सत्ता के लिए बना समीकरण

लीलानाथ गौतम:नेकपा एमाले के भीतर शर्ीष्ा नेताओं के बीच फिलहाल एक गजब का समीकरण निर्माण हुआ है । जिस की सकारात्मक व्याख्या की जाए तो कह सकते हैं- पार्टर्ीीे भीतर लोकतान्त्रिक अभ्यास और नेतृत्व हस्तान्तरण की प्रक्रिया चल रही है । अगर नकारात्मक रूप में लिया जाए तो ‘द्वैध सत्ता संर्घष्ा’ का बीजारोपण और गुटगत राजनीति का चरमोत्कर्षमान सकते हैं । लेकिन यह बात तो तय है कि एमाले में निर्मित नयाँ समीकरण पार्टर्ीीी भावी कार्यदिशा को प्रभावित कर सकता है । बात यह भी है कि पार्टर्ीीतिहास में सबसे ज्यादा समय पार्टर्ीीो नेतृत्व प्रदान करने वाले माधवकुमार नेपाल और झलनाथ खनाल इस समय पार्टर्ीीे अन्दर ही कमजोर होते जा रहे हैं । और इसका परिणाम आगामी पार्टर्ीीहाधिवेशन में देखने को मिलेगा । amale
स्मरणीय है- माधवकुमार नेपाल ने १५ वर्षऔर झलनाथ खनाल ने तकरीबन १३ वर्षपार्टर्ीीो नेतृत्व प्रदान किया है । ये दोनों नेता ऐसे हैं, जिन्हों ने सत्ता राजनीति के लिए महत्वपर्ूण्ा माने जाने वाले देश के कार्यकारी प्रमुख अर्थात् प्रधानमन्त्री पद की जिम्मेवारी भी वहन की है । पार्टर्ीीे भीतर अभी तक शक्तिशाली कहलाने वाले ये दो हस्ती को पहली बार जुनियर नेता केपी ओली और बामदेव गौतम के द्वारा पराजित होना पडÞा है । गत माघ २१ गते संसदीय दल के नेता चयन के लिए हुए निर्वाचन में माधव नेपाल और झलनाथ खनाल गठबन्धन को पराजित करते हुए केपी ओली निर्वाचित हुए हैं । इस घटना को ओली की जीत से ज्यादा माधव नेपाल और झलनाथ खनाल की हार के रूप में देखा जा रहा है । इतना ही नहीं, मन्त्रिपरिषद् में माधव नेपाल पक्षधर एक भी व्यक्ति नहीं रहने के कारण, नेता नेपाल के भविष्य को लेकर एमाले में चिन्ता जताने वालांे की संख्या भी बढÞ रही है । दूसरी बात आसन्न एमाले के नवें महाधिवेशन से जोडÞ कर भी इस घटना को देखा जा रहा है ।
पार्टर्ीीेतृत्व दूसरी पीढÞी में हस्तान्तरण करने की मांग एमाले के भीतर व्यापक बहस का विषय है । पिछली बार निर्मित नये समीकरण में यदि कोई आर्श्चर्यजनक परिवर्तन नहीं हुआ तो आगामी महाधिवेशन के बाद नेतृत्व हस्तान्तरण की अपेक्षा तो पूरी होगी, लेकिन दूसरे पीढÞी में नहीं । उन्ही पुराने खिलाडियों के बीच ही पार्टर्ीीेतृत्व हस्तान्तरण होने की सम्भावना ज्यादा है । अर्थात् पार्टर्ीीे भीतर विगत लम्बे समय से अपनी पकडÞ बनाए हुए प्रमुख तीन नेता माधवकुमार नेपाल, झलनाथ खनाल और केपी ओली के बीच ही नेतृत्व के लिए सौदेबाजी हो सकती है । उस समय तक अभी हाल बने समीकरण का क्या होगा – इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता ।
