सत्ता की धुरी में घूमती राजनीति

सभी कुर्सि पीछे
जब सन् २०११ अन्त्य हो रहा था, उस के तीन महिना पहले डा. बाबुराम भट्टर्राई के नेतृत्व में बहुमतीय सरकार बनी। उसी समय से प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले ने सरकार का विरोध किया था। सन् २०१२ के शुभारम्भ में ही संविधान बनाने के लिए ‘सहमतीय नयी सरकार आवश्यक है’ कहते हुए प्रतिपक्षी दलों ने सरकार के विरुद्ध सडक आन्दोलन में जाने की चेतावनी भी दी थी। सरकार को र्समर्थन दे रहे मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल लगायत कुछ दलों ने सरकारको दिया गया र्समर्थन भी उसी समय वापस लिया था। लेकिन सरकार परिवर्तन हो नहीं सका। संविधान जारी करने की तिथि जेठ १४ भी आ गई। नया संविधान जारी किया जाय अथवा पुनः संविधानसभा की मिति बर्ढाई जाय, इस विषय में दलों के बीच सत्ता केन्द्रित वार्गेनिङ भी हर्ुइ। लेकिन सहमति नहीं होने के कारण संविधान जारी नहीं हो पाया। इसी अवस्था में संविधानसभा भंग कर दिया गया। इस के लिए सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष ने एक-दूसरे को दोषारोपण किया। उसके बाद सरकार परिवर्तन का नारा और तेज होते गया। राजनीतिक दलों ने हरेक र्सार्वजनिक स्थल में इसी विषय को मुख्य मुद्दा बनाकर पेश किया। उसी तरह औपचारिक तथा अनौपचारिक हरेक कार्यक्रम में इसी विषय को महत्त्व दिया गया। फिर भी सरकार परिवर्तन नहीं हो सका। प्रतिपक्षी दल जैसे भी डा. बाबुराम भट्टर्राई को सत्ता से हटाना चाहते हैं तो सत्ताधारी दल जैसे भी हो सत्ता में ही चिपके रहना चाहते हैं। सत्ता मोह के कारण ऐसी हरकतें अभी भी जारी हैं। पता नहीं यह रवैया कब बदलेगा –
इसीलिए समग्र में यह एक साल राजनीतिक दलों ने सत्ता के पीछे भागते हुए गुजारा। अर्थात् प्रतिपक्षी जैसे भी सत्ता प्राप्ति के लिए केन्द्रित रहा और सत्तापक्ष किसी भी हालत में वहां से हिलना नहीं चाहता। इस विवाद में उलझकर नया संविधान तो बन ही नहीं पाया, गणतन्त्र तथा संघीयता भी संकट में दिखाइ देने लगे। देश राजनीतिक और संवैधानिक जटिलता में फँसते गया। अभी भी राजनीतिक दल इस संकट से देश को मुक्त कराने के बजाय सत्ता कब्जा के प्रति ही ज्यादा केन्द्रित हैं। दलों के बीच रहे इसी सत्तामोह के कारण जनआन्दोलन द्वारा प्राप्त उपलब्धी भी खतरे में दिखाइ दे रहा है।
सत्ता के लिए प्रतिपक्षी और सत्ताधारी दल आपस में मोर्चाबन्दी करते हुए सडÞक आन्दोलन में उतर आए। सरकार गिराने के लिए तीसरा जनआन्दोलन शुरु करने की चेतावनी प्रतिपक्षी दल सम्वद्ध मोर्चा के नेताओं ने दी। इधर सत्ताधारी दलों ने भी उसके प्रतिवाद के लिए ‘संयुक्त संघीय लोकतान्त्रिक गणतान्त्रिक मोर्चा’ का निर्माण किया और सडक में जाने की घोषणा की। इस तरह दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात जनता में पहुँचाने का दावा करते हुए सडÞक संर्घष्ा में उतर आना लज्जास्पद बात है। सत्ताधारी और प्रतिपक्षी के बीच जारी वाक्युद्ध के क्रम में एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने तो वर्तमान सरकार के द्वारा ही २० साल तक सत्ता सञ्चालन होने का उद्घोष भी किया। इसी तरह राजनीतिक दल कभी संविधानसभा पुनःस्थापना तो कभी नये निर्वाचन के शब्दजाल में जनता को फंसाते रहेहैं । सत्ता ही इन सब घटनाओं के केन्द्रविन्दु में रही।
