सत्ता टिकाने के लिये सत्ताधारीयों ने मधेशियों से २२ व ८ बुँदे समझौता किया था : श्वेता दीप्ति

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श्वेता दीप्ति, काठमांडू,१६ नवम्बर | किसी भी लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है । जनता है तो नेता हैं क्योंकि, उनका चुनाव जनता करती है और उसे अपना प्रतिनिधि चुनती है । जनता को पूरा हक है कि वो सरकार से किसी भी मामले में स्पष्टीकरण माँग सकती है, खास कर के वो मामला जो देश हित में या जन हित में न हो । सूचना का हक और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता लोकतंत्र की सबसे बडी खूबी होती है । यों तो विश्व का हर राष्ट्र किसी ना किसी समस्या से जूझ रहा है किन्तु नवलोकतंत्र निर्मित नेपाल की बात करें तो नेपाल  आन्दोलन, आपसी सहमति और समझौतों का देश बन गया है । जहाँ रोज सहमतियाँ होती हैं और रोज ही उस सहमति से नेतागण या सत्ता पक्ष मुकर भी जाते हैं । फिर भी जनता एक उम्मीद पर जीती है कि कभी जनता के इन प्रतिनिधियों को इनकी याद आएगी । परन्तु अफसोस कि ऐसा हो नहीं पाता । जनता की आवाज है दब कर रह जाती है । फिर भी एक जागरुक नागरिक देश में हो रही हर घटनाओं पर अपनी निगाहें रखता है  ।
वर्तमान नेपाल की राजनीति राजनैतिक पार्टियों की आपसी सहमति से हो रही है। नेताओं की आपसी समझदारी सत्ता के लिए आवश्यक है, क्योंकि उन्हें बारी बारी से सत्ता सुख प्राप्त करना है । न यहाँ जन भावना की कद्र है और न ही नियम, कानून, सिद्धान्त की। सत्ता के लिए अपने विचार, वक्तव्य और सिद्धान्त से पलटना आम बात हो गई है। मौखिक बातों का तो कहना ही क्या अगर शासन सत्ता लिखित समझौता भी किसी व्यक्ति संगठन या पार्टी से करती है तो उसे पूरा करना अपना दायित्व नही समझती। नेता, और राजनैतिक पार्टी पर से आम जनमानस का विश्वास दिन ब दिन उठता जा रहा है। नेताओं ने एक सूत्र बना लिया, राजनीति में कोई स्थाई शत्रु या मित्र नही होता । यह बात बहुत हद तक ठीक भी मानी जा सकती है लेकिन राजनीतिज्ञ और अवसरवादी धूर्त में फर्क समझना भी आवश्यक है। सिर्फ सत्ता और स्वार्थ के लिए सैद्धान्तिक और वैचारिक रूप से ठीक विपरीत रहे पार्टी से गठवन्धन बना कर जो नेता सरकार में जाने के लिए एकता बद्ध होते हैं उन्हें राजनीतिज्ञ नही अवसरवादी कहा जाना चाहिये। राजनीति में उस क्षण को अत्यन्त दुःखद मानना चाहिये जब सत्ता पर गए पार्टी भी सिर्फ अपनी सत्ता टिकाने के लिए देश को बदनाम करने से भी पीछे नही हटते। सत्ताधारी पार्टी प्रमुख  यह नही समझती कि वह सत्ता पर रह कर सिर्फ अपनी पार्टी का नहीं वरन् देश का प्रतिनिधित्व कर रहे है और यही कारण होता है कि  कभी कभी ऐसे ऐसे समझौते कर बैठते हैं जो देश के हित विपरीत भी हो जाता है।
इसी तरह के सत्ता लोलुप मानसिकता से ग्रसित हो कर नेपाल के सत्ताधारी पार्टी ने तरह तरह के समझौते किये। कभी सत्ता टिकाने के लिये तो कभी विरोधी को शांत करने के लिए जो भी समझौते किये गए उसमे से सत्ता ने अधिकतर को पूरा नही किया। इसी तरह का एक समझौता जो मधेसियों के साथ किया गया वह है ०६२,०६३ के आंदोलन क्रम में हुए २२ बुँदे और ८ बुँदे समझौता। ज्यो ज्यों समय बीतता गया राज्य उस सम्झौते को औचित्यहीन बताता गया और आज उसका मूल्य सरकार की नजर में एक रद्दी के टुकड़े से ज्यादा नहीं है। एक ऐसा सम्झौता जिस के आधार पर महान् परिवर्तन सम्भव