सत्ता परिवत्र्तन की बहस

लिलानाथ गौतम :छः महीने से कुछ ज्यादा हो रहे हैं, प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल को । इस अवधि में उन्होंने क्या किया ? उल्लेख करने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई देता । लेकिन पूरे छः महीने से ओली सञ्चार माध्यमों के लिए ‘हाटकेक’ बने रहे । हवा से बिजली निकाल कर एक साल के अन्दर देश को लोडसेडिङ मुक्त बनाने से लेकर रसोई गैस की पाइप घर–घर तक पहुँचाने की हवादारी बात उन्होंने की । इसी तरह दो साल के अन्दर काठमाण्डू में ‘मेट्रो रेल’ स्थापना करने की भाषणबाजी से भी प्रधानमन्त्री ओली सुर्खियों में रहे । तराई आन्दोलन के कारण शुरु नाकाबन्दी, भारत और चीन यात्रा सम्बन्धी प्रसंग में भी ओली की चर्चा–परिचर्चा कम नहीं रही । लेकिन भूकम्प पीडितों की पुनस्र्थापना और पाँच महीने से जारी तराई आन्दोलन को उन्होंने समय में सम्बोधन नहीं किया । परिणामस्वरूप आषाढ़–श्रावण के बरसात में भूकम्प पीड़ित का जीवन कष्टकर होने जा रहा है ।

दूसरी तरफ मधेशवादी–जनजाति सम्मिलित संघीय गठबन्धन, आन्दोलन का उद्घोष कर रहे हंै । नाकाबन्दी के बहाने स्थापित और सरकार द्वारा ही अघोषित रूप में संरक्षित कालाबजारी के धन्दे को अभी तक जनता झेल रही है । ओली की इन्हीं उपलब्धियों को विश्लेषण करते हुए कुछ लोग सरकार परिवर्तन की बहस भी कर रहे हैं । अब प्रश्न उठता है– क्या अभी ओली नेतृत्व की वर्तमान सरकार का परिवर्तन सम्भव है ? इसमें तर्क और स्वार्थ सभी का अपना–अपना है । अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए तो ओली के अलावा, कोई भी राजनीतिक दल एक दिन के लिए भी इस सरकार को झेलना नहीं चाहते हैं । यहाँ तक कि नेकपा एमाले के भीतर से ही ओली का विकल्प स्वीकार किया जाएगा । कुछ समय पहले वरिष्ठ नेता माधवकुमार नेपाल और वामदेव गौतम ने ओली के ऊपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाया था ।

नेपाल और गौतम ने ओली के ऊपर गुटबन्दीपूर्ण राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा था– ‘सरकार असफल सिद्ध हो रही है, इसीतरह से सरकार चलेगी तो इसका विकल्प खोजना चाहिए ।’ लेकिन ओली जितना भी असफल और आलोचित क्यों न हो, ‘अभी सरकार गिरनेवाला नहीं है’ यह कह कर तर्क करनेवाले भी कम नहीं है ।

इसके पीछे आखिर क्या कारण है ?

पहला कारण– भूकम्प पीडित जनता और राजनीतिक वृत्त में ओली सरकार जितना भी आलोचित क्यों न हो, लेकिन जनमानस का एक ऐसा समूह है, जिनकी नजरों में ओली ‘राष्ट्रीयता’ के महानायक हैं । तराई आन्दोलन और नाकाबन्दी के कारण उनको अभी ‘राष्ट्रवादी’ नेता का परिचय मिला है । प्रायः सभी स्वीकार करते हैं कि जनहित के लिए ओली सरकार ने कुछ भी नहीं किया है । लेकिन असन्तुष्ट वही लोग फिर कहते हैं– ‘ओली भारत के सामने नहीं डरते हैं और हमारी राष्ट्रीयता का संरक्षण करते हैं ।’ इस तरह ‘ओली ब्राण्ड की राष्ट्रीयता’ के प्रति गर्व करनेवालों की संख्या कुछ ज्यादा ही हो सकती है । लेकिन तराई के मूलवासी मधेशियों की असन्तुष्टि और उसके कारण भविष्य में होनेवाला सम्भावित परिणाम के प्रति ओली चिन्तित नहीं है । क्यों नहीं है ? संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के सह–अध्यक्ष राजेन्द्र श्रेष्ठ का विश्वास करें तो परम्परागत संसदीय राजनीति के माध्यम से प्राप्त होनेवाले सुख–सुविधा को त्यागने के लिए ओली तैयार नहीं है । इसीलिए वह असन्तुष्ट पक्षों की आवाज नहीं सुन रहे हैं । मधेशवादी और जनजाति द्वारा सञ्चालित आन्दोलन का प्रभाव और औचित्य नहीं है, क्या ओली ऐसा तो नहीं सोच रहे हैं ? हिमालिनी से द्वारा किए गए इस प्रश्न के जवाब में श्रेष्ठ कहते हैं– ‘अगर ऐसा है तो यह ओली की सबसे बड़ी भूल है ।’ ‘हमारा आन्दोलन औचित्यहीन और प्रभावहीन नहीं हुआ है’, ये दावा करते हुए श्रेष्ठ आगे कहते हैं– ‘प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था के लिए ओली अभिशाप हंै, वह जातीय और नश्लीय चिन्तन लेकर सत्ता सञ्चालन करते हैं । और उनकी सत्ता गठबन्धन में संघीयता विरोधी चित्रबहादुर केसी से लेकर राजतन्त्र वापस के लिए वकालत करनेवाले कमल थापा तक हैं । ओली स्वयम् पञ्चायती राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं और वही मानसिकता के अनुसार सत्ता सञ्चालन कर रहे हैं, यह राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है ।’

