सत्ता के चक्रव्यूह में संविधान

हिमालिनी डेस्क
संविधान सभा के विघटन हुए ५ महीने हो गए लेकिन अभी भी दलों के बीच संविधान सभा पुनर्स्थापना या ताजा जनादेश में जाने को लेकर कोई भी सहमति नहीं बन पाई है। दलों के बीच बैठकों का दौर जारी है। बैठक के बाद टीवी कैमरों के सामने कोई भी नेता अपने को संविधान का सबसे बडा हिमायती बनने की कोशिश में पीछे नहीं रहना चाहते हैं। लेकिन बैठक के भीतर का जो दृश्य होता है, उसका अगर सीधा प्रसारण दिखाया जाए तो इस देश की जनता को सच्चाई मालूम चल जाएगी कि किस तरह से हमारे नेता सत्ता के लिए उद्वेलित होते रहते हैं।
संविधान बनाने से अधिक यहां के दलों को प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीो लेकर मोह है। कोई भी दल सत्ता को ही प्राथमिकता में रख कर बात करते दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि बिना प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीे इनकी जान ही निकल जाएगी। या फिर प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीहीं मिली या प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीोडÞ दिया तो सीधे नरक में जगह मिलेगी। इसलिए संविधान बनाने से अधिक दलों के बीच होने वाली बैठकों में इसी बात पर जोडÞ दिया जाता है।
नेपाली कांग्रेस की इस में भूमिका काफी नकारात्मक दिख रही है। खुद लोकतंत्रवादी और सबसे पुरानी पार्टर्ीीेश का पहरेदार होने का दावा करने वाली नेपाली कांग्रेस को एक बार फिर से गलतफहमी हो गई है, जब तक वह सत्ता में नहीं आएगी तब तक इस देश के लोकतंत्र पर खतरा मंडराता ही रहेगा। इसलिए कांग्रेस के वे नेता जिनको या तो पिछले संविधान सभा चुनाव में हार का सामना करना पडÞा था या फिर जिनको पार्टर्ीीे महाधिवेशन में चुनाव में पराजित होना पडÞा था या फिर जिन्होंने हार के डर से चुनाव ही नहीं लडÞा था ऐसे ही नेताओं के र्इद गिर्द फंसे होने के कारण कांग्रेस की जगहंर्साई हो रही है और पार्टर्ीीे नेताओं की किरकिरी हो रही है।
कांग्रेस के भीतर भी संविधान सभा पुनर्स्थापना या चुनाव में जाने को लेकर अभी भी मतभेद बना हुआ है। हालांकि पार्टर्ीीी केन्द्रीय समिति ने आधिकारिक तौर पर चुनाव में जाने का ही फैसला कर लिया है लेकिन इस फैसले पर वो कब तक टिके रहेगी, इस बात की कोई भी गारण्टी नहीं है। क्योंकि पार्टर्ीीे दो बडेÞ नेता और खुद को पार्टर्ीीी तरफ से प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार होने का दम्भ भरने वाले शेर बहादुर देउवा और रामचन्द्र पौडेल ने ही चुनाव में जाने के निर्ण्र्ााका विरोध कर दिया तो पार्टर्ीीे ७५ से अधिक पर्ूव सभासदों ने भी इसका विरोध किया है।
खैर यह बात कांग्रेस के लिए प्राथमिकता का विषय है ही नहीं कि संविधान सभा चुनाव में जाना है या फिर संविधान सभा की पुनर्स्थापना करनी है। कांग्रेस के नेताओं का पहला और आखिरी एजेण्डा है, इस समय माओवादी से प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीो हथियाना। कांग्रेसी नेताओं का बेतुका तर्क है कि चूंकि उसको संविधान सभा चुनाव के बाद से सत्ता का नेतृत्व करने का मौका नहीं मिला है इसलिए एक बार प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीर उसका हक बनता है। अब कांग्रेस को यह कौन समझाए कि संविधान सभा में सत्ता के नेतृत्व पर जाने का दावा और भी २७ पार्टियां कर सकती हैं। अब सभी को मौका दिया जाए तो संविधान तो आने वाले २७ वषर्ाें में भी नहीं बनेगा। कांग्रेस का दूसरा तर्क है कि उसे चुनाव कराने का काफी अनुभव है इसलिए चुनावी सरकार का नेतृत्व उसे मिलना चाहिए। कांग्रेसी नेताओं को यह कौन समझाए कि चुनाव कराना पार्टर्ीीा काम नहीं बल्कि चुनाव आयोग का काम है इसलिए यह तर्क गले के नीचे नहीं उतरता। और चुनावी सरकार का नेतृत्व कोई भी पार्टर्ीीर सकती है। दूसरी बात जो कांग्रेस के नेता यह सोच रहे हैं कि चुनाव के दौरान सरकार का नेतृत्व लेकर चुनाव में बूथ कैपचरिंग या सरकारी अधिकारियों को प्रभाव में लिया जा सकता है। लेकिन इस बार यह मालूम होना चाहिए कि चुनाव में इलेक्ट्राँनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग होने वाला है। इसलिए किसी भी प्रकार की गडÞबडÞी नहीं हो सकती।
