संवैधानिक संघीयता क्यों –

रमेश झा :ramesh jhaनेपाल के राजनीतिक दलों के नेताओं में युगसापेक्ष उदारता, राष्ट्रीयता एवं जनसंवेदनशीलता तथा दूरगामी सोच के अभाव के कारण नेपाल संविधान सभा के दुष्चक्र में फँस कर रह गया है । फलतः नयी संविधान लेखन तथा जनसमक्ष संविधान प्रत्यार्पण प्रक्रिया आज आलोचनात्मक, विषम अवस्था से गुजर रही है । इस समय नेपाल के सामने संविधान लेखन प्रक्रिया चुनौतीपर्ूण्ा दिखाई दे रही है । द्वितीय संविधान सभा द्वारा कांग्रेस-एमाले गठबन्धन की सरकार गठित हर्ुइ और उक्त दोनों पार्टर्ीीे नेताओं के द्वारा समय-समय पर अभिव्यक्त विचार-संविधान माघ ८ गते के भीतर आने की बात को पुष्टि करता है । पर वर्तमान सरकार द्वारा काम करने की मन्थर प्रक्रिया तथा राजनीतिक आपसी खींचतान को देखते हुए लगता है कि नेताओं द्वारा अभिव्यक्त विचार ‘पुनर्मूषिको भव’ जैसी ही हालत में यथास्थिति को प्राप्त करेगा । कारण इसके सामने बडÞी चुनौती संघीयता, प्रदेश विभाजन और राष्ट्र का शासकीय स्वरूप है । विघटित संविधानसभा द्वारा जारी न होने में मुख्य कारण संघीयता ही रही । शासकीय स्वरूप के सर्न्दर्भ में भी दलों में भारी मतभेद मुँह बाये खडÞा है ।
जनता में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी अधिकार प्राप्ति की छटपटाहट और आक्रोश बढÞाने में संजीवनी का काम कर रहा है । व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार, कृपावाद तीनों में पारदर्शिता स्थापित करने के लिए संघीयतावादी लोग नेपाल में संघीयता स्थापित करना चाहते हैं । लेकिन संघीयवादी दलों, समुदायों को सोचना चाहिए कि जिन-जिन की राजनीति वृत्त में आवाज बुलन्द की गई है, उतनी ही जनता नेपाली नहीं है, इसके अतिरिक्त अनेक अल्पसंख्यक समुदाय हैं । जिनकी अपनी ही सामाजिक, भाषिक, सांस्कृतिक धरोहर अक्षुण्ण है । इस अर्थ में प्रत्येक जाति, वर्ग, भाषा, धर्म, क्षेत्र आदि को बराबरी का अधिकार प्राप्त करना जन्मसिद्ध अधिकार है, अधिकार प्रत्यायोजन में शासकों के द्वारा जितनी राजनीतिक जटिलता और संक्रमणशीलता बढर्Þाई जाएगी, उतनी ही बर्बादी की दिशा में देश बढÞेगा और उलझने बढÞती जाएंगी ।
संघीयता के भीतर व्याप्त विरोधाभास को हटाते हुए समस्या समाधान करने का प्रयास होना जरूरी है । इस सर्न्दर्भ में सत्ता में स्थापित दलों के द्वारा अर्न्तर्दलीय विचार-विमर्श करना आवश्यक है । समय की गति के साथ कुछ विषय आगे आए हैं और कुछ विषय में नए सिरे से सोचना जरूरी है तो वहीं दलों द्वारा जातीय और क्षेत्रीय विचारों की संकर्ीण्ाता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना के साथ विवाद समाधान करने का समय आ गया है । आने वाले संविधान में पहचान सहित की संघीयता के लिए स्थानीय चुनाव से सम्बन्धित जनप्रतिनिधि निकायों में वर्गीय, सामाजिक, जातीय लैंगिक, धार्मिक, आर्थिक और क्षेत्रीय जनघनत्व के आधार पर राज्य के हरेक निकाय, तह और अंग में समानुपातिक संवैधानिक प्रतिनिधित्व की प्रतिवद्धता होनी चाहिए । आगामी संधिवान के आने पर किसी को यह न लगे कि मेरा समुदाय, जाति, धर्म, क्षेत्र की उपेक्षा हर्ुइ है ।
आगामी संविधान में डा. सीके राउत द्वारा राज्य से अलग हो पाने का अधिकार सुनिश्चित करने का सुझाव काठमांडू २०७१ भाद्र ५ गते संवैधानिक राजनीतिक संवाद तथा सहमति समिति की अग्रसरता में सिंहदरबार के भीतर बुलाई गई बैठक में प्रस्तुत किया गया है । यह बैठक डा. बाबुराम भट्टर्राई के सभापतित्व में हर्ुइ थी । जिस में महन्थ ठाकुर, विजयकुमार गच्छदार, सीके लाल सहित कई बुद्धिजीवियों की सहभागिता थी ।
डा. राउत के अनुसार संविधान किसी भी देश की आधारशिला होता है । मजबूत आधारशिला की भाँति हरेक जनआकांक्षा को सम्बोधन करने वाला संविधान ही किसी भी देश को स्थायित्व प्रदान कर सकता है, उन्होंने बताया । संविधान किसी भी समुदाय के साथ विभेद करता है अथवा कार्यान्वयन पक्ष विभेदकारी दिखता है तो समुदाय को राज्य से पृथक होने का संवैधानिक अधिकार हो तो उसी स्थिति में राज्य अहिंसात्मक पद्धति द्वारा समानता एवं न्याय की ओर बढÞ सकता है । इस बात पर उन्होंने जोर दिया । राज्य से पृथक होने की संवैधानिक प्रक्रिया बहुत सारे देशों में है, ऐसा उन्होंने कहा ।
नागरिक सर्वोच्चता एवं लोकतान्त्रिक मान्यता की कदर की जाए तो नागरिक की आकांक्षा के अनुरूप जनमत संग्रह के आधार पर किसी भी समय राज्य से अलग होने का अधिकार मिलना चाहिए, इस बात पर डा. राउत ने अडान लिया था । किसी समुदाय के साथ विभेद करने पर, समुदाय का अस्तित्व खतरे में होने पर, किसी समुदाय की सुरक्षा की प्रत्याभूति कराने में अर्समर्थ होने पर, किसी समुदाय के इतिहास, भाषा, संस्कृति समेत की पहचान खतरे में होने पर, साधन स्रोत का बँटवारा विभेदपर्ूण्ा होने पर, औपनिवेशिक शोषण होने पर, उस समुदाय को राज्य से अलग होने का अधिकार होना चाहिए, इस पर डा. राउत ने जोर दिया । सभा की अध्यक्षता कर रहे डा. बाबुराम भट्टर्राई ने डा. राउत के विचारों पर प्रतिक्रिया देते हुए संविधान निर्माण के क्रम में राज्य से अलग होने के अधिकार पर चर्चा करना कोई अनुचित नहीं है और इस विषय पर बहस होना चाहिए, इस पर उन्होंने जोर दिया था ।

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