सद्भावना पार्टी के महासचिव मनीष सुमन का कहना भी लगभग ऐसा ही है । मनीष कहते हैं, ‘हम लोग असली राष्ट्रवादी हैं । ओली और उन के समर्थक राष्ट्रवादी नहीं हो सकते । ओली ब्राण्ड तो नश्लीय चिन्तन ढो कर चलने वाले समूह हैं । क्योंकि वर्षों से नेपाल में ही रहकर पसीना बहानेवाले मधेशी, जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग÷समुदाय ओली के लिए अन्तर्राष्ट्रीय तत्व हैं । अपने साथ चेहरा मिलनेवाले, गोत्र मिलनेवाले और भाषा मिलनेवाले ही उनके लिए राष्ट्रवादी हो सकते हैं ।

बाँकी अन्य सब को ‘नेपाली’ कहने में ओली को शर्म आती है । उनकी यही मानसिकता नेपाल को अन्तहीन द्वन्द्व में तो नहीं ले जाएगा ? इसकी हमें चिन्ता है । इसीलिए ओली निरंकुश शासक हैं, जो शान्तिपूर्ण आन्दोलन में रहे जनता को गोली से भूनते हैं ।’ जो कुछ हो, भारत और तराईबासी नेपाली को गाली देना ही ‘राष्ट्रवादी’ होना है, ऐसी मानसिकतावाले जमात भी कम नहीं है यहाँ । इस तरह के व्यक्तियों का साथ और समर्थन ओली को ही प्राप्त है । यह बात स्वीकार करते हैं, मनीष । लेकिन वह दावी करते हैं– ‘मधेशी और जनजाति के आन्दोलन के कारण ‘ओली ब्राण्ड का राष्ट्रवाद’ कमजोर होता जा रहा है ।’ कमजोर हो या नहीं, जिस तरह से ‘राष्ट्रवादी’ नारा आगे आ रहा है, उसको समर्थन करनेवाले बहुत हैं काठमाण्डू में । इस स्थिति में ओली सरकार विरुद्ध काठमाण्डू आन्दोलित नहीं हो सकता, इस विश्वास में प्रधानमन्त्री ओली हो सकते हैं । जब तक काठमाण्डू आन्दोलित नहीं होगा, तब तक जनता की आन्दोलन से सरकार परिवर्तन होने वाला नहीं है । शायद इसमें ओली निश्चित हैं और अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं ।