ढÞाइ दशक के संसदीय अभ्यास को देखा जाए तो एमाले में पार्टर्ीी्रमुख ही संसदीय दल के नेता बनने की परम्परा है । लेकिन इस बार ओली में पार्टर्ीीध्यक्ष तथा प्रधानमन्त्री बनने की महत्वकांक्षा इतनी शक्तिशाली होने लगी और पार्टर्ीीे भीतर भी ऐसा माहोल निर्माण बना, जिसके कारण उक्त परम्परा भंग हो गई । सिर्फपरम्परा ही नहीं टूटी है, भावी महाधिवेशन को सम्बोधन करते हुए नेता ओली और गौतम के बीच कुछ सम्झौते भी हो चुके है । इसके लिए लम्बे समय पार्टर्ीीेतृत्व में रहे माधवकुमार नेपाल में पुनः पार्टर्ीीध्यक्ष बनने का सपना उभर कर आना भी जिम्मेबार है । जिसके कारण पुराने नेतृत्व के प्रति असन्तुष्ट नेता लोगों ने ओली का साथ दिया है । मुख्यतः सत्ता और पार्टर्ीीेतृत्व के लिए की गई यह गुटबन्दी पार्टर्ीीो सही दिशा की ओर नहीं ले जाएगी, ऐसा भी बहुतों का कहना है । कुछ लोगों का मानना है कि इस समीकरण द्वारा पार्टर्ीीे भीतर आन्तरिक शक्ति सन्तुलन का व्यवस्थापन होगा । लेकिन बहुतों का कहना है- पार्टर्ीीें गलत अभ्यास शुरू हुआ है, इससे ‘द्वैध सत्ता’ की स्थापना होगी ।
गत महाधिवेशन में अध्यक्ष खनाल को साथ दिने वाले महत्वपर्ूण्ा हस्ती अभी उनके विरोधी समूह में हैं । आठवें महाधिवेशन में खनाल को अध्यक्ष पद दिलाने के लिए महत्वपर्ूण्ा भूमिका निर्वाह करने वाले उपाध्यक्ष वामदेव और महासचिवर् इश्वर पोखरेल अभी ओली खेमा में सामिल होने के कारण खनाल कमजोर बने हैं । खनाल के साथ दूसरे प्रभावशाली नेता माधव नेपाल तो हैं, लेकिन पार्टर्ीीेतृत्व में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए यह काफी नहीं है । जितनी भी गुटबन्दी क्यूं न हो, पार्टर्ीीें जो अध्यक्ष है, वही संसदीय दल के नेता रहने का प्रचलन एमाले में था । इसको स्वाभाविक भी माना जाता है । लेकिन, इस बार जिस तरह संसदीय दल के नेता और पार्टर्ीीध्यक्ष अलग-अलग व्यक्ति हो रहे हैं, जिसके चलते स्वाभाविक रूप में ‘द्वैध सत्ता’ का अभ्यास से इन्कार नहीं किया जा सकता । इतना होते हुए भी अभी हाल तक एमाले की केन्द्रीय कमिटी में खनाल-नेपाल समूह ही बहुमत में है । इस तरह केन्द्रीय कमिटी में खनाल-नेपाल समूह और संसदीय दल में ओली-गौतम समूह का बहुमत रहने से भी ‘द्वैध सत्ता’ की आशंका कुछ ज्यादा ही है । यह बात विगत में भी देखने में आई थी ।
विगत में पार्टर्ीीौर संसदीय दल के प्रमुख तो एक ही व्यक्ति थे, लेकिन केन्द्रिय कमिटी में दूसरे समूह का बहुमत था । उस समय केन्द्रीय कमिटी के द्वारा किया गया निर्ण्र्ााकार्यान्वयन नहीं हो पाया था । उदाहरण के लिए इससे पहले की संविधानसभा और संसदीय दल में खनाल-गौतम समूह बहुमत में था तो केन्द्रीय कमिटी में नेपाल-ओली समूह । उस समय केन्द्रीय कमिटी द्वारा पार्टर्ीीचिव विष्णु पौडेल को संविधानसभा और संसदीय दल के उपनेता बनाने का निर्ण्र्ााकिया गया, लेकिन पार्टर्ीीध्यक्ष खनाल ने उक्त निर्ण्र्ााको दो वर्षतक कार्यान्वयन नहीं किया । इसी बीच संविधानसभा भंग हो गया । स्वाभाविक है, वैसा ही द्वन्द्व इस बार हो सकता है । इसका संकेत भी मिल चुका है । वह यह है कि ओली-गौतम गठबन्धन आगामी जेष्ठ २ गते के लिए प्रस्तावित महाधिवेशन निर्धारित समय में ही करना चाहता है और इसके लिए पार्टर्ीीें दबाव भी बनाए हुए है । लेकिन पार्टर्ीीनयमानुसार प्रस्तावित महाधिवेशन मिति को केन्द्रिय कमिटी द्वारा अनुमोदन करना पडÞता है, जिसमें खनाल-नेपाल समूह का बहुमत होने के कारण वह नहीं हो पा रहा है ।
