सडक दे, नहीं तो उन्हें मौत दे ! सडक राजनीति मधेश का अहम सबाल बन सकता है

कैलाश महतो, परासी, २७ , मई |

मध्य मधॆश के मिथिला राजधानी अभी सडक राजनीति का केन्द्र बनने की राह पर है । दो सप्ताह से ज्यादा समय से जनकपुर भिट्ठामोड सडक के पूननिर्माण के लिए सडक के प्रत्यक्ष प्रयोगकर्ता मधेशी जनता आन्दोलन में तप रही है । उनकी माग अति समान्य है । वे अपने जीवन को किसी तरह विगत २५-३० वर्षों तक उस १९ कि-मी सडक के धुल धक्कड खाकर गुजार लिए । मगर अब उन्हें अपने नन्हें मुन्हें बच्चों के अस्वस्थयता की चिन्ता सताए जा रही है । इसिलिए उन्होंने नारा ही बना डाली है कि नेपाल सरकार या तो उन्हें सडक दे, नहीं तो उन्हें मौत दे । देखा यह जा रहा है कि अगर वह सडक अान्दोलन ने अच्छा खासा जोड कहीं पकडा तो काठमाण्डौ के अान्दोलन को छोडकर मधेशी मोर्चा जनता के साथ सडक आन्दोलन मे अा जायेंगे अौर वह सडक अान्दोलन ही मधेश का अहम सवाल बम सकता है ।jaleswar road

 

एक मधेशी दल के क्रान्तिकारी अध्यक्ष नेता अपने जिला नेता कार्यकर्ताअों से मिलने अौर उनके आन्दोलन को तेज बनाने हेतु निर्देशन देने कुछ दिन पहले नवलपरासी के परासी मे पहुँचे थे । तकरीबन दो घण्टों तक एक ही बातों को बारम्बार दोहराते रहे । उनके निर्देशनपूर्ण भाषण  खत्म होने के बाद उनके एक कार्यकर्ता ने उनसे सवाल किया, “हमें आप जिस अान्दोलन में लगने को प्रेरित कर रहे हैं, उसका भविष्य क्या है ? २०६३-६४ में ५४ अौर २०७२ के अाधा वर्ष के नाकाबन्द आन्दोलन में सैकडों लोगों की हत्या हुई है अौर मधेशी मोर्चा के रेकर्ड में सिर्फ ६०-६५ लोगों की शहादत की रेकर्ड है । बाँकी लोगों की शहादत का क्या होगा ?, रौतहट के एक मुस्लिम शहीद जिनके माता पिता, पत्नी अौर तीन बच्चों को पालन पोषण कैसे अौर कौन करेगा ? उनके शहादत देने से पहले उनके घर पर दिनहूँ मधेशी नेता लोग जाकर उन्हें अान्दोलन में सामेल करवाते रहे । जब उनकी हत्या नेपाल प्रहरी ने कर दी तो कुछ राष्ट्रिय नेता भी उनके घर जाकर उनके पत्नी तथा परिवार को लत्ते कपडे, दानापानी तथा दो लाख रुपये फौरन उपलब्ध कराने  की अाश्वासन दी थी । मगर महीनो बाद भी उनको दो रुपये तक किसी से कोई सहयोग नहिं मिल पायी है । अार्थिक रुप से बेहाल उस परिवार के बारे में मधेशी दल क्या सोंचती है ? वे संघीयता लेकर अाखिर मधेश को क्या ही दे पायेंगे ? क्या वे मधेश में नेपालियों द्वारा हो रहे बसाई सराई को रोक पायेंगे संघीयता से ? अौर जब रोक ही नहीं पायेंगे तो निकट भविष्य में मधेश के मुख्यमंन्त्री मधेशी बनेंगे या पहाड से अाये नेपाली ? अापने कई मंचों से कहा है कि अगर पहाडी लोग मधेशियों को मधेश प्रान्त नहीं दिये तो वे अलग देश बनायेंगे । तो नेपाली शासक नहीं दे रहे हैं तो देश की माँग अब कब होगी ?” उनके इतने से सवालों से परेशान होकर गुस्से को इजहार करते हुए उन्हे बैठने को कहने के साथ कहते हैं कि उनके जैसा क्रन्तिकारी बातें उन्हें भी करने अाती है । मगर वे मधेश देश नहीं चाहते अभी । बाद में स्टेप बाइ स्टेप लेंगे । वे वखुबी जानते हैं कि देश लेने के राजनीतिक नाम पर वे कमा लेंगे अौर देश कहते कहते दुनियाँ छोड चलेंगे अौर उनके अौलादें तबतक विदेश निवासी हो जायेंगे । तब जाने भेंड अौर चमचे मधेशिया ।

ग्यात हो कि वही नेता २०६३ के प्रथम मधेश अान्दोलन को निस्तेज करने के उद्देश्य से तत्कालिन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोईराला ने मधेश के नाम पर जब पहला सम्बोधन किया था तो उनके सरकार मे रहे वे नेता ने कहा था, “प्रधानमन्त्री ने मधेशियों का ९०% माँगे पूरीकर दी अौर अब मधेश अान्दोलन होना गलत है ।” लेकिन मधेश ने जब माना नहीं तो उस अान्दोलन के दुसरे चरण मे वे उस अान्दोलन के सहयोगी हो गये । अाज फिर स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के अभियान को वे गलत बताते हुए यह प्रचार करने मे व्यस्त हैं कि जब प्रदेश नहीं मिल रहे हैं तो देश कैसे मिलेंगे ? उनको हर नयी अान्दोलन अौर उसके रिजल्ट असम्भव नजर आते हैं शुरु में । मगर जब मधेशी जनता सफल बना दे या बनाने के करीब चले जायें तो सट्ट से उसमें घुस कर उससे फायदे उठाने मे संभावना बन जाती है ।

