संसा की अवस्था:
रबिन्द्र झा

साश यह कि इस दुनिया में हम कभी भी सुख व शान्ति प्राप्त नहीं क सकते। ये जो भी जोड-बहुत सुख नज आ हे हैं, समय पाक दुःखों में बदल जाते हैं। अर्थात सब दुनिया के जीव अपनी-अपनी जगह दुःखों वा मुसीबतों से भे हुए है, असली सुख औ शान्ति उसी को हैं, जिसनर्र् इश्व की भक्ति औ प्या का आसा लिया हुआ है।
तन ध सुखिया कोइ न देखा, जो देखा सो दुखिया हो।
उदय अस्त की बात बहुत है, सब का किया बिबेका हो।

घाट बाढ सब जग दुखिया, क्या गिही बैागी हो।
सुखदेव अचाण दुःख के ड से, गर्भ से गया त्यागी हो।

जोगी दुखिया जंगम दुखिया, तपसी को दुःख दुना हो।
आसा तृष्णा सब को व्यापै, कोई महल न सूना हो।

सँच कहों तो कोई न मानै, मठ कहा नहीं जाई हो।
ब्रह्मा, विष्णु महेसु दुखिया, जिन यह ाह चलाई हो।
कहे वीन्द्र सकल जग दुखिया, संत सुखी मन जीती हो।
अर्थात् कहने का तार्त्पर्य यह है कि इस संसा में जो जीवन जहाँप है, वहीं प दुःखों से व्याप्त है। क्योंकि जिन शक्लें औ पदाथोर्ं में हम सुख ढूँढ हे है- वे सब अस् थायी औ नाशवान है। फि उनका सुख किस प्रका स् थायी हो सकता है ! जब तक हमें वह वस्तु न मिले, जो कभी भी नष्ट औ फनाह न हो, उसे हम अपना न बना ले, हम सुख व शान्ति कैसे पा सकते हैं – क्योंकि जिस चीज आने में खुशी होती है, उसके जाने में वैसा ही दुःख होता है। शादी के समय हमो मन में कितनी खुशी होती है लेकिन अग उसी साथी से झगडÞा या मतभेद हो जाता है तो हम कितने दुःखी हो जाते हैं। जिस सन्तान के जन्म प हम दावते देते है – खुशियाँ मनाते हैं, अग वही सन्तान अयोग्य निकल जाये, कहने में न चले, बीमा हो जायें या पमात्मा उसे वापस बुला ले तो जा सोचें कि वह हमो लिये कितने दुःख का काण बन जाता है। हम दुनियाँ की धन, दौलत में सुख ढूढÞने की कोशिश कते  हैं। इस कमाने के लिए कितने दुःख, कितनी मुसीबतें सहनी पडÞती है।
अपनी किमती असूलों को भी कुबान कते हैं, स्वास्थ्य का भी सत्यानाश क लेते हैं औ कई प्रका की मानसिक वीमायिाँ सि प मोल ले लेते हें। उसे कमाने में ह तह की पेशानी उठाते हैं। लेकिन इतने प भी उस दौलत को खने में कौन सी शान्ति प्राप्त होती है। अग बैंकों में खते हैं तो उनके फेल हो जान का खता है। कभी आय क औ विक्री क का ड औ चिन्ता लगी हती है। कभी याों-दोस्तो के मुक जाने की फिक्री है कि शायद वे रुपया लेक वापस न कें औ जिस वक्त वही दौलत जाती है। अच्छी तह दुःख औ मुसीवतों में फँसा क ही जाती है। कभी डाक्ट की फीसों में होक निकल जाती है तो कभी मुकदमों में उÞलझा क चली जाती है। कितने दुःखों औ मुसीबतों से कमाई की, लेकिन फि भी सुख न दिया उसके जाने प जो शी प मुसीबतें भुगतनी पडÞती है, वे अलग ही है। पापा बाझहु होवे नाही मुहुआ साथ न जाई।। आदि ग्रन्थ ४ः१७।
फि यह सोचक कि शायद दुनिया के एसो-इशत या भोग विलासों में सुख हो। शाबा-कबाबों के खादों में उलझ जाते है। लेकिन ये भी हमो मन को तबाह क देते हैं। गिा देते हैं औ हमें बीमायिों में फँसा देते है। कभी हमे हुकुमत के नशे में सुख ढूढÞते हैं। या ाजनैतिक नेता बनने का शौक हो जाता है। जिस समय लोग हमे. आद औ मान-बडर्Þाई देते है- हमो जूलूस निकालते है, अखबा में ताीफ कते हैं – हमाा मन फूला नहीं समाता। लेकिन हम नेताओं के हाल भी ोज पढÞते है। ातो-ात तख्तें पलट जाते हैं, दूसी पार्टर्ीीा जो पडÞ जाता है, तो वे कभी गोली का शिका बना लेते है, कभी फाँसी के तख्तों प चढÞा देते है। कभी जेल खाने में डाल देते है। जिस हुकूमत के नशे औ दुनिया मान बडर्Þाई में सखु ढूँढने की कोशिश की, वही हमो लिए दुःख का काण बन बैठता है। इस बात प एक कहावत याद आता है मुझे,
सुखु मांगत दुखु आगै आवै।
कहने का तार्त्पर्य यह है कि अग मनुष्यों को अपने इच्छा से सुख मिलता तो दुःख किसी को आता ही नहीं। अग जो मनुष्य सुख ही सुख की अपेक्षा खता है तो उसी मनुष्य के आगे-आगे दुःख आ जाता है। यही है, संसा का नियम औ प्रभु की लीला। ±±±

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