सत्ता के खेल में उलझा मधेश

नेपाल के नए संविधान को भारत, अमेरिका और अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ–साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वागत नहीं किया । मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी आलोचना की है ।
मुरली मनोहर तिवारी:मधेश अपने सबसे लम्बे आंदोलन और सबसे बुरे समय के खिलाफ संघर्ष के जद्दोजहद में है । जबकि मधेश के चुने हुए प्रतिनिधि द्वारा विश्वासघात हुआ । तब विरोध, जनप्रदर्शन और नाकाबंदी शुरू हुआ । किसी लोकतांत्रिक देश में विरोध के जो तरीके हो सकते हंै, मधेश ने सिर्फ उसे ही अपनाया है । इसके विपरीत तानाशाही और निरंकुश शासन में दमन के जितने हथकंडे होते हंै, सरकार उसे अपना रही है । सुशिल कोइराला से केपी ओली की सरकार में सत्ता बदली पर सोच नहीं बदली है । पहले सांकेतिक रूप में ही सरकार में समावेशी चरित्र दिखाने का ढोंग होता तो था । अब राष्ट्र प्रमुख, सरकार प्रमुख, गृह प्रमुख, अर्थ प्रमुख, परराष्ट्र प्रमुख, निजामति सेवा प्रमुख, लोकसेवा प्रमुख, सैनिक प्रमुख, प्रहरी प्रमुख और जिला प्रमुख सब एक ही जाति से हंै । अब सत्ता कब्जÞा का निर्लज्ज खेल खुलेआम हो रहा है । अगर ये एक समय का संयोग मात्र होता तो अलग बात होती । पर इसकी निरंतरता के लिए संविधान में मधेश को सभी अधिकारो से वंचित किया गया है । मधेश को उपनिवेश और मधेशी को सदियों तक गुलाम करने के लिए संवैधानिक बेडि़यों की इजाद की गई है ।
नेपाल के नए संविधान को भारत, अमेरिका और अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ–साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वागत नहीं किया । मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी आलोचना की है । दक्षिण एशिया में एमनेस्टी के रिसर्च डायरेक्टर डेविड ग्रिकिथ ने कहा कि नए संविधान में मानवाधिकार हनन किया गया है । महिलाआें के साथ भेदभाव बढ़ाने वाले कानूनों का प्रावधान किया गया है । संसद में मधेशी जनसंख्या के प्रतिनिधित्व को कम किया गया है । निर्वाचन क्षेत्र भी पूर्वाग्रहयुक्त तरीके से काटा गया है । भाषा के अधिकार से वंचित किया गया है ।
सरकार ने कूटनीतिक चाल चलते हुए मधेश की मांग से ध्यान हटाने के लिए नियोजित तरीके से भारत के खिलाफ प्रदर्शन को बढ़ावा दिया । इसके प्रतिक्रिया स्वरुप चीन के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए । नेपाल सरकार ने भारत और मोदी खिलाफ प्रदर्शन को सरकारी सुरक्षा दिया और चीन खिलाफ प्रदर्शन में गिरपÞm्तारी कराया । काठमांडू के आंदोलन में पानी की बौछार और मधेश आंदोलन में गोलियों की बौछार करायी ।
नेपाल सरकार ने मधेश आंदोलन को भारत और चीन से प्रतिस्पर्धा कराकर और प्रभावहीन वार्ता कराकर आंदोलन ओझल करने का प्रयास किया है । भारत पर नाकाबंदी के सम्बन्ध में लांक्षणा भी लगाया जिस पर भारत को स्पष्टीकरण देना पड़ा । भारत के प्रवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की तरफ से कोई नाकाबंदी नहीं की गई है । भारत ने नेपाल के संविधान में बिशेष संशोधन की कोई सूची नहीं सौंपी है, बल्कि जिन मुद्दों पर मतभेद है, उसका समाधान बातचीत से होना चाहिए और संविधान को बहुसंख्यक अपनत्व और स्वीकार्य होने वाला बनाया जाना चाहिए यह सलाह मात्र दिया है । ऐसा कोई भी शुभेच्छु कर सकता है लेकिन इस बात को भी गलत तरीके से प्रचार कर के भारत के खिलाफ माहोल बिगाड़ने की पूरी कोशिश सरकार अपनी ओर से किए जा रही है ।
भारतीय दूतावास इस समय सक्रिय दिख रहा है, लेकिन मधेशियों को भारतीय, हिन्दीभाषी और धोती कहकर उपेक्षित किया जाता रहा, उस समय दूतावास शांत बना रहता था । मधेशी नेपाल के भेदभावपूर्ण नीति से आहत होते हुए भी, इसे भारत सरकार की मंशा मान लेते थे, जबकि भारत के विदेश मंत्रालय को इसकी जानकारी तक नहीं होती थी । पिछले पांच माह से भारत चुपचाप बैठा रहा, जबकि मधेशी अवाम भारत से हस्तक्षेप की उम्मीद लगाए रही ।
कुछ माह पहले प्रचंड जब दिल्ली आए थे, तो भारत ने अपनी सामरिक चिंताओं से अवगत कराया था, परंतु भारत की चिंताओं पर प्रचंड ने चुप्पी साध ली, भारत से भूकंप त्रासदी पर कितनी राशि दी जा रही है इसी पर मोलभाव करते रहे । भारत उनकी नीयत उसी समय ताड़ गया था । बाद में भारत के खिलाफ पहाड़ी दल के गोलबंदी में इसका असली चेहरा उजागर हुआ । सभी पहाड़ी दल के मिलने, हिंदूवादी दल के कमल थापा और पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह भी एकजुट दिखे । इसके पहले नेपाल के सत्ताधारी, चीन का भय दिखा कर भारत से अनुचित लाभ लेते रहे । भारत में मोदी सरकार ने इनके अनुचित कार्य में सहयोग नहीं किया जिस कारण इनका असली चेहरा सामने आया ।
