संसद पर सुप्रीम कोर्ट का प्रहार:-

राजेन्द्र महर्जन

 

संविधान सभा की समय सीमा को चौथी बा बढाने के दौरान बिलकुल ही शान्ति छायी हर्इ थी। इस बा जब संविधान सभा का कार्यकाल संसद के द्वारा बढाया जा हा था तो पिछली बा की तह कोई भी हो हल्ला या अशान्ति नहीं थी। हम लोग तो तनाव, द्वंद्व औ लेन देन के प्रति कितने अभ्यस् त हो गए हैं कि संविधान लिखने का काम क ही संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने के क्रम में बिना किसी मोलमोलाई के सब काम पूरा हो गया इस बात का तो यकीन ही नहीं हो हा है। नेता वार्ता में कितने व्यस् त हना,रात्रि के अन्तिम प्रह में आक सत्ता का लेनदेन होना औ सुबह तक नई सका के उदय के साथ संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने के हम अभ्यस् त हो गए थे।

 

लेकिन इस बा कुछ भी ऐसा नहीं हुआ। बिना किसी ाग लपेट के ही संविधान का ११ वां संशोधन विधेयक पाति हो गया औ संविधान सभा की आयु को ६ महीनों के लिए बढा दिया गया।
साढे तीन वषर्ाें के अभ्यास से जल्द ही संविधान की इच्छा होने के बावजूद पांच महीना में ही बच्चा जन्माने जैसा होगा इस बात की समझ सभी को हो गया है। शायद मीडिया को भी अब इस बात का आभास हो गया है कि सभासदों के वेतन, भत्ता का हिसाब किताब दिखाक संविधान जल्दी नहीं बनने वाला है। नागकि समाज को भी यह तत्व ज्ञान प्राप्त हो गया है कि नेताओं को श्राप देने से औ उन्हें गाली देने से संविधान तो बनने वाला नहीं है। एक दल द्वाा दूसे दल के ऊप शर्त प शर्त खने, खंचातानी कने औ संविधान सभा की समय सीमा को तीन तीन महीनों तक बढाते जाने से भी संविधान नहीं बनने वाला है।
लेकिन लगता है कि देश का सुप्रीम कोर्ट आम नेपाली जनता, मीडिया, नागकि समाज औ ाजनीतिक दलों की तह अभी भी इस बात को नहीं समझ पाई है। जनता की र्सार्वभौम सत्ता का अभ्यास क ही संस् था की आयु निर्धाण कने की क्रियाकलाप कती आ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक बा फि से सआय तय कने जैसा ाजनीतिक फैसला क दिया है। र्सवाेच्च अदालत के फैसले अनुसा संविधान सभा की समय सीमा अन्तिम बा के लिए अब ६ महीने तक ही बर्ढाई जा सकती है। औ यदि इस तय समय प संविधान का निर्माण नहीं हुआ तो संविधान सभा स् वतः ही भंग हो जाएगी। इसके बाद की संवैधानिक क्तिता तोडने के लिए जनमत संग्रह या ताजा जनादेश में जाना पडेगा।
कानूनी नज से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अपनी ही आयु बा बा बढाती चली जा ही अकर्मण्य संविधान सभा को दाये में लाने औ भत्ता के प्यासे सभासदों औ सत्ता के लोभी नेताओं को ठीक कने जैसा प्रतीत होता है। निश्चय ही २०६३ के जन आन्दोलन से पहले ाजा की लात खाने के बाद जिस तह से नेताओं में चेतना आयी थी ठीक उसी प्रका आज सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नकाात्मक गुरू की भूमिका निर्वाह कने जैसा लग हा है। आखि इसी फैसले के बाद से ही तो तीन महीने की समय सीमा ही बर्ढाई जाने के कांग्रेस की जिद औ प्रधानमंत्री के इस् तीफे के बिना संविधान सभा की समय सीमा को नहीं बढने देने के एमाले के ाग के बीच सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही दोनों दल ६ महीने के कार्यकाल बढाए जाने प बिना किसी शर्त औ मानम्नौव्वल के ाजी हो