दूसरा कारण – ओली–सत्ता गठबन्धन में ऐसे राजनीतिक दलों की बाहुल्यता है, जो नेपाल के परिवर्तन और विकास के लिए सबसे बाधक भारत को मानते हैं । संसदीय गणित में अभी वे लोग बहुमत में हैं । जब तक संसद में बहुमत रहेगा, तब तक कोई भी सरकार गिरा नही पाएंगे । सही हो या गलत, ‘राष्ट्रवादी’ नारा की आवाज बुलन्द हो रहे वर्तमान अवस्था, ओली सरकार के लिए ‘स्वर्णयुग’ तो सिद्ध नहीं कर रहा है ? संघीय समाजवादी के सह–अध्यक्ष श्रेष्ठ के अनुसार कोई व्यक्ति इस तरह से भी सोच सकता है । लेकिन श्रेष्ठ आगे कहते हैं, ‘यह तो क्षणिक काल के लिए हैं ।’ उनके अनुसार जनता की आवाज को दवा कर कुछ समय तो शासन किया जा सकता है लेकिन दीर्घकाल के लिए नहीं । तो भी वर्तमान सरकार उस समय तक जीवित रह सकता है, जब तक ओली गठबन्धन में दरार पैदा न हो । आज की तिथि तक इस गठबन्धन में कोई भी ऐसा दरार नहीं देखा जा रहा है । ओली सरकार को असफल सिद्ध करके अपने पक्ष में बहुमत सिद्ध करने का हिम्मत अभी किसी के पास नहीं है । ओली सरकार के सबसे ज्यादा आलोचक मधेशवादी–जनजाति का गठबन्धन है । यह गठबन्धन ओली को किसी भी तरह से सत्ता में नहीं देखना चाहते हैं । लेकिन क्या करे ? उनके पास वह ताकत नहीं है, जिसकी सहायता से ओली को हटा सके । इसीलिए सद्भावना पार्टी के महासचिव मनीष कहते हैं ‘संसदीय राजनीति में हमारे अंकगणित के द्वारा सरकार बनाना और गिराना सम्भव नहीं है । लेकिन सम्पूर्ण रूप में असफल सिद्ध और नश्लीय चिन्तन को बढ़ावा देने वाली इस सरकार को गिराने के लिए जो प्रयास करेगा, उस के प्रति हमारा साथ और समर्थन रहेगा । वह नेपाली कांग्रेस हो या अन्य कोई ।’ तीसरा कारण – प्रमुख प्रतिपक्ष नेपाली कांग्रेस की निष्क्रिय भूमिका भी ओली सरकार को मजबूत कर रहा है, ऐसा कहनेवाले भी कम नहीं है । संसद के सब से बड़े दल नेपाली कांग्रेस में पार्टी सभापति के रूप में जब शेरबहादुर देउवा आए हैं, बहुतों का मानना था कि अब देउवा अपनी नेतृत्व में सरकार बनाने का पहल करेंगे । लेकिन अभी तक वह ऐसा माहौल नहीं बना पा रहे हैं । कुछ कांग्रेसी नेता शेरबहादुर देउवा के नेतृत्व में नयी सरकार बनने की दावा तो कर रहे हैं लेकिन स्वयं देउवा इसके प्रति इतनी उत्सुकता नहीं दिखा रहे हैं । इसी तरह बहुताें का कहना है कि प्रतिपक्ष की प्रभावकारी भूमिका निर्वाह करने में नेपाली कांग्रेस सक्षम नहीं हो रहा है । लेकिन कांग्रेस केन्द्रीय सदस्य धनराज गुरुङ इस बात को अस्वीकार करते हैं । गुरुङ के अनुसार अभी देश में जो माहौल है, ऐसी अवस्था में सरकार परिवर्तन का बहस निरर्थक है । नेता गुरुङ का मानना है कि सरकार की नालायकीपन के कारण ही परिवर्तन की बहस जबरदस्त उठ रही है ।

हिमालिनी से बातचीत करते हुए गुरुङ कहते हैं– ‘भूकम्प पीडितों के लिए राहत वितरण, पुनस्र्थापना और पुनर्निर्माण, कुछ भी काम समय में नहीं हो सका । बातें बड़ी–बड़ी हुई, लेकिन काम नहीं । काला बाजारियों का धन्दा अभी भी फलफूल रहा है । इसीलिए सरकार सम्पूर्ण रूप में असफल सिद्ध हो गयी है ।’ नेता गुरुङ आगे कहते हैं– ‘नेपाली कांग्रेस प्रतिपक्षी में है, हमारी जिम्मेदारी इस तरह की विषयों में सरकार को सचेत कराना है, सही रास्ता दिखाना है । वह तो हम लोग कर रहे हैं । लेकिन ओली सरकार सुनती ही नहीं । अगर ऐसी अवस्था जारी ही रहेगी तो जनता ही सरकार के विकल्प में उतर आएंगी ।’ यहाँ एक और बात को स्मरण करना होगा– नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा जब पत्नी आरजू देउवा के उपचार के बहाने दिल्ली की ओर चले थे, काठमांडू के कुछ बुजुर्गों ने ऊँचा स्वर किया– जब देउवा दिल्ली से लौट आएंगे, तब ओली सरकार की उल्टी गिनती शुरु हो जाएगी ।

