जा सकता है  कि आगामी संविधान का जो  मूल स् वर  है , उस पर  ही दलो ं मे ं सहमति नहीं । यह एक महत्वपर्ूण्ा कार ण है  जिसके  कार ण संविधान सभा आज अनिर्ण्र्ााकी अवस् था मे ं है  ।
नीति कहती है  कि दो  नावो ं पर  पै र  र खकर  चलने  वाले  यात्री कभी लक्ष्य पर  नहीं पहुँचते  । हमार ी र ाजनीति की मूल समस् या यह है  कि वह दो  नावो ं पर  चढकर  यात्रा कर  र ही है  । सर कार  औ र  संविधान दो नो ं इसके  लक्ष्य है ं । चूँकि स् पष्ट जनादे श किसी भी दल को  नहीं, इसलिए कोर् इ किसी की सत्ता कबूल कर ने  की मनःस् िथति मे ं नहीं । र ाज नीति के  इस धूँधले  वातावर ण मे ं छो टे  बडÞे  सबकी महत्वाकाँक्षाएँ सुगबुगाती है  औ र  सभी अपने -अपने  स् वार्थ के  अनुसार  अवसर  का उपयो ग कर ना चाहते  है ं । नि श्चय ही यह स् िथति दे श के  लिए घातक है  । हमार ी र ाजनीति औ र  र ाजने ता को  इस बात के  प्रति सचे त हो ना ही हो गा कि लम्बी अनिश्चितता को  जनता नहीं भे mल सकती । अन्ततः यह स् िथति किसी न किसी रुप मे ं गृहयुद्ध जै सी भीषणता की ओ र  ले  जा र ही है  । अगर  इससे  हमे ं बचना है  तो  अभी भी अवसर  है  । थो डÞी संवे दनशीलता, त्याग औ र  र्समर्पण की आवश्यकता है  ।

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