सत्ता में टिके रहने का बहाना

मधेशी मोर्चा आज के वर्तमान व्रि्रह में सिर्फ’एक पक्ष का सहयोगी भर रह गया है। यह खूद ‘पक्ष’ भी नहीं रहा। मुद्दों में छलफल और निर्ण्र्ााकी प्रक्रिया तो माओवादी-कांग्रेस-एमाले के मध्य जारी है। एजेण्ड भी उन की हैं। मोर्चा के मंत्रीगण, नेतागण तो फेके गए तास के पत्ते को सिर्फदेख रहे हंै। फिर आगे की राजनीतिक दिशा निर्वाचन उन्मुख है। संविधान सभा की पुनःर्स्थापना भी चर्चा में है, परन्तु पुनःर्स्थापन आगे का मार्ग प्रशस्त करने का एक तत्कालीन माध्यम भर रहेगा। आगे का मुख्य कदम तो निर्वाचन ही होगा। संभाव्य निर्वाचन के परिणाम मधेश के लिए क्या होगें-फिलहाल इस पर चर्चा न करें, मगर भावी संविधान सभा मं मधेशी समुदाय का न्यायोचित प्रतिनिधित्व को हम सुनिश्चित कर पायेगें – क्या इस पर सरकार में रहे लोग कभी विचार भी कर रहे हैं –
मधेशी मोर्चा माओवादी के साथ है। साथ ही रहने की कसमें दुहारा रहे हैं। परन्तु, विडÞम्वना देखिए- भावी संविधान सभा का स्वरूप के बारे मंे मोर्चा ने निर्ण्र्ााकिया है। इस का आकार पहले की तरह ही ६०१ संख्या का होगा। जब कि माओवादी  एमाले के साथ सहमत है कि इसकी संख्या घटेगी। अब दीपावली के वाद जनगणना का नयाँ रिपोर्ट आना तय है। अन्तरिम संविधान के मुताविक निर्वाचन क्षेत्र का पुनः निर्धारण होना है। मधेशी पार्टर्ीीँ अपनी-अपनी पर्ूव मान्यता के आधार पर क्या आज भी पूरे मुल्क में समान जनसंख्या के आधार पर ही निर्वाचन क्षेत्रका निर्धारण हो -इस मांग पर कायम हंै –
मधेशी पार्टर्ीींे के भौतिक विरोध-अवरोध के बावजूद भी निर्वाचन आयोग ने नागरिकता के प्रमाण-पत्र के आधारपर ही मतदाता नामावली संकलित किया है। वि.सं. २०६४ साल में हुए संविधान सभा के निर्वाचन में कायम मतदाता संख्या में अभी करिब ७० लाख लोग घटे हैं। जिस भी कारण से हो, बडÞी संख्या घटी है। प्रारम्भिक आंकलन के आधार में मधेश के जिलों में सरदर ३५ प्रतिशत तक मतदाता कम हुए हैं। इस गम्भीर विषय से स्वभावतः माओवादी, कांग्रेस और एमाले को नुक्सान न हो। मगर मधेशी समुदाय का प्रतिनितित्व में गंभीर और नकरात्मक प्रभाव डÞालेगा। माओवादी के स्वर में अपनी आवाज देकर सिर्फनिर्वाचन का राग अलापने बाला मधेशी मोर्चा की यह आत्मघाती प्रवृत्ति प्रत्यक्ष रूपसे मधेशी हित के विपरीत एक निरपेक्षता है। किसी भी मुल्क मंे, किसी भी वर्ग या समुदाय का प्रतिनिधित्व कहेंने से उस वर्ग या समुदाय के प्रति एक नैतिक दायित्व का निर्वाह का भाव समझ में आता है। मधेशी मोर्चा, क्या मधेशी समुदाय के प्रति यह नैतिक दायित्व का निर्वाह कर रहा है –
‘सत्ता और  मधेश’ का सम्बन्ध लम्बे समय से चर्चा में रहा है। हाल के दिनो में तो और भी ज्यादा। मधेश के बड और सिद्धहस्त नेताओं से भी मेरा विचार-विमर्श होता रहा है। मित्र लोग मुझे दिखाते थे, देखिए-माओवादी, कांग्रेस, एमाले सभी तो सत्ता के लिए ही काम कर रहे हैं। सिर्फहम ही क्यांे नहीं – बात गलत नहीं है। मधेशी को सत्ता की तरफ देखना ही नहीं है-ऐसा कोई नहीं कहते। मगर सत्ता किस प्रयोजन के लिए – यह तो तय होना चाहिए।
हम तर्कसंगत आधार पर ‘मधेश एक प्रदेश’ की मांग करते आए हैं। इस में तीनो कथित बड दल का र्समर्थन नहीं है। माओवादी के साथ मधेशी मोर्चा सत्ता में भागीदारी रखे है। गत जेठ १४ गते से कुछ पहले, शायद जेष्ठ २ गते तीनों दलों के बीच ११ प्रदेश बनाने के लिए सहमति हर्ुइ था। कोई ५ सूत्रीय सहमति। उस मौके पर सरकार में रहे मधेशी मोर्चा के नेतागण भी थे। विदेशी प्रतिनिधियों की भी उपस्थिति थी, ऐसा कहा जाता है। उस ११ प्रदेश के प्रस्तावमंे सहमति होना माओवादी, कांग्रेस, एमाले के हित में था। उस के आधार पर पहाडÞी क्षेत्रमंे बहु प्रदेशको स्वीकारा गया था, जो माओवादी के अनुकूल था। मगर उस समझदारी के आधार पर मधेश में भी बहु प्रदेश ही होता, जो माओवादी, कांग्रेस और एमाले के सोच और चाहना के मुताबिक था, परन्तु हमारे लिए तो मरणतुल्य था, सारे प्रयत्नों एवं उपलब्धियो की समाप्ति। यह दर्ुभाग्यपर्ूण्ा था, कि वहाँ रहे मधेश के नेतागणों ने उस प्रस्ताव को स्वीकार किया। लाखों-लाख मधेशी लोगों ने टि.भी. पर उन्हे बोलते देखा- “हम सहमत तो नहीं है, परