संशोधन की राजनीति : रणधीर चौधरी

ओली  अपने “पड़ोसी मालिक” को खुश करना चाहते थे । ये अलग बात है कि सीमांतकृत वर्गों का स्वार्थ भी उस संशोधन से जुड़ा हुवा था । आज एमाले चाहे जितनी गालियाँ दे दे भारत को, परंतु भक्ति उने भी की ही है ।


बडी निराशा के साथ कहना पड़ रहा है कि नेपाल एक ऐसे मकाम पर आ ठहरा है जहाँ से इसको आगे बढ़ने में दिक्कतें महसूस हो रही है । वहीं पीछे हटने का साहस नही जुट रहा
रणधीर चौधरी
नेपाल के संविधान २०१५ वाचन के कुछ ही समय मे उसमें पहला संशोधन किया गया, जिस संविधान को इस ब्रह्माण्ड में अतुलनीय बताया गया था कांग्रेस, एमाले, माओवादी और राप्रपा जैसे दलों के द्वारा । हमे याद होना चाहिये कि तभी जो संशोधन हुआ था, वो खडग प्रशाद शर्मा ओली के प्रधानमंत्री काल में हुआ था । जनाब संशोधन के लिये तैयार हुए थे उसका कारण था अपने मालिक को खुश करना । यहाँ हमे एक बात स्पष्ट रूप से क्या समझना होगा कि, नेताओ का असल मालिक जनता होती है । परंतु ओली  अपने “पड़ोसी मालिक” को खुश करना चाहते थे । ये अलग बात है कि सीमांतकृत वर्गों का स्वार्थ भी उस संशोधन से जुड़ा हुवा था । आज एमाले चाहे जितनी गालियाँ दे दे भारत को, परंतु भक्ति उने भी की ही है ।
नोवेम्बर २९ को भी नेपाल के संविधान २०१५ में संशोधन हेतु संशोधन प्रस्ताव दर्ता हुआ है । संविधान से सम्बन्धित सात धाराआें में संसोधन की बात जोर शोर से उठी है । दिलचस्प बात तो यह है कि इस संशोधन प्रस्ताव से कोई भी दल या समुदाय खुश नहीं नजर आ रहा है । नेपाल के पहाड़ी ब्राह्मण और क्षेत्री सबसे ज्यादा दुखित हैं । उनको लगता है कि किसी ने उनकी दोनों किडनी मांग ली है । राजनीतिक दल की जहाँ तक बात है सब के सब मजबूरी के जंजीर में फँसे हुए हंै । किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है । परंतु कहा जाता है कि हरेक समझ और नासमझ के बीच से जो निकलता है वही राजनीति है और नेपाल के नेता भी ऐसी राजनीति में पीछे नहीं हंै ।
तत्कालीन एमाले नेतृत्व सरकार को दफनाने के लिये तीन–सूत्रीय समझौता किया गया । जो कि उस वक्त की आवश्यकता भी थी । नस्लवादी शासन की उँचाई सगरमाथा से उपर जो जाने लगी थी । राणनीतिक रूप में संयुत्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने भी ओली की सत्ता को गिराने में अपना ऐतिहासिक योगदान किया था

सरकार के लिए कांग्रेस का सुझाव– चुनाव घोषणा किया जाए

  • एक सूत्रीय मांग थी मोर्चा की, कि नस्लवादी संविधान में संशोधन करवाकर उसको राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करवाना ।
  • मधेश आन्दोलन में पहाड़ी सत्ता द्वारा की गई हत्याओं की निष्पक्ष छानबीन कराने के लिये छानबीन आयोग गठन करवाना ।
  • मृतकाें को शहीद घोषणा करवाना और घायल आन्दोलकारियाें के इलाज की व्यवस्था कराना ।