गए। लेकिन नकाात्मक निर्ण्र्ाासे सकाात्मक पणिाम निकालने की कार्यविधि औ शैली को प्रश्रय दिया गया तो बलात्का हत्या औ उत्पीडन में भी नकाात्मकता नहीं दिखाई देगा। औ ऐसी काम कने वाली संस् था के द्वाा खुद को र्सार्वभौम जनता से भी र्सवाेच्च होने का अहम आ सकता है। वर्तमान सर्ंदर्भ में देखा जाए तो इस फैसले का सबसे नकाात्मक पक्ष यह है कि इससे संविधान सभा के स प अनाधिकृत रूप से डेमोकल्स का तलवा लतका दिया है। यदि ६ महीने में भी संविधान का काम पूा नहीं हुआ औ संविधान सभा भंग हो जाती है तो देश में आजक शक्ति का विस् ता होने की पूी संभावना हेगी।
वैसे तो र्सवाेच्च अदालत ने कानूनी औ संवैधानिक आधा प फैसला किया होगा। लेकिन इस तह का ाजनीति फैसला कितना वैध औ जायज यह सवाल ाजनीतिक दलों द्वाा उठाया जा हा है। कहा जाता है कि सभी कानूनी औ वैधानिक फैसला अपने आप में वैध औ जायज नहीं होती है। इसलिए र्सवाेच्च अदालत को चाहिए था कि पहले संविधान सभा की आयु के संबंढ में दिए अपने पुाने फैसले का विवेचना कती। इस संबंध में अदालत के चाों फैसले अन्तविोध पैदा कती है। र्सवाेच्च अदालत ने अपने पहले फैसले में कहा था कि संविधान निर्माण नहीं होने तक संविधान सभा भंग नहीं हो सकता है। लेकिन प्रधान न्यायाधीश सम्मिलित विशेष इजलास ने अपने पहले फैसले प रूलिंग कते हुए कहा था कि संविधान सभा की समय सीमा को अनन्त काल तक नहीं खा जा सकता है। इसी तह तीसे फैसले में दूसे फैसले से थोडा हटक कहा कि संविधान सभा की समय सीमा को बढाना आवश्यकता का सिद्धांत है। लेकिन इस बा तो र्सवाेच्च ने अपने सभी पुाने फैसले को कुचलते हुए कहा कि संविधान सभा का कार्यकाल अन्तिम बा ६ महीने तक के लिए बढाया जा सकता है। यदि पहला, दूसा औ तीसा फैसला सही था तो अन्तिम बा ६ महीने तक के लिए ही संविधान सभा का कार्यकाल बढाये जाने संबंधी फैसला कैसे वैध हो सकता है- किस जायज औ विश्वसनीय आधा, तथ्य औ तर्क के आधा प इस तह का फैसला किया गया है।
गैजिम्मेवा ाजनीतिक नेता या गै सकाी संस् था के हाकिमों के तह र्सवाेच्च अदालत ने भी अपने ाजनीतिक निर्ण्र्ााकने से पहले इसके नकाात्मक अस के बो में शायद विचा नहीं किया होगा। यदि इन ६ महीनो में देश में कोई बडी ाजनीतिक संकट आता है याफि देश को किसी प्राकृतिक आपदा से गुजना पडता है ऐसे में यदि संविधान निर्माण का काम पूा नहीं होता है औ र्सवाेच्च अदालत द्वाा दिए गए फैसले के आधा प संविधान सभा भंग हो जाती है तो इसके बाद की जटिल ाजनीतिक पििस् थति के बो में अदालत के न्यायाधीश खामोश क्यों हो गए हैं। यदि र्सवाेच्च अदालत का फैसला लागू किया जाता है तो उस समय की जटिल ाजनीतिक संकट या फि आजकता फैअलने की स् िथति बनी हेगी।यदि फैसले को अमल में नहीं लाया गया तो इससे र्सवाेच्च अदालत के ही सम्मान औ गमिा को ठेस पहुंचेगी। अदालत की साख खत्म हो जाएगी।
सत्ता औ भत्ता के काण बदनाम होती जा ही संविधान सभा के द्वाा निन्त जाी खने की प्रवृति प अदलत के फैसले से अंकुश लगाए जाने का विचा न्यायाधीशों को आया होगा। लेकिन जनता की र्सार्वभौमसत्ता का अभ्यास कने वाली एकमात्र निर्वाचित संस् था प ही अंकुश लगाने का काम कितना न्यायिक है इसका जवाब भी न्यायाधीशों को देना पडेगा। ±±±

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