संवैधानिक संकट में फंसता नेपाल : डॉ. श्वेता दीप्ति

देश की युवा शक्ति विदेश पलायन कर रही है । रोजगार का अवसर सरकार मुहैया नहीं कर पा रही । रेमिट्यान्स की अपेक्षा पर देश के विकास की दौड़ तेज नहीं हो सकती, हां घिसट जरुर सकती है ।


काश इस देश के हर निकाय में डॉ. केसी और कुलमान घिसिंग जैसे व्यक्ति होते तो यह देश बौद्धिक और राजनीतिक निराशा के अंधकार से अवश्य निकलता

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डॉ. श्वेता दीप्ति, मार्च अंक |
प्र्रधानमंत्री प्रचण्ड का कार्यकाल छः महीनों के सफर को तय कर चुका है । इस बीच देश ने ऐसी कोई विशेष उपलब्धि हासिल नहीं की जिसकी चर्चा की जा सके । दो महत्वपूर्ण मुद्दे अपनी जगह कायम हैं । साथ ही उन मुद्दों के साथ निर्वाचन कराने की तलवार सत्ता के सर पर लटक रही है । पर जब भी जिम्मेदार प्रतिनिधियों की कार्यशैली पर नजर जाती है तो ये नहीं लगता कि इन समस्याओं के प्रति ये गम्भीर हैं ।

कार्य के सम्पादन के बगैर मोर्चा अगर राजनीति के मूल धार में आती है, तो मधेश की जनता इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगी, जिसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ सकता है । यानि फिलहाल मोर्चा के लिए राजनीति गले में फंसी हड्डी की तरह अटकी हुई है ।
समस्या के निदान से ज्यादा हमारे नेताओं का मन फुटवॉल के मैदान में लगता है जहां ये अपना वो कीमती वक्त, जो इनका नहीं है, इस देश का है, जिसके लिए इन्हें जनता चुनती है और सारी सुख सुविधाएं मुहैया कराती है, गवां देते हैं । काश इस देश के हर निकाय में डॉ. केसी और कुलमान घिसिंग जैसे व्यक्ति होते तो यह देश बौद्धिक और राजनीतिक निराशा के अंधकार से अवश्य निकलता । भ्रष्टाचार की विश्व सूची में तीसरा स्थान प्राप्त करने वाले देश को एक केसी या घिसिंग अंधकार के दलदल से नहीं निकाल सकते हैं । इसलिए हर निकाय को इनके जैसी शख्सियत की आवश्यकता है । प्रधानमंत्री ने जिन वादों के साथ सत्ता को सम्भाला था वे वादे धरे के धरे रह गए हैं । मधेश की समस्या मझधार में अटकी हुई है, विश्व का सर्वोत्कृष्ट संविधान अपनी कार्यान्वयन की राह देख रहा है । वहीं अगर समय पर निर्वाचन नहीं हुआ तो देश भयंकर संवैधानिक संकट की गर्त में फंस सकता है । कांग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा तकरीबन अपने हर भाषण में जोर–शोर से एलान करते हैं कि देश में तीनों निर्वाचन कराना आवश्यक है, नहीं तो देश गम्भीर संकट में पड़ सकता है । किन्तु सवाल ये है कि क्या निर्वाचन की राह प्रशस्त करने के लिए हमारे मान्यवर नेतागण प्रयास कर रहे हैं ? मधेशी मोर्चा संविधान संशोधन की आस में समय व्यतीत कर रहे हैं, जबकि संविधान संशोधन की संभावना दूर–दूर तक नजर नहीं आ रही है और यह भी यथार्थ सत्य है कि इस कार्य के सम्पादन के बगैर मोर्चा अगर राजनीति के मूल धार में आती है, तो मधेश की जनता इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगी, जिसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ सकता है । यानि फिलहाल मोर्चा के लिए राजनीति गले में फंसी हड्डी की तरह अटकी हुई है । जिसे न तो निगल पा रहे हैं और न ही उगल पा रहे हैं । जहां तक प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर अगर नजर डालें तो यही नजर आ रहा है कि प्रधानमंत्री तुष्टिकरण की नीति में ही उलझे हुए हैं । सुबह मोर्चा को संतुष्ट करते हैं तो दोपहर एमाले को और शाम होते–होते ये दोनों ही पुनः असंतुष्ट हो जाते हैं । कांगे्रस सभापति शायद नौ महीने पूरे होने के इंतजार में हैं । वहीं एमाले उग्र राष्ट्रीयता को उकसा कर और भारत को गाली देकर राजनीति की रोटी सेंक रही है । परन्तु शायद उन्हें यह नहीं पता कि ज्यादा सिकी हुई रोटी गले में जाकर अटक भी सकती है और तब सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है । राष्ट्रवाद के नारे के साथ चुनाव जीतना और बहुमत हासिल करना उनकी खामखयाली ही साबित होगी ।

