सकारात्मक पहल : सफल या विफल ? नवीन मिश्रा

संविधान संशोधन विधेयक के प्रति शुरु से ही एमाले के विरोधी तेवर रहे हैं । एमाले के अनुसार यह विधेयक विखण्डनकारी है, जिसमें पहाड़ और मधेश को अलग करने की साजिश रची गई है । उसका यह भी मानना है कि यह विधेयक विदेशी शक्ति के कहने पर लाया गया है ।


हिमालिनी, मई अंक से , लंबे अन्तराल के बाद वर्तमान सरकार और मधेशी मोर्चा के बीच जो समझदारी बनी है, वह निश्चय ही नेपाली राजनीति का एक सकारात्मक पहलु है । इस समझदारी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है वर्तमान संविधान में परिमार्जित संशोधन । अगर यह संशोधन हो जाता है तो नेपाली राजनीति में चल रहे गतिरो– का अन्त हो जाएगा और संविधान क्रियान्वयन का भी रास्ता साफ हो जाएगा । लेकिन अगर यह संशोधन नहीं होता है तो परिस्थित वर्तमान से भी ज्यादा विस्फोटक हो जाएगी ।

मन्त्रिपरिषद् बैठक ने मधेशी मोर्चा के साथ हुई सहमति के अनुसार स्थानीय निर्वाचन दो चरणों में वैशाख ३१ तथा जेठ ३१ गते कराने का प्रस्ताव पारित किया है । यह निर्णय मधेशी मोर्चा के निर्वाचन में भागीदारी को लेकर लिया गया है । आयोग से परामर्श के बाद उम्मीदवारों के नामांकन की तिथि भी बढ़ाई गई है । सहमति के अनुसार संविधान संशोधन प्रस्ताव शीघ्रातिशीघ्र पारित कराने का निर्णय लिया गया । इसके अंतर्गत संविधान में उल्लेखित भाषा से संबंन्धित धारा ७ तथा सीमांकन से संबंधित धारा २७४ में परिमार्जन की बात कही गई है । यह भी निर्णय लिया गया है कि संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित होने के तुरंत बाद सीमांकन संबंधन्धी शक्तिशाली आयोग का गठन किया जाएगा । कमल थापा के नेतृत्व में इस कार्य संपादन से संबंधित समिति का कार्यकाल बढ़ा कर इसे और विस्तृत स्वरूप प्रदान किया जाएगा । मंत्रिपरिषद् की बैठक ने आंदोलन का कार्यक्रम घोषित कर चुके मधेशी मोर्चा को आंदोलन छोड़ चुनाव में सहभागी होने के लिए आग्रह किया है । प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेकपा एमाले को संविधान संशोधन में सहयोग करने के लिए भी कहा गया है ।
इसी बीच प्रधानमंत्री दहाल मन्त्रिपरिषद् की बैठक स्थगित कर एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली से मिलने उनके निवास बालकोट पहुँचे । लगभग एक घंटे की मुलाकात में प्रधानमन्त्री दहाल ने मधेशी मोर्चा के साथ हुई सहमति पर उनसे समर्थन का आग्रह किया । प्रतिउत्तर में ओली ने कहा कि वे संविधान संशोधन प्रस्ताव का अध्ययन करने के बाद ही निर्णय करेंगे कि उसका समर्थन करें या विरो– । मधेशी मोर्चा तथा सरकार के बीच दो चरणों में चुनाव कराने तथा संविधान संशोधन प्रस्ताव परिमार्जन के साथ पारित कराने की सहमति बन चुकी थी । इसके परिणास्वरूप मधेशी मोर्चा ने अपने घोषित आंदोलन के सभी कार्यक्रमों को स्थगित करने का निर्णय लिया, जो एक सकारात्मक कदम था ।
इसके पश्चात् सरकार द्वारा संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया । राष्ट्रीय जनता पार्टी तथा संघीय समाजवादी फोरम के अतिरिक्त मधेश केन्द्रीय दलों के मांगों को सम्बोधित करने वाले विधेयक पर छलफल शुरु हुआ । विधेयक को जल्द पारित कराने के उद्देश्य से सभी सांसदों को राजधानी आने का आह्वान किया । जैसा कि अब तक एमाले पार्टी कह रही है कि वह संविधान संशोधन विधेयक का विरो– करेगी, ऐसे में सरकार के लिए संविधान संशोधन विधेयक पास कराना आसान नहीं होगा । संसद में वर्तमान ५९४ सदस्यों में एमाले के १८१ सांसद हैं । प्रतिपक्षी गठबन्धन के अन्य तीन वाम घटक नेकपा (माले), नेमकिपा तथा राष्ट्रीय जनमोर्चा के १२ सीट हैं । प्रतिपक्षी नौ दलीय गठबन्धन में नेपाः पार्टी, मधेश समता पार्टी, बहुजन शक्ति पार्टी अपने एक एक सीट से विधेयक का समर्थन नहीं करते हैं तो संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या की पूर्ति नहीं होगी । गठबन्धन में सहभागी राष्ट्रीय जनमुक्ति पार्टी (दो सीट) फोरम लोकतान्त्रिक में मिल गई है । मन्त्रिपरिषद में शामिल नहीं होकर भी सरकार को समर्थन देने वाली फोरम लोकतांत्रिक का कहना है कि संविधान संशोधन प्रस्ताव के विषय में उनसे परामर्श नहीं किया गया लेकिन फिर भी अब तक उनका तेवर विरोधी नहीं है । संसद में सत्तारुढ़ कांग्रेस के २०७, माओवादी के ८२, राप्रपा के ३७, राजपा के २५, संघीय समाजवादी फोरम के १५, फोरम लोकतांत्रिक के १४ तथा अन्य सीट छोटे दलों के पास है ।
एमाले नेतृत्व के प्रतिपक्षी गठबन्धन के द्वारा राष्ट्रघाती की संज्ञा देने तथा मधेश केन्द्रित दलों के विरो– के परिणामस्वरूप पुराने विधेयक को फिर्ता लिया गया । अब जो नया विधेयक पेश किया गया हे, उसमें राष्ट्रीय सभा के सदस्य चुनने के स्थानीय निकाय के अधिकार में कटौती की गई है । प्रदेश की संख्या तथा सीमांकन परिवर्तन की सिफारिश के लिए स्थायी प्रकृति का संघीय आयोग गठन, जब तक प्रदेश सभा का गठन नहीं होता है, तब तक संघीय संसद को प्रदेश का सीमांकन परिवर्तन करने जैसे अधिकार नए संशोधन विधेयक में शामिल किए गए हैं । संविधान की धारा २७४ में बहुसंख्यक प्रदेश सभा की सहमति में मात्र संघीय संसद के दो तिहाई से प्रदेश की सीमा परिवर्तन करने का प्रावधान है । विधेयक में राष्ट्रीय सभा में भी प्रदेश की जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है ।
नेपाल आदिवासी जनजाति महासंघ ने सरकार तथा राष्ट्रीय जनता पार्टी एवं संघीय गठबन्धन के बीच हुई सहमति के आधार पर होने वाले संविधान संशोधन की आलोचना इस दृष्टिकोण से की है कि इसमें आदिवासी जनजाति से संबंधित विषयों का समावेश नहीं किया गया है । उनका मानना है कि आदिवासी जनजाति का मुख्य मुद्दा पहचान तथा अधिकार है, जिसे अनदेखा किया गया है । संविधान की धारा ५६ में स्वायत्त, संरक्षित तथा विशेष क्षेत्र निर्धारण की बात कही गई है ।
संविधान संशोधन विधेयक के प्रति शुरु से ही एमाले के विरोधी तेवर रहे हैं । एमाले के अनुसार यह विधेयक विखण्डनकारी है, जिसमें पहाड़ और मधेश को अलग करने की साजिश रची गई है । उसका यह भी मानना है कि यह विधेयक विदेशी शक्ति के कहने पर लाया गया है । एमाले दो चरण में चुनाव कराने का भी विरोधी है । उसका कहना है कि बजट से पहले ही चुनाव हो जाना चाहिए । उसका तो यह भी आरोप है कि यह संशोधन विधेयक चुनाव नहीं कराने की एक साजिश है । संविधान संशोधन की अभी कोई आवश्यकता ही नहीं है– विशेष रूप से चुनाव से पहले । स्थानीय चुनाव अभी देश की प्राथमिकता होनी चाहिए । एमाले का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन प्रस्ताव से संविधान की मूल संरचना ही नष्ट होगी बल्कि सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता भी कमजोर होगी । उसका यह भी आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों के अधिकारों की कटौती की गई है ।
जो भी हो, मजबूरी में ही सही लेकिन इस बार नेपाली कांग्रेस और माओवादी संविधान संशोधन कराने के पक्ष में ईमानदार दीख रहे हैं । दूसरी ओर एमाले भले ही कहता है कि वह मधेश और मधेशी का विरोधी नहीं है, सरकार का विरो– करने के लिए ही सही संशोधन विधेयक का विरो– कर रहा है । सरकार अभी भी आश्वस्त है कि संविधान संशोधन पारित होकर रहेगा और नियत समय पर चुनाव भी संपन्न होगा । फिलहाल राजनीतिक दलों के बीच संविधान संशोधन के पक्ष में सहमति बनाने का प्रयास जारी है । अब देखना यह है कि उँट किस करवट बैठता है ।

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