खैर, शुरु में संसदीय दल के नेता में अध्यक्ष खनाल और नेता ओली, भावी अध्यक्ष में वरिष्ठ नेता नेपाल और नेता ओली प्रमुख दावेदार के रूप में आगे आए थे । विवाद-व्यवस्थापन के लिए प्रमुख नेताओं के बीच छलफल भी हुआ । संसदीय दल के नेता से लेकर पार्टर्ीीे भावी अध्यक्ष और अन्य पदों में मुख्य चार नेताओं का व्यवस्थापन करने के लिए लम्बी बहस हर्ुइ । लेकिन सहमति के लिए कोई भी दावेदार एक-दूसरे के लिए पद त्याग करने के लिए तैयार नहीं होने के कारण अन्त में नया समीकण निर्माण होने लगा । और नेतृत्व हस्तान्तरण की मांग करने वाले नवनिर्वाचित सभासदों ने ओली-गौतम का साथ दिया, परिणामस्वरुप ओली संंसदीय दल के नेता के रूप में निर्वाचित होने में सफल हुए । यही गठबन्धन कायम रहा तो सम्भव है- भावी पार्टर्ीीध्यक्ष भी ओली ही हो सकते है । ओली-गौतम गठबन्धन की सहमति के अनुसार प्रस्तावित महाधिवेशन में नेता ओली अध्यक्ष पद के लिए उम्मेदवार बनेंगे । अध्यक्ष बनने के बाद ओली संसदीय दल के नेता में गौतम का र्समर्थन करेंगे । और महाधिवेशन द्वारा ही गौतम को वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद भी दिलाया जाएगा । अगर ओली पार्टर्ीीध्यक्ष रहते समय कोई भी कार्यकारी पद का नेतृत्व प्राप्त हो जाएगा तो कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेवारी नेता गौतम को दी जाएगी ।
ओली, गठबन्धन में उपाध्यक्ष गौतम, दूसरे उपाध्यक्ष विद्या भण्डारी, महासचिवर् इश्वर पोखरेल, सचिव विष्णु पौडेल, पोलिटब्युरो सदस्य मुकुन्द न्यौपाने, नेतागण बलराम बाँंस्कोटा, हरि पराजुली, रवीन्द्र अधिकारी, निर्मल सुवेदी, युवा नेता महेश बस्नेत आदि प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं । जिस में दरार पैदा न होने तक एमाले में ओली गठबन्धन का वर्चस्व रहेगा, ऐसा विश्वास है ।
कुछ वर्षों के लिए इस तरह की योजना बना कर ओली-गौतम के बीच सहमति होने के कारण इधर खनाल-नेपाल समूह क्रुद्ध भी है । माधव नेपाल द्वारा कहे जाने पर ही अध्यक्ष खनाल संसदीय दल के नेता में उम्मेदवार बने थे । आखिरी घडÞी तक खनाल तो चाहते थे कि र्सवसम्मत रूप में ही ओली को संसदीय दल का नेता बनाया जाए । लेकिन नेता नेपाल ने ही ऐसा नहीं होने दिया । जिसके चलते खनाल को संसदीय दल के नेता में उम्मेदवार बन कर पराजित होना पडÞा । इससे सब से ज्यादा गहरी चोट खनाल को नहीं, नेता नेपाल को पहुँची है ।
शेष २२ पेज में
इसीलिए तो कुछ लोग कहते हैं- एमाले में सब से कमजोर पात्र कोई है तो वह माधव नेपाल ही है । लेकिन राजनीति के चतुर खिलाडी नेपाल जितना कहा गया है, उतने कमजोर भी नहीं हंै । जैसे हो, ओली-गौतम गठबन्धन को तोडÞ कर भावी पार्टर्ीीेतृत्व हथियाने के प्रयास में नेता नेपाल अभी भी सक्रिय हैं ।

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