निराश जनता

देश को मूलधार और विकास की राह में लाने के लिए संविधान संशोधन और तीनों तह का निर्वाचन आवश्यक है । गणतंत्र की संस्थागत शुरुआत निर्वाचन से ही सम्भव है । राजतंत्र की समाप्ति को एक दशक हो गए किन्तु प्रदेशों के निर्वाचन न होने की वजह से स्वशासन की अनुभूति नेपाली जनता नही. कर पाई है । अधिकारविहीन मधेश की जनता में स्वशासन और स्वराज की चाह ने घर कर लिया है । देश की कुछ आबादी इसी असमंजस के कारण पुनः राजतंत्र की कामना करने लगी है, क्योंकि परिवर्तन के बावजूद उनके हाथ खाली हैं । जनता ने इन्हें आधुनिक नेपाल बनाने की जिम्मेदारी दी थी, किन्तु इस जिम्मेदारी का निर्वाह ये नहीं कर पाए हैं, जिसकी वजह से राजतंत्र ही बेहतर था यह भावना कुछ लोगों में सर उठाने लगी है । हर ओर अफरातफरी का माहौल है । देश की युवा शक्ति विदेश पलायन कर रही है । रोजगार का अवसर सरकार मुहैया नहीं कर पा रही । रेमिट्यान्स की अपेक्षा पर देश के विकास की दौड़ तेज नहीं हो सकती, हां घिसट जरुर सकती है । सरकार दो पड़ोसी देशों के बीच के कूटनीति में अपनी परिपक्वता नहीं दिखा पा रही । एक मित्र राष्ट्र को गाली देकर दूसरे को तुष्ट करने की नीति से देश आगे नहीं बढ़ सकता यह तयशुदा है । किस तरह का तालमेल देश को चाहिए, जिससे विकास की राह बने ऐसी पुख्ता नीति का निर्धारण नहीं हो पा रहा है । ये सारी वजहें देश की जनता को असमंजस में डाले हुए है । जनता निर्णय नहीं कर पा रही कि कौन सी राह और कौन सी दिशा सही है ।

क्या निर्वाचन सम्भव है ?