अभी भी सभी दल दावा कर रहे हैं कि अगर अपने नेतृत्व में राष्ट्रिय सहमति की सरकार बने तो देश में प्रजातन्त्र की रक्षा होगी और निष्पक्ष चुनाव भी सम्पन्न होगा। दलों के बीच रही इसी दर्रि्र मानसिकता के कारण ही जनप्रतिनिधिमूलक संस्था संविधानसभा भंग हो जाने के एक साल बाद भी नये निर्वाचन का वातावरण निर्माण नहीं हो पाया है। अभी भी हर दल के नेता कह रहे हैं- ‘सहमति के लिए मैं जिस तरह का भी त्याग करने के लिए तैयार हूँ।’ लेकिन हम सब जानते हैं कि उन सभी की सहमति का ‘बटमलाइन’ तो अपने अनुकूल की सरकार निर्माण ही है, जो सम्भव नहीं है। इस तरह सहमति के बहाने देश को बन्धक बनानेवाले प्रमुख चार राजनीतिक दल एकीकृत नेकपा माओवादी, नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और संयुक्त मधेशी मोर्चा ही हैं। यह बात सभी को मालूम हैं कि जिस तरह का भी त्याग करने के लिए तैयार बतानेवाले किसी ने भी अब नये निर्वाचन सम्पन्न नहीं होने तक अपने दल में से कोई भी प्रधानमन्त्री नहीं बनेगा, ऐसा नहीं कहा है। समस्या की जडÞ भी यही है। और इस तरह सभी दल सत्ता के नेतृत्व के लिए आकांक्षी बने रहें तो कैसे निर्माण हो सकता है- सहमतीय सरकार और चुनाव का वातावरण – यदि सच में ही सभी दल नयी सरकार, राजनीतिक निकास और नये निर्वाचन चाहते हैं तो कम से कम यह चार दल की तरफ से बचनवद्धता होना चाहिए कि नये निर्वाचन सम्पन्न नहीं होने तक हम में से कोई भी प्रधानमन्त्री नहीं बनेगा। क्या ऐसी घोषणा कोई भी पार्टर्ीीर सकती है – ऐसा तो नहीं लगता।
सत्ता के भीतर भी द्वन्द्व
डा. बाबुराम भट्टर्राई नेतृत्व की सरकार अपने ही भीतर भी द्वन्द्व में रही। सरकार निर्माण के समय में मधेशी मोर्चा के साथ हुए सहमति कार्यान्वयन करने के सवाल पर हो अथवा विभिन्न समय में मधेश के सवाल में किए गए निर्ण्र्ााकार्यान्वयन की बात में हो, डा. बाबुराम भट्टर्राई और मधेशी मोर्चा के बीच भारी द्वन्द्व हुआ। निर्ण्र्ााकार्यान्वयन करें तो विपक्षी दल हंगामा करता है नहीं करें तो मधेशी मोर्चा दबाव दे रहा है। इस अवस्था का तब अन्त हुआ था, जब प्रतिपक्षी दल पूरी तरह से सरकार के विरुद्ध उतर आए और मधेशी मोर्चा अपने मुद्दा कार्यान्वयन कराने के बजाय सत्ता में रहने के लिए ही ज्यादा लालायित बनेरहे ।