ऐसी बात करनेवालों का एक ही तर्क रहता है– दिल्ली को ओली सरकार पसन्द नहीं हैं, इसीलिए वर्तमान सरकार गिराने के लिए दिल्ली ही कुछ कर सकता है । लेकिन जबदेउवा दिल्ली से त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल में पहुँचे, तो उन्होंने कहा– ‘वर्तमान सरकार बहुमत में हैं, हम कैसे गिरा सकते हैं ?’ अब ओली ब्राण्ड के ‘राष्ट्रवादी’ व्यक्ति कह सकते हैं– ‘दिल्ली भी ओली सरकार को कुछ नहीं कर सका ।’ क्या अवस्था ऐसी ही है ? कांग्रेस केन्द्रीय सदस्य गुरुङ कहते हैं, ‘नेपाल की सरकार परिवर्तन के लिए दिल्ली क्या कहेगा, यह तो कोई प्रश्न ही नहीं है । असफल सरकार को रखना है या नहीं, इसका निर्णय दिल्ली नहीं हम करेंगे ।’ बात तो सही ही है । लेकिन स्वयं प्रमुख प्रतिपक्ष दल नेपाली कांग्रेस इसके प्रति उत्सुक नहीं हैं तो सरकार परिवर्तन कैसे सम्भव हो सकता है ?

इस मामले में नेपाली कांग्रेस के केन्द्रीय सदस्य सुजाता कोइराला का कथन भी प्रासंगिक हो सकता है । उन्होंने हाल ही में एक दैनिक अखबार में अन्तरवार्ता देते हुए कहा है– ‘मेरे विचार में अभी सरकार परिवर्तन करना ठीक नहीं है । सरकार क्यों परिवर्तन किया जाए ? इसका जवाब जनता और कार्यकर्ता को देना होगा । सच में ही हम सरकार परिवर्तन चाहते हैं तो उसके लिए देश के भीतर ही बातचीत, आन्दोलन और दवाब सृजना करनी चाहिए । दिल्ली जाने से नेपाल की सरकार परिवर्तन नहीं हो सकती ।’ अब तो यही निष्कर्ष है– ओली सरकार परिवर्तन के लिए कौन साहस दिखाएगा ? इतना होते हुए भी ‘जल्द ही कांग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा प्रधानमन्त्री बननेवाले हैं’ कहते हुए भाषणबाजी करनेवाले कांग्रेसी नेता कम नहीं हैं ।

ऐसे ही नेताओं में से एक है नेपाली कांग्रेस के केन्द्रीय सदस्य बालकृष्ण खाँड । जब देउवा को पार्टी सभापति निर्वाचित होने की घोषणा की गयी, उसके कुछ क्षण बाद ही नेता खाँड ने देउवा को भावी प्रधानमन्त्री के रूप में प्रस्तुत किया था । उस समय उन्होंने कहा था– ‘अब जल्द ही अप्राकृतिक गठबन्धन से बनी हुई वर्तमान सरकार परिवर्तन होने वाली है । अब तो शेरबहादुर देउवा नेतृत्व में एमाले, एकीकृत माओवादी और मधेस केन्द्रित दलों की सहमति में राष्ट्रीय सरकार बनेगी ।’ सभापति देउवा के विश्वासपात्र माने जानेवाले नेता खाँड ने उसके बाद भी बारबार इस तरह की अभिव्यक्ति दी है । लेकिन स्वयं देउवा, अभी तक इसका कोई संकेत नहीं कर रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है ? यह प्रश्न हिमालिनी ने नेता खाँड के साथ रखना चाहा था, लेकिन बारबार उनके मोइबाल में सम्पर्क करने से भी उन्होंने फोन नहीं उठाया । सरकार परिवर्तन से जुडेÞ स्वार्थ पहले ही उल्लेख हो चुका है– ओली के विकल्प में एमाले के नेता माधवकुमार नेपाल और वामदेव गौतम भी तैयार हैं । इसके लिए उन लोगों की कुछ स्वार्थ पूरी होनी चाहिए । अब तो और कौन है, ओली की विकल्प नहीं चाहेंगे ? वत्र्तमान सरकार के लिए प्रमुख साझेदार एमाओवादी के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल स्वयं ने भी बारबार राष्ट्रीय सरकार की बात की हैं । उसी तरह सत्ता के लिए दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सेदार राप्रपा नेपाल के अध्यक्ष कमल थापा भी इसका संकेत दे चुके हैं । सत्ता की गलियारे में रहे अन्य कुछ छोटे–मोटे दलों की तरफ से भी वत्र्तमान सरकार के प्रति असन्तुष्टि जाहिर हो चुकी है । तब प्रतिपक्ष में रहे नेपाली कांग्रेस और आन्दोलन में रहे मधेशवादी–जनजाति गठबन्धन ओली को समर्थन क्यों करे ? तब भी ओली सरकार मजबूत है ! इसीलिए इस तरह की बहस सृजन करनेवालों का अपना–अपना स्वार्थ है । उसी के अनुसार बहस भी कर रहे हैं । एमाओवादी और राप्रपा नेपाल के कथन के पीछे सरकार का नेतृत्व सामने नजर आता है । तभी तो वे लोग सरकार परिवर्तन की बहस कर रहे हैं । अपनी कुछ माँग सम्बोधन हो और सरकार परिवर्तन करके सत्ता की चासनी में डूबा जाए, ऐसी मानसिकता आन्दोलन में रहे संघीय गठबन्धन के कुछ दलों की नेता में भी हो सकती है । लेकिन ओली सरकार के आगे उन लोगों की कोई दाल गलने वाली नहीं है । तभी तो कुछ लोग कहते हैं– पाँच महीने का तराई आन्दोलन और उसकी असफलता इस बात की पुष्टि कर सकती है ।