निर्वाचन आयोग ने सरकार से निर्वाचन की तिथि निर्धारित करने का आग्रह किया है । आयोग ने स्थानीय तह पुनःसंरचना आयोग को प्रतिवेदन अविलम्ब उपलब्ध कराने की मांग भी सरकार से की है । बावजूद इसके प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता के बाद भी निर्वाचन की घोषणा नहीं हो पा रही है । क्योंकि संविधान संशोधन का मसला प्रधानमंत्री के गले का फांस बनी हुई है । संसद की अवस्था को देखा जाय तो संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई समर्थन मिलने के आसार नहीं हैं और समर्थन के बिना संशोधन सम्भव नहीं है । इस स्थिति में निर्वाचन की सम्भावना भी क्षीण नजर आ रही है । निर्वाचन संशोधन के बिना सम्भव नहीं और संशोधन सहमति के बिना सम्भव नहीं । सत्तारुढ दल संशोधन के बिना निर्वाचन की घोषणा कर पाने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि सरकार निर्माण के समय मोर्चा का समर्थन संशोधन के शर्त पर ही मिला था । संविधान संशोधन प्रस्ताव में सरकार को समर्थन देने वाली राप्रपा और फोरम लोकतान्त्रिक का भी समर्थन सरकार को अब तक नहीं मिल पाया है । माना जा रहा है कि, इनकी सहमति के लिए कमल थापा और विजयकुमार गच्छदार को उपप्रधानमंत्री का पद चाहिए । ये कोई मुश्किल बात नहीं है, क्योंकि पहले ही ओली सरकार ने छः छः उपप्रधानमंत्री बनाने का प्रचलन शुरु कर ही दिया है परन्तु इस बार इस बात में अड़चन इसलिए आ रही है, क्योंकि कांग्रेस सभापति देउवा की असहमति सामने आ रही है । पद, सत्ता और स्वार्थ की यह स्थिति देश को संवैधानिक संकट की ओर धकेल रही है । चर्चा यह भी हो रही है कि संवैधानिक प्रावधान के विपरीत संसद की अवधि बढ़ाई जाय किन्तु यह प्रभावकारी सोच नहीं है । इसके कई विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं । अब देखना यह है कि सरकार आगामी जेष्ठ में निर्वाचन की तिथि निर्धारित करती है या नहीं और अगर करती है तो मोर्चा के हाथ में क्या आता है ?
इतना ही नहीं निर्वाचन आयोग को अगर फागुन ८ के भीतर ही राजनीतिक दल सम्बन्धी कानून प्राप्त नहीं होता है और उसी तिथि में स्थानीय तह पुनःसंरचना पूरी नही. होती है तो जेष्ठ में चुनाव सम्भव नहीं हो सकता यह आयोग का मानना है । राजनीतिक दलसम्बन्धी विधेयक संसद से पास होना भी बाकी है । थ्रेसहोल्ड सम्बन्धी विवाद के कारण विधेयक राज्यव्यवस्था में अटका हुआ है । आयोग ने कानून की मांग फागुन आठ के भीतर की है जबकि संसद फागुन दस तक स्थगित है । जाहिर सी बात है कि बैठक न होने की अवस्था में दलसम्बन्धी विधेयक आयोग को मिलने से रही । स्थानीय तह में भी विवाद ही है । सरकार अब तक इस निर्णय पर नहीं पहुंची है कि स्थानीय तह का निर्वाचन होगा या नहीं । स्थानीय तह पुनःसंरचना आयोग द्वारा प्रतिवेदन पेश किया गया था जिसे काफी समय हो चुके हैं, परन्तु इस विषय पर भी सहमति नहीं जुट पाई है । संरचना नहीं होने की अवस्था में आयोग चुनाव की तैयारी आखिर कैसे करेगा ? प्रश्न गम्भीर है ।
निर्वाचन की राह में एक और मुश्किल सामने है । निर्वाचन आयोग ने फागुन आठ के भीतर कानून की मांग की है, तभी जेष्ठ एक से बीस के बीच चुनाव सम्पन्न कराया जा सकता है, किन्तु यह समय बजट का होता है । संविधान के अनुसार जेष्ठ पन्द्रह गते बजट घोषणा करने का समय निर्धारित किया गया है । इस अवस्था में बजट और चुनाव दोनों एक साथ होना अव्यवहारिक और असहज है
अगर प्राविधिक तैयारी की ओर ध्यान दिया जाय तो वहां भी असामान्य स्थिति ही है । निर्वाचन आयोग के अनुसार मतपत्र की छपाई में कम से कम तीन महीने लग सकते हैं । मतदाता परिचयपत्र की छपाई अब तक शुरु नहीं हुई है, जिसकी संख्या कम से कम एक करोड़ चालीस लाख है । हां इसका विकल्प वोटिंग मशीन हो सकता है किन्तु इस सन्दर्भ में भी तैयारी नहीं है । इन सारी परिस्थितियों पर गौर किया जाय तो स्पष्ट आकलन यही आता है कि निर्वाचन निर्धारित समय में असम्भव है और यह देश के लिए शुभ संकेत नहीं है ।

सत्ता और कांग्रेस

कांग्रेस सभापति देउवा अभी भी यह मानते हैं कि जेष्ठ में चुनाव सम्भव है । यह आश्वासन शायद वो स्वयं को दे रहे हैं । फिलहाल वो मानसिक तनाव में नजर आ रहे हैं । माओवादी और कांग्रेस के बीच सरकार निर्माण के समय ही सत्ता परिवर्तन की तिथि तय हो चुकी थी । जिसके हिसाब से वैशाख में देउवा को कुर्सी मिलनी चाहिए थी किन्तु निर्वाचन की वजह से यह टल गया है । अब अगर जेष्ठ में चुनाव नहीं होता है तो देउवा इस हालात को स्वीकार नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनकी दृष्टि फिलहाल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टिकी हुई है । वो यह भी जरुर चाहेंगे कि बजट उनके कार्यकाल में आए जिसका लाभ प्रदेश और संसद के चुनाव में उन्हें मिले । पर वर्तमान परिस्थिति जो दिखा रही है उसके अनुसार अगर प्रधानमंत्री प्रचण्ड निर्वाचन की तिथि नहीं निर्धारित करते हैं और बजट लाते हैं, तो सम्भव है कि कांग्रेस एमाले से हाथ मिला ले और एक बार फिर सत्ता का घिनौना खेल शुरु हो जाय । जो शायद लोकतान्त्रिक नेपाल की नियति बन गई है और जिस खेल में यहां की जनता पिस रही ह

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