कुछ वादे पूरे किये गये माओवादी नेतृत्व की सरकार के द्वारा । महीनाें सत्ता का मजा लेने के बाद संशोधन का प्रस्ताव भी दर्ता हुआ है । परंतु कैसा संसोधन ? २६ सूत्रीय मांग सहित संविधान में संसोधन की आवश्यकता का राग अलाप रहे संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा से बिना परामर्श करते हुए संसोधन प्रस्ताव दर्ता हुआ है । प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होगा इसकी भी अभी कोई सुनिश्चितता नहीं दिखाई दे रही है । अगले साल यानि बिसं २०७४ माघ ७ गते इस परिवर्तित व्यवस्थापिका संसद की समय सीमा समाप्त हो रही है । उस से पहले तीन चुनाव करवाना है । संविधान लागु करवाने के लिये सबसे अव्वल कदम माना जाता है उन तीन चुनाब को और उन चुनावाें को मद्दे नजर रखते हुए देश के सारे दल चुनाव तैयारी में लगे दिख रहे हंै । प्रस्तावित संसोधन प्रस्ताव अभी दलों का चुनावी हथियार बनता दिख रहा है ।
कैसै नेपाल में अभी संविधान संशोधन की राजनीति चल रही है इस में थोड़ी चर्चा की आवश्यकता है । कांग्रेस को एक खौफ ने बैचेन कर के रखा है । अभी “एमाले फोबिया” से ग्रसित है कांग्रेस पार्टी । चुँकि एमाले द्वारा प्रदर्शन हो रहे महेन्द्रवादी चिन्तन ने पहाड़ी ब्राह्मण और क्षत्रियाें को एकजुट कर दिया है और जैसे कि हमें पता है कांग्रेस का वोट बैंक सदियों से मधेश रह चुका है । हिमाल और पहाड़ में उनकी पकड़ उतनी ज्यादा नहीं है । तो जितना है उन सब को राष्ट्रवाद का अफीम खिलाकर एमाले अपने पक्ष में कर लेगा तो कांग्रेस को झटका दिया जा सकता है । मधेश में अभी भी कुछ ऐसे गुलाम मानसिकता के लोग हैं जो एमाले जैसी पार्टी को समझ नही पाए हंै । रामचन्द्र झा की तरह सबमें बगावत करने का आँट नही आ पाया है एमाले के मधेशी नेताओ में । अगर बात करे माओवादी की, तो संसोधन प्रस्ताव दर्ता माओवादी केन्द्र के सरकार के नेतृत्व में ही किया गया है जिसको एमाले राष्ट्रवाद के इँट तले दबाने के प्रयास में लगे हंै और वैसे भी खण्डित माओवादियाें से एमाले को ज्यादा डर नही है आने वाले चुनाव में ।
यहाँ तक कि एमाले ने मधेश को भी दो हिस्सों में बाँट कर के रख दिया है । सरहद मधेश और राजमार्ग मधेश । भारत से सीधे जुटे मधेश जहाँ की मधेशी बाहुुल्य है वहाँ एमाले अपना चुनावी प्रयास करते नहीं दिख रहे हैं । परंतु राजनीतिक राजमार्ग यानि कि महेन्द्रराजमार्ग वाले मधेश में एमाले की चुनावी राजनीति जोरशोर से चल रही है । खस आर्य और पहाड़ी जनजाति बाहुल्य मधेश के उस भाग में एमाले के दिग्गज नेताओं का दौरा, दाउरा सुरवाल और मधेश विरोधी भाषणाें की लहर उच्चतम तह पर दिखाई दे रही है । एमाले का एक ही मानना है कि आने वाले चुनाव में अपने आप को अव्वल पार्टी के रूप में स्थापित करवाना है और ये सब सम्भव दिख रहा है प्रस्तावित संविधान संसोधन के मुद्दों को ले कर ।
हमें एक नजर डालनी होगी मधेशवादी दलों के उपर । एक बात तो स्वीकारना होगा हमें कि प्रस्तावित संविधान संशोधन को ले कर मधेशी मोर्चा भी खुश नजर नहीं आ रहे हैं । संविधान संसोधन जो कि सरदर्द बना है मधेशी मोर्चा के लिये, उसमे थोड़ा सुकून अवश्य महसूस हुआ है उन लोगों को । मधेशी मोर्चा के मनोविज्ञान को अगर बारीकी से देखा जाय तो वे चाहते हैं कि प्रस्तावित संविधान संशोधन पारित हो जाय परंतु उससे पहले मधेश में उन लोगों को अपना चुनावी आधार या कहें तो वोट की संख्या मे थोड़ा बढ़ोतरी दिखाई दे । इसी कारण को आधार बनाकर देखा जाय तो स्पष्ट हो सकते है कि क्यूँ मधेशवादी दल के नेतागण पिछले कई महीनों से पार्टी प्रवेश के कार्यक्रम में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं । संविधान में संशोधन मधेशवादी दलो का महत्वपूर्ण मुद्दा था और है । इस मे शंका की कोई गुन्जाइस नहीं हो सकती । परंतु वर्तमान समय मे यह संशोधन मोर्चा के लिये भी एक राजनीतिक हथकण्डा के रूप में दिखाई दे रहा है ।
सिर्फ राजनीति ही नही बल्कि कूटनीति भी संविधान संशोधन के गलियारों में अपना भविष्य ढूंढता नजर आ रहा है । जैसा कि हमें पता है नेपाल में दो देशों का सीधा कूटनीतिक प्रभाव पड़ता है । जिस में से एक उत्तर में अवस्थित है तो दूसरा दक्षिण में । सात प्रदेश के खाका आने के बाद उत्तर वाले को आराम महसूस हुआ था । वहीं प्रस्तावित संशोधन में जिस तरह से पाँच नम्बर प्रदेश में पहाड़ के जिलाें को समेटने की बात हुई है तो दक्षिण की हवा में भी खुशमिजाजी छाती हुई नजर आ रही है । सामाजिक संजाल ट्वीटर पर दक्षिण के कुछ कुटनीतिज्ञों का ट्वीट पढ़ने योग्य था ।
अन्त में । बडी निराशा के साथ कहना पड़ रहा है कि नेपाल एक ऐसे मकाम पर आ ठहरा है जहाँ से इसको आगे बढ़ने में दिक्कतें महसूस हो रही है । वहीं पीछे हटने का साहस नही जुट रहा । ऐसी स्थिति में सिर्फ दो विकल्प नजर आ रहे हैं । पहला, नेपाल से नस्लवादी चिन्तन का अन्त करना और दूसरा कोई तानाशाह का उदय हो नेपाली राजनीति में । व्