अब बात करते हैं माओवादी की, आखिर वह सत्ता क्यों नहीं छोडÞ रही है – वैसे उसकी कुछ शर्तें हैं। या तो संविधान सभा की पुनर्स्थापना कर संविधान जारी किया जाए या फिर किसी स्वतंत्र व्यक्ति के नेतृत्व में चुनावी सरकार का गठन हो तभी वह सत्ता का नेतृत्व दूसरे को सौंप सकती है। दूसरे दलों में फूट डÞालने में माहिर माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने इस बार भी कुछ ऐसी चाल चली है, जिससे कांग्रेस एमाले दोनों ही उस में फंसते नजर आ रहे हैं। माओवादी ने कांग्रेस के दो बडÞे नेताओं को अलग अलग मिलकर प्रधानमंत्री पद के लिए लाँलीपाँप दिखाया है। दोनों ही नेताओं को जानबूझ कर यह गलतफहमी हो गई है कि माओवादी उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। यही वजह है कि पार्टर्ीीारा चुनाव में जाने का निर्ण्र्ााकिए जाने के बावजूद देउवा और पौडेल ने पुनर्स्थापना में जाने के पक्ष में माओवादी के सुर में सुर मिलाया है। और पार्टर्ीीें ही इतना विवाद हो गया है कि उसे ना तो प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीमलने वाली है और ना ही संविधानसभा पुनर्स्थापना होने वाली है।
इसी तरह माओवादी ने एमाले के भी नेताओं में फूट डÞालने की कोशिश की है लेकिन एमाले के नेता बाहर से तो एक ही दिख रहे हैं लेकिन अन्दर की बात यह है कि एमाले में भी संविधान सभा पुनर्स्थापना या चुनाव को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हर्ुइ है। एमाले ने भी चुनाव में जाने को लेकर आधिकारिक निर्ण्र्ााकर लिया है लेकिन गाहे-बगाहे उसके नेता भी माओवादी के प्रभाव में आकर और एक बार फिर से प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीमलने की चाह में पुनर्स्थापना का राग अलापने लगते हैं। माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल और वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल दोनों को ही कांग्रेस का पीछा छोडÞकर खुद प्रधानमंत्री के लिए सबसे उपयुक्त होने का ख्वाब दिखा है।
यह बात तो तय है कि माओवादी एक सोची समझी और दूरगामी नीति के तहत काम करती है और इस बार वह किसी भी कीमत पर सत्ता का त्याग नहीं करने वाली है। ऊपर से उसने मधेशी मोर्चा का साथ ले लिया है और उन्हें इतने सारे मंत्रालय देकर इस तरह से कृतज्ञ कर दिया है चाहे कुछ हो जाए मधेशी मोर्चा सत्ता के मामले में माओवादी का साथ कभी नहीं छोडÞ सकती है। माओवादी ने आन्तरिक रूप से यह तय कर लिया है कि किसी भी हालत में सत्ता नहीं छोडना है। और यदि मजबूरी में छोडÞना ही पडेÞ तो कांग्रेस एमाले के किसी भी नेता को सत्ता का नेतृत्व नहीं देना है। अगर सत्ता का नेतृत्व देना ही पडÞे तो कांग्रेस एमाले के बजाए वह मधेशी मोर्चा के किसी नेता को या फिर अपने पक्षधर रहे किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को सत्ता का नेतृत्व देकर चुनाव कराना चाहती है।
माओवादी भी अभी पुनर्स्थापना के पक्ष में नहीं है और ना ही वह फिलहाल देश में चुनाव ही कराना चाहती है। उसे आम जनता की नब्ज अच्छी तरह से पता है कि देश की आम जनता को क्या चाहिए। इसलिए चुनाव के बदले वह सडÞक विस्तार से लेकर देश के विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है। जरुरी चीजों की कीमतें कम करने से लेकर लोगों को सस्ते दामों पर रसोई गैस उपलब्ध कराने, लोडसेडिङ के समय में कटौती करने जैसी चीजों पर उसका ध्यान केन्द्रित है। साथ ही देश में विदेशी निवेश हो इसलिए भारत और चीन दोनों से ही अपने संबंधों में सुधार कर रही है। क्योंकि उसे मालूम है कि संविधान सभा पुनर्स्थापना और संविधान इस समय आम जनता के एजेण्डे में है ही नहीं। उसे तो शान्ति और सुरक्षा चाहिए।
देश में वाईसीएल और पर्ूव लडाकुओं का आतंक नहीं है। क्योंकि उनके आका ही सत्ता में बैठे हैं। सशस्त्र समूहों का दबदबा ही खत्म हो गया है क्योंकि उनके जन्मदाता ही सत्ता पर काबिज हैं। इसलिए अपेक्षाकृत आम जनता सुकून की सांस ले रही है और इसी का फायदा उठाते हुए माओवादी जितना हो सके चुनाव को टालना चाहती है। वह जनता के सामने अच्छे शासन का उदाहरण प्रस्तुत कर अगले चुनाव में सिर्फअपनी जीत ही नहीं बल्कि दो तिहाई जीत सुनिश्चित कर लेना चाहती है। जब तक दो तिहाई जीत की सुनिश्चितता नहीं बन जाती कभी चुनाव और कभी पुनर्स्थापन को लेकर वह दलों के बीच दरार पैदा करने का काम करती रहेगी। और प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीा लाँलीपाँप दिखा कर सभी दलों को ठगती रहेगी।

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