संशोधन का तोहफा: श्वेता दीप्ति

वर्ष-१९,अंक-१,फरवरी २०१६ (सम्पादकीय)अनिश्चितताओं का दौर जारी है, समाप्ति के आसार नजर नहीं आ रहे । इसी बीच जनता ने चार महीने पुराने संविधान में संशोधन का स्वाद भी चख लिया है । आश्वासन और बड़बोलेपन से जनता अपना काम भी चला रही है । विकास अगर कहीं है तो कालाबाजारी और भ्रष्टाचार के क्षेत्र में । भ्रष्टाचार विरुद्ध की अन्तरराष्ट्रीय संस्था ट्रान्सपेरेंसी इन्टरनेशनल द्वारा सार्वजनिक किए गए अवधारणात्मक सूचकांक के द्वारा देश की प्रगति भ्रष्टाचार के क्षेत्र में अधिक दिख रही है । सन् २०१४ में १७५ देशों के बीच नेपाल २६वें स्थान पर था जो २०१५ में १६८ देशों के बीच ३०वें स्थान पर पहुँच चुका है । बधाई है देश को । बधाई फुटवाल के खिलाडि़यों को भी जिन्होंने एक सुखद अवसर प्रदान किया देश की जनता को खुश होने का और क्रिकेट भी अपनी स्थिति को मजबूत बनाता नजर आ रहा है ।
इस बीच अगर कुछ नहीं बदला है तो मधेश और मधेश की जनता की स्थिति । सरकार संशोधन के तोहफे के साथ ही मौत का तोहफा भी लगातार मधेशी जनता को प्रदान कर रही है । रंगेली घटना इसी की एक कड़ी है । पिछले दिनों में सुरक्षा संयन्त्र के द्वारा अतिरिक्त बल प्रयोग के कारण तीन लोगों की मौत हुई । आँकड़ा बढ़ता जा रहा है और उसके साथ ही मधेशी जनता का रोष और जिद भी । रंगेली मे बल प्रयोग पर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने भी चिन्ता व्यक्त की है । नागरिक का अधिकार और शान्तिपूर्ण असहमति प्रदर्शन को सम्मान देने के लिए सरकार पर दवाब बनाया जा रहा है । किन्तु सरकार की खामोशी पूर्व की ही भाँति कायम है । कोई स्पष्टोक्ति नहीं कोई सहानुभूति नहीं ।
नेपाली नेताओं द्वारा दिल्ली दौड़ कोई नई बात नहीं थी किन्तु डा.सी.के राउत के दिल्ली भ्रमण की चर्चा जोर शोर से है । इस भ्रमण को कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है । सीमावर्ती राज्य बिहार अब खुलकर मधेश के पक्ष में दिख रहा है । इधर सरकार की नीति ने वार्ता के माहोल को ठण्डा कर दिया है । इसके साथ ही मधेश की जनता की भावना को देखते हुए मधेशी मोर्चा एक मंच पर साथ होने की मनःस्थिति बना चुकी है जो मधेश के हित में एक अच्छी कोशिश कही जा सकती है । मधेशी जनता एक कुशल नेतृत्व और मजबूत संगठन की तलाश में है जो शायद इस महागठबन्धन के द्वारा सम्भव हो सके ।
अन्त में, देश के प्रति प्रेम रखना और देशप्रेम का मिथ्याभिमान करना, इन दोनों में बहुत फर्क है । मिथ्याभिमान से देश का कुछ भला होने वाला नहीं है । अपनों के लिए करना और उनके आगे झुकना अहं नहीं अपनत्व होता है जरुरत इसको आत्मसात् करने की है —
विधाता के नियमों की विडम्बना है
चाहे ना चाहे किन्तु
शासकों की भूलों का उत्तरदायित्व
प्रजा को वहन करना पड़ता है,
उसे गलित मूल्यों का दण्ड भरना पड़ता है । (दुष्यन्त कुमार)shwetasign

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