चीन पूरे घटनाक्रम में किसी भी हाथ आए मौके को छोड़ना नहीं चाहता, और चुपचाप अपनी कूटनीतिक चालें चल रहा है । चीन के कई कूटनीतिज्ञ नेपाल में इन दिनों डेरा जमाए हुए है । भारत ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को नेपाल में प्रायोजित भारत विरोधी भावनाओं पर नजर रखने को कहा है।
नेपाल सरकार भारत विरोधी प्रदर्शन कराकर मोदी सरकार की नेपाल नीति असफल दिखाना चाहती है, जिस कारण भारत में विपक्षी दल मोदी सरकार पर दबाव बना सके । इन्हीं कारणों से सरकार वार्ता की नौटंकी कर रही है जिससे सरकार को अतिरिक्त समय मिल सके । इससे सरकार को कई फायदे हो सकते हंै । मसलन आंदोलन का कमर टूट जाना । छठ के बाद धान कटनी से उपस्थिति कम हो जाए । मधेशी स्वतः थक जाएँ । मधेशी दल में फूट हो जाए । आंदोलन में कोई दुर्घटना हो जाए जिससे अंतर्राष्ट्रीय जगत में मधेश के प्रति सहानुभूति समाप्त हो जाए । पहाड़ी जनता भारत और मधेश के खिलाफ उग्र हो जाए । भारत दबाव में आ जाए । इन सारी मंशाओं से नेपाल सरकार ग्रस्त है और ऐसे वातावरण के इन्तजार में है ।
मधेशी मोर्चा के साथ–साथ अन्य कई मोर्चे सड़क पर हैं । संसदीय राजनीति से लेकर गैर संसदीय दल भी आंदोलित है । गैर सरकारी संगठन के साथ–साथ मधेश के विभिन्न जाति समूह ने एकबद्धता जतायी है । स्रुवतःस्रुरुफूर्त तररुीके से लोग घररुों से बाहररु आ ररुहे हंैरुरु। पहाडवतःस्फूर्त तरीके से लोग घरों से बाहर आ रहे हंै । पहाड़ी और नेवारी समाज ने भी आंदोलन में समर्थन किया । सरकार की अनदेखी के कारण आंदोलन हिंसक और दुर्घटनाग्रस्त होने का संशय बना रहता है । अलग देश का नारा युवाओ में सर चढ़कर असर दिखाने लगा ह ै। मधेशी राजनीतिक दल सरकार के दमन और युवाओं की सोच के बीच अपने सिद्धान्त पर टिके रहने का अथक प्रयास कर रहा है। अचानक आंदोलन अति उत्साह से साथ ऊँचाई छूता है, तो अगले पल घोर निराशा छा जाती है । तमरा अभियान सरीखे संगठन इसमें निःस्वार्थ भाव से स्थिरता और परिपक्वता देने का कार्य कर रहा है ।
इन सब के बीच मधेशी निमुखा जनता अपने दर्द में घुट रही हैं । इतने दिन संघर्ष के बावजूद कामयाबी की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही है । मधेश के गांव–गांव से लाखों की संख्या में नाका पर प्रतिदिन जनता पहुँच रही है । अपने घर से चावल, दाल, राशन लेकर अपने जायज माँग के लिए आते हंै । ये जनता जो सड़क पर उतरी है वे किसी दल या सोच से बंधी नहीं है । ये अपनी पहचान, स्वाभिमान, सम्मान, अधिकार, न्याय और समानता की चाह में आगे आ रहे हैं । मधेश के सारे गैर सरकारी संगठन निःस्वार्थ भाव से जनजागरण अभियान मापÞर्mत सहयोग कर रहे हंै । यदि मधेश इस बार चूक जाता है तो आने वाली कई नस्लों को इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा ।
किसी देश में सरकार की क्या आवश्यकता है ? जो सरकार अपने नागरिकों में भेदभाव करे उस पर विश्वास कैसे हो ? एक तरफ आधी जनता आंदोलन में है तो दूसरी तरफ बाकी आधी जनता उस आंदोलन के प्रभाव से पीडि़त है । सरकार का ये दायित्व है, कर्तव्य है की आंदोलित जनता की समस्या समाधान करे । परंतु ये नई सरकार अपने हनीमून मनाने में मस्त है । अपने स्वार्थ में अपने दो पड़ोसी मित्र राष्ट्र में विवाद कराकर अपनी रोटिया सेंक रही है । नेपाल दो बड़े पडोसी के बीच पिस ना जाए इसीलिए खम्पा बिद्रोह के समय नेपाल का भारत और चीन से त्रिपक्षीय सहमति हुई थी । जिसमें तीनो देश एक दूसरे के हित की रक्षा को वचनबद्ध हुए थे । उसी सहमति अनुसार शक्ति, सुरक्षा, और सहअस्तित्व के पलड़े को बराबर रखा जा सका था । नेपाल सरकार जाने–अनजाने में उसे छेड़ने की गुस्ताखी कर रही है जो नेपाल के अस्तित्व के लिए खतरा साबित हो सकता है । इन्हीं गुस्रुताखियों के काररुण दुनिया के मानचित्र से कई देश के नाम मिट गए औरुररु कई नाम जुडताखियों के कारण दुनिया के मानचित्र से कई देश के नाम मिट गए और कई नाम जुड़ गए । किसने सोचा था कि विश्व विजेता सिकंदर का देश भी दिवालिया हो सकता है । नेपाल सरकार को समय रहते सँभलने की जरुरत है इतिहास से सबक लेने की जरुरत है वरना इतिहास बनते देर नहीं लगती ।

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