गौर करने की ऎतिहासिक बात है जब सद्भावना के जन्मपिता गजेन्द्रनारायण सिंह की देहावसान हुई थी तो उनके अर्थी पर एक फूल अौर एक अगरबत्ती तक अर्पण नहीं करने बाले वे अौर उनके तत्कालिन पार्टी नेता लोग अध्यक्ष बनने के लिए उनके लाश के पास ही अपने पक्ष मे लविंग कर रहे थे । उनके अन्तिम क्रियाकर्म के दिन वे दारु अौर मांस के भोज कर रहे थे । अाज वे मधेश के अव्वल नेता बन बैठे हैं । गजेन्द्र जी को जीवन काल में खून के अाँसु रुलाने बाले वे लोग उनके तस्वीर पर माल्यार्पण करते नजर अाते हैं ।

उनके कारण अाज मधेश की राजनीति ही नहीं, अपितु मधेश के सडके भी भिखारी बन बैठे हैं । मधेश की अस्मिता बन्धक में पड गयी है अौर उन्हें नेपाली राजनीति की फिक्र सता रही है । वे उसी नेपाली राज सत्ता के मजबूतीकरण मे लगे हुए हैं जो मधेश के हर नीति को तहस नहस लर डाली है । देखते देखते सडकों पर मधेशियों को चलने से भी रोकने की अव्यक्त निर्देशन देने लगी है ।

डेढ दो साल पहले तक नेपाल के पहाडी इलाकों मे सडक बनाने के काम सम्पन्न किये भारतीय भिस्वा कन्सट्रक्सन ने उसी प्रक्रिया से सर्लाही के नवलपुर-मलंगवा सडक पूनर्निमाण करने का जब काम शुरु किया तो नेपाल सरकार ने उसे यह कहकर रोक दिया कि उसे उसके नेपाल अाने बाले सम्पूर्ण भारतीय नम्बर प्लेट के गाडियों को भंसार करवाने पडेंगे, तेल नेपाल के ही पम्पों से लेने होंगे, नेपाली प्राविधिकों को ही काम देने होंगे, अादि, इत्यादि शर्ते रख दी । पहाडों मे वही काम करने बाले उस कन्सट्रक्शन को इसके अपने अनुसार काम करने दिया गया, सारा काम बिना कोई भंसार भारतीय गाडियों ने की अौर कर्मचारी रखने मे भी कोई झंझट नहीं हुई । उस कम्पनी ने मधेश के टुटे फुटे १०५ कि-मी सडके बनाने की योजना लेकर अाई थी । मगर काम होने नहीं दिया गया । मधेशी दल अौर नेताओं को इन कामों से कोई सरोकार नहीं रहा । हुलाकी सडक दम तोडने लगी है । उसको बनाने के नये नये नाटक मंचन कि जाती है, मगर बनने नहीं दि जाती है । उसपर काम करने अाने बाले ठेकेदार तथा कम्पनियों को कोई न कोई माटक रचकर भगा दी जाती है अौर इल्जाम उस कम्पनी पर उल्टे लगा दिया जाता है । अाज वे मधेश के अधिकार अौर विकास के लिए मधेशियों की शहादत माँग रहे हैं ।

मधेश मे सडक नहीं बनने देने मे नेपाली राज्य को अाखिर फायदे क्या हो सकते है ? अाये जरा इस पर विचार करें । नेपाली राज्य यह जानता है कि मधेशी युवा वर्गों को महँगे लत्ते कपडे अौर गाडियों का पहले शौकिन बनाये । किसानों को महँगाई मे ट्र्याक्टर खरीदबायें । मधेश के सडकों पर मधेशियों के यातायात के साधनें चलबायें । महँगे फैशनेब्ल कपडे खरीदबायें । सडकों के धुल मधेशियों के घर, अाँगन, उसके खाना, पानी तथा उसके नाक, कान, मुँह अौर अाँखों मे परबायें ता कि मधेशी असमय मे ही कफ, दमा, टीवी के शिकार हो जाये अौर अन्न, गर गहना तथा खेतबारी बेचकर इलाज कराये । ५ साल अाराम से चलने बाले सार्वजनिक सवारी साधन, निजी बस, जीप, ट्रयाक्टर, मोटरसाइकिल अादि ६ महीने या सल भर में बिगरने लगे अौर मरम्मत वगैरह करबाते रहने से नेपाली राज्य को अार्थिक फायदे होंगे । खेतबारी बेच कर पून: पून: वे गाडियाँ खरीदेंगे अौर उन्हें मधेश के कमाई अौर सम्पति हडपने के मौके मिलेंगे । मधेशी धिरे धिरे सम्पतिहिन, भूमिहिन, दरिद्र अौर कंगाल होकर मधेश से पलायन होंगे अौर अन्तत: मधेश को वे नेपाल घोषित कर सारा मधेश कब्जा कर लेंगे ।

Loading...