लेकिन सद्भावना के महासचिव मनीष सुमन इस बात को अस्वीकार करते हैं । सुमन आगे कहते हैं– ‘हमारी आवाज भारत, युरोपियन युनियन और अमेरिका ने भी सुना है । अन्तर्राष्ट्रीय जगत द्वारा स्वीकार किए गए आन्दोलन और हमारी आवाज को नश्लीय चिन्तन लेकर चलनेवाले ओली सरकार ने नहीं सुना ।’

बात जो भी हो, जब तक एमाओवादी और राप्रपा नेपाल का साथ रहेगा, तब तक ओली सरकार गिरनेवाली नहीं है । एमाओवादी तब तक ओली को साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जब तक पार्टी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ को प्रधानमन्त्री प्रस्तावित किया न जाए । ओली को छोड़कर प्रचण्ड क्यों कोई कांग्रेस नेता को प्रधानमन्त्री स्वीकार करें ? एमाले नेतृत्व और कांग्रेस नेतृत्व दोनों प्रचण्ड के लिए समान है । क्या प्रचण्ड को प्रधानमन्त्री बनाने के लिए नेपाली कांग्रेस और देउवा तैयार हैं ? अगर नहीं हैं तो ओली का बर्हिगमन सामान्यतः असम्भव है । यही बात राप्रपा नेपाल के भीतर भी लागू होता है ।

अपनी ताकत की वश चले तो कमल थापा भी प्रधानमन्त्री के लिए महत्वाकांक्षी हैं । प्रधानमन्त्री नहीं भी मिल सकता है, लेकिन अभी जो मन्त्रालय उनके पास है, उससे कुछ ज्यादा मालदार मन्त्रालय मिलने की सम्भावना हो तो राप्रपा नेपाल नेपाली कांग्रेस की नेतृत्व स्वीकार कर सकती है । लेकिन अभी तक ऐसा माहौल नहीं दिख रहा है । तब तो कैसे होगा ओली का बहिर्गमन ? प्रचण्ड की नौटंकी जारी मई ४ तारीख एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने केपी शर्मा ओली का साथ छोड़ने का निर्णय करते हुए अपने ही नेतृत्व में नयी सरकार बनाने की घोषणा की, लेकिन उसके दूसरे दिन मई ५ के दिन प्रचण्ड ने उसके ठीक विपरीत पुनः ओली सरकार का साथ देने का निर्णय करते हुए नेकपा एमाले के साथ नौ सूत्रीय सम्झौता भी किया । जबतक रातोंरात निर्णय परिवर्तन करनेवाले प्रचण्ड जैसे नाटकीय चरित्रवाले लोग राजनीति में हावी होंगे, तब तक सरकार परिवर्तन कैसे होगा ? मई ४ में सब को लग रहा था कि अब ओली सरकार ज्यादा दिन रहनेवाली नहीं है । इसका एक ही कारण था– एमाओवादी द्वारा अपने ही नेतृत्व में नयी सरकार बनाने की घोषणा करना । लेकिन जब ओली ने बजट अधिवेशन के बाद प्रचण्ड को ही प्रधानमन्त्री बनाने का आश्वासन दिया तो उन्होंने नेपाली कांग्रेस का साथ छोड़ दिया । अब प्रतीक्षा इस बात की है कि तकरीवन एक महिना वाद क्या प्रचण्ड प्रधानमन्त्री बन पाएंगे और ओली सरकार की विदाइ हो पाएगी ?

Loading...