हुआ, देश में गणतंत्र आया, कई सपूतों ने अपना खून दिया उस सम्झौता का आज कोई मोल नहीं है। इसका एक ही कारण है, नेपाल सरकार द्वारा की गई सम्झौतों को पालन करने और कराने के लिए वाध्यात्मक कानून का नही होना। सरकार समय समय पर राजनैतिक दलों और संगठनो के साथ सम्झौता तो करती है परन्तु अगर उस सम्झौते के अनुसार कार्य नहीं करती तो उसके लिए कानून में प्रश्न उठाने के लिए कहीं कोई जगह नही है। यह वास्तव् में दुःखद बात है कि अगर दो व्यक्ति आपस में कोई लिखित सम्झौता करे और उसे पूरा न करे तो उसके लिए क़ानूनी प्रावधान है परन्तु राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार अगर कोई प्रतिबद्धता करती है तो इसे पूरा करने का कोई वाध्यात्मक कानून नही है। इसी से सत्ताधारी पार्टियाँ अपने विरोधी पार्टी को शान्त करने के लिए बेपरवाही से तरह तरह के सम्झौते तो कर लेते हैं लेकिन उसे पूरा नहीं करते, जिससे जनता की नजरों में शासन व्यवस्था पर अविश्वास का वातावरण बनता है। राज्यके द्वारा पालन नही किये जाने में सब से महत्वपुर्ण सम्झौता २२ और ८ बुँदे है। एक दशक बीतने पर भी वह सम्झौता कार्यान्वयन नही हुआ। जब उसको राज्य के द्वारा पूरा करवाने के लिए कानून का सहारा लिया गया और नेपाल के सर्वोच्च अदालत में रिट पेटिशन दिया गया तो सर्वोच्च अदालत ने राजनैतिक पार्टियों के बीच हुए सम्झौता की क़ानूनी मान्यता नही होने के कारण मुकदमा दायर नहीं किया जा सकताू कहते हुए मुकदमा दायर ही नही किया। अगर २२ बुँदे समझौता की बात करें तो अदालत को सब से पहले यह समझना चाहिए था की वह सम्झौता राज्य के द्वारा किया गया था न की किसी राजनैतिक दल के द्वारा।
चूँकि नेपाल सरकार कोई राजनैतिक दल नही है इस आधार पर नेपाल सरकार से सर्वोच्च अदालत जवाब तलब कर सकता था परन्तु दुर्भाग्य वश अदालत ने वैसा नहीं किया । जब सर्वोच्च अदालत ने ही उस सम्झौता पर प्रश्न उठाने से इंकार कर दिया तो अब राज्य के द्वारा किया गया कोई भी समझौता राज्य के द्वारा पूरा किया जाएगा इस पर जनता कैसे विश्वस्त हो ? अगर राज्य का यही रवैया रहा तो इसके द्वारा किए गए किसी भी तरह के सम्झौतों पर विश्वास करना असम्भव हो जाएगा। इसको सुधारने के लिए कोई कानून अवश्य बनना चाहिये कि सत्ता में पार्टी भले ही कोई हो, अगर वह औचित्य पूर्ण सम्झौता करता है तो उसे पूरा करने के लिए राज्य बाध्य हो। नहीं तो अब राज्य के किसी भी समझौतों पर पूर्ण विश्वास करना नामुमकिन है। जिस समझौतों को कानून ही मान्यता नहीं देता तो ऐसे समझौतों को करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । पर यह हमारे देश की व्यवस्था है कि नेता कक्ष के भीतर सहमति करते हैं और बाहर आकर भूल जाते हैं । फिलहाल तो संविधान संशोधन अधर में लटका हुआ है । संविधान संशोधन की सहमति पर ही वर्तमान सरकार बनी थी किन्तु फिलहाल इस सहमति का कोई आधार या कोई सम्भावित परिणाम नजर नहीं आ रहा है । मधेशी मोर्चा ने १५ दिनों का वक्त दिया है । क्या कोई करिश्मा हो सकता है ? शायद हो भी जाय ठीक उसी तरह जिस तरह भूकम्प के पश्चात् वर्षों से अधर में लटके संविधान का मसौदा कुछ दिनों के भीतर आ गया था और फास्ट ट्रैक से संविधान का निर्माण भी हो गया था । वैसे किसी कश्मिा के आसार तो नहीं दिख रहे हैं फिर भी अलादिन के चिराग और जिन का इंतजार है ।

 

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