सत्ता का खेल – वार्ता फेल : गंगेश मिश्र

गंगेश मिश्र, काठमांडू ,३० अक्टूबर |

इस देश की राजनैतिक परम्परा रही है – वार्ता टोली का गठन। बात-बात पर ऐसी टोलियाँ बनती रहीं, जो निष्कर्ष बिना; वार्ता समाप्ति कीगारंटी रहीं है। इसी परम्परा का निर्वाह करते हुए, ऐसे ही एक वार्ता टोली का गठन हुआ; आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा के नेताओं से वार्ता करने के लिए। तथाकथित इन वार्ता टोलियों के चार चरण होते हैं १; गृहकार्य बिना, दिशाहीन वार्ता प्रारम्भ। २; निष्कर्ष बिना समापन। ३; वार्ता के लिए अगली तिथि-निर्धारण। ४; पुनः वार्ता प्रारम्भ।
इस प्रकार वार्ता का चक्र घूमता रहता है। तो फिर क्या औचित्य है, ऐसीवार्ता टोली गठन करने का ?

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कल्ह २९ अक्टूबर की वार्ता बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो गई है। सरकारीवार्ता टोली के सदस्य एवं कानून मंत्री अग्नि खरेल, वार्ता के बीच में ही उठ कर चल दिए। मधेशी मोर्चा के सदस्य एवं संघीय समाजवादी फोरम के उपाध्यक्ष, सांसद लालबाबू राउत ने बताया कि वार्ता के दौरान सीमांकन सम्बन्धी धारणा की चर्चा ही नहीं हो पाई। फिर सर्वसम्मति से वार्ता के लिए १ नवम्बर की तिथि निर्धारित कर दी गई। वास्तव में, नेपाल सरकार इस आन्दोलन को लम्बा खीचना चाहती है। सरकार को लगता है, धीरे-धीरे अपने आप आन्दोलन मन्थर हो जाएगा। आन्दोलन को प्रभावित करने के लिए, सुरु से ही भ्रम की खेती करती रही है यह सरकार। कभी भारत पर नाकाबंदी करने का आरोप लगाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से समर्थन प्रात करने का असफल प्रयास किया, तो कभी मधेशी मोर्चा द्वारा प्रधानमन्त्री के चुनाव में भाग लेने के लिए, भारत द्वारा खरीदे जाने का दुष्प्रचार किया। तब इस सरकार ने हद ही पार कर दी, जब मधेश के निवासी मधेशियों को भारतीय नागरिक बिहारी तक कह दिया।सरकार की मनसा ठीक नहीं है, इसलिए मधेश आन्दोलन को सफल बनाने के लिए कुशल रणनीति की आवश्यकता है। नहीं तो, यह आन्दोलन ऐसे ही निष्कर्षहीन चलतारहेगा।। जय मधेश ।।

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