विशेषतः नेपाली सेना में मधेशी युवाओं का सामूहिक प्रवेश के सवाल में ज्यादा ही विवाद हुआ। इसी तरह कर्मचारी का तबादला और पदोन्नति में भी मधेशी मोर्चा के साथ प्रधानमन्त्री का मतभेद बना रहा। पछिली बार नेपाल प्रहरी में महानिरीक्षक और सरकार के मुख्य सचिव पदनोन्नति के सवाल पर मधेशी मोर्चा तथा गृहमन्त्री के साथ प्रधानमन्त्री का द्वन्द्व चरमोत्कर्षमें पहुँच गया था। लेकिन जितना विवाद हो, प्रधानमन्त्री भट्टर्राई ने मधेशी मोर्चा में रहे सत्तालिप्सा को पहचानते हुए सभी निर्ण्र्ााअपने ही पक्ष में करा लिया। इधर भाषण में मधेश और मधेशी मुद्दाको प्राथमिकता देनेवाले मधेशी दल तथा मन्त्री ने सरकार में रहकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थसिद्ध करने के अलावा और कुछ नहीं किया। इसका ज्वलन्त उदाहरण यह है कि डा. भट्टर्राई के नेतृत्व में सरकार बनने से पहले मोर्चाद्वारा उठाया गया मधेश का मुद्दा अभी भी जैसा का तैसा रहना। इसी तरह द्वन्द्वकाल में माओवादी द्वारा कब्जा की गई सम्पत्ति और उसके विक्री-वितरण को सरकार की तरफ से वैधानिकता देनेवाला निर्ण्र्ााविवादित बन गया।
मधेशी दलों को एक फायदा
मधेशी मोर्चा डा. बाबुराम भट्टर्राई नेतृत्व की सरकार में सम्मिलित होने के बाद उन लोगों के लिए एक ही फयदा हुआ है, जो विगत में नहीं हुआ था और भविष्य में भी होना मुश्किल है। वह फायदा है- गृह, सञ्चार, भौतिक निर्माण तथा योजना, सञ्चार जैसा शानदार मन्त्रालय हाथ में लेना और अधिक मधेशियों को मन्त्री बनाना। क्योंकि डा. भट्टर्राई के कार्यकाल से पहले कभी भी इतनी बडÞी संख्या में मधेशी लोग मन्त्री नहीं बने थे। जिसके कारण भी मधेशी मोर्चा डा. बाबुराम भट्टर्राई के विकल्प में दूसरी सरकार बनाना नहीं चाहता।
विवाद में गच्छेदार
सिर्फमधेश की राजनीति में ही नहीं, सम्पर्ूण्ा राजनीति में मधेशी जनअधिकार फोरम गणतान्त्रिक के अध्यक्ष तथा गृहमन्त्री विजयकुमार गच्छेदार इस साल कुछ अधिक ही चर्चा में रहे। पार्टर्ीीे अन्दर रहे आन्तरिक विवाद से लेकर मन्त्रालय सञ्चालन, प्रहरी अधिकृतों का स्थानान्तरण और पदोन्नति, नेपाली सेना में मधेशी युवाओं की भर्ती, नागरिकता वितरण लगायत कुछ काण्ड में वह विवादित रहे। कतिपय सञ्चार माध्यम ने तो प्रहरी अधिकृत के तबादला और पदोन्नति में गच्छदार के द्वारा आर्थिक अनियमितता होने का आरोप भी लगाया। उसी तरह थरुहट क्षेत्र कैलाली-कञ्चनपुर पहुँचकर उन्होंने मधेशी मोर्चा के बटमलाइन मानेजाने वाले ‘मधेश एक प्रदेश’ के विरुद्ध भी अभिव्यक्ति दिया। समय-समय में प्रधानमन्त्री की चाहना विपरीत के काम करने से भी वह चर्चा में रहते थे। साल के आखिर में वे भी सहमतीय सरकार के प्रधानमन्त्री के रुप में भी चर्चा में आए।
इसी तरह फोरम नेपाल से अलग होकर नयी पार्टर्ीीठन करनेवाले गच्छदार सरकार में रहते समय अपने ही पार्टर्ीीो टूटने से नहीं बचा पाए। पार्टर्ीीे भीतर के कुछ नेताओं ने गच्छदार को पद छोडÞने के लिए बारबार आग्रह किया और चेतावनी भी दी। लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। उसके बाद असन्तुष्ट नेताओं ने शरदसिंह भण्डारी के नेतृत्व में नयी पार्टर्ीीठन कर ली।

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