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2 Comments on "संशोधन की राजनीति : रणधीर चौधरी"

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Durga pathak
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इन्डिया नेपालका अनडिक्लिअर शत्रु है । अभी नेपाली अपने अनडिक्लिअर दुश्मन से अनदेखी लँडाइ लडरहा है । इन्डियन पोलिटिसियन और ब्युरोक्राट्सको ए बात समझ लेना चाहिए कि जिसतरह इन्डियन लोग पाकिस्तनको लेतें हैं उसितरह नेपाली लोग इन्डियन सरकार्, इन्डियन ब्योरोक्राट्स और इन्डियन मिडिया को लेते है – नेपाल और नेपालिका सबसे बडा अघोषित दुश्मन । कोइ शक ? ? ? रहा संविधानकी बात , तो वो इन्डियाको अच्छा नही लगा इसिलिए कुच हारे हुए अंगिकृत नेपाली ( जो इन्डियन थे, नेपालका अंगिकृत नागरिकता ले कर नेपाली हुए) को हाथ मे ले कर नेपालको दबोच्रहा है । नेपालके माओबादी तो उसिका… Read more »
g-one pathak
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इन्डिया नेपालका अनडिक्लिअर शत्रु है । अभी नेपाली अपने अनडिक्लिअर दुश्मन से अनदेखी लँडाइ लडरहा है । इन्डियन पोलिटिसियन और ब्युरोक्राट्सको ए बात समझ लेना चाहिए कि जिसतरह इन्डियन लोग पाकिस्तनको लेतें हैं उसितरह नेपाली लोग इन्डियन सरकार्, इन्डियन ब्योरोक्राट्स और इन्डियन मिडिया को लेते है – नेपाल और नेपालिका सबसे बडा अघोषित दुश्मन । कोइ शक ? ? ? रहा संविधानकी बात , तो वो इन्डियाको अच्छा नही लगा इसिलिए कुच हारे हुए अंगिकृत नेपाली ( जो इन्डियन थे, नेपालका अंगिकृत नागरिकता ले कर नेपाली हुए) को हाथ मे ले कर नेपालको दबोच्रहा है ।

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