सच कहूँ प्रिय! तुम तो, मेरी कल्पना से भी  बहुत बढ़ कर निकले!

जीवन में कब क्या घटित हो जाए,कोई कुछ नहीं कह सकता! कब माँ सरस्वती कौन सी छुवन ले कर ह्रदय में प्रवेश कर जाएं,इसका भी भान पहले से नहीं हो पाता! प्रेम एक अनूठी अनुभूति है, यह तो मैं पढ़ता-पढाता आया हूँ, लेकिन प्रेम जब ‘उदात्त’ हो जाता है, तब वह शायद केवल पूर्णता में “लय” होने की ही कामना बन जाता है! प्रेम के इसी उदात्त रूप को शायद मीरा ने अनुभव किया होगा और ‘कृष्ण’ की दीवानी मीरा सब कुछ भूल कर बस” मेरे तो गिरधर गोपाल” में ही रम गई! कल श्रीमद भागवत की कथा का प्रसंग सुनने का सुयोग बना, जिस में “अष्टदल कमल” से मानव-मन की व्याख्या करते हुए जब “भीतरी” और “बाहरी” व्यक्तित्व की व्याख्या सुनी तो बेहद सुखद अनुभव हुआ! अत्यंत सुन्दर भाव लिए घर लौटा तो यह रचना माँ सरस्वती ने वरदान में दे दी!मुक्तछंद की रचना आपको सादर समर्पित है।
डॉ “अरुण”
   “मेरी चाह”
आज देखी है तुम्हारी छवि मैंने,
संजोया था जिसे,
युगों से कल्पनाओं में,
संवारता रहा हूँ
जिसको नित-नित
भावों की तूलिका से,
ह्रदय-पटल पर अपने!
सच कहूँ प्रिय!
तुम तो,
मेरी कल्पना से भी
बहुत बढ़ कर निकले!
मुझे तो चौंका दिया था तुम ने,
जब भरी भीड़ में देखा था,
एक चितवन से तुमने मुझे
और फिर भर लिया था
अजाने ही अपनी बाहों में!
मैं कहाँ?
और तुम कहाँ?
ज़मीन और आसमान का अंतर था
हम दोनों में प्रिय!
जिसे एक ही पल में
पाट दिया था तुमने,
जैसे वामन-अवतार लेकर;
शायद इसलिए कि
मैं कभी जान ही ना सकूँ
तुम्हारी ऊंचाई को,
तुम्हारे प्रेम की गहराई को!
मेरे प्रिय!
युगों-युगों से ढूँढ रहा था मैं
तुम को;
मेरे प्यासे अधरों को तलाश थी,
तुम्हारे प्रेमामृत की,
जो तुम ने अनायास ही
पिला दिया है मुझ को
और
मैं अकिंचन से अनायास ही
हो गया हूँ सम्राट!
मैं उपकृत हूँ मेरे प्रिय!
तुम्हारी उदारता देख कर,
सचमुच मैं,
हाँ,हाँ,
सचमुच ही मैं,
भीग गया हूँ
तुम्हारे प्रेम-जल से!
लगता है,
जैसे गंगा-स्नान हो गया है मेरा!
और बस
चाहता हूँ कि आज यह
कि
लय कर दूँ स्वयं को,
तुम में ही
और हो जाऊँ
सदा-सदा के लिए,
तुम्हारा,
केवल तुम्हारा!
      ———————–
डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा “अरुण”
पूर्व प्राचार्य,
74/3, न्यू नेहरु नगर,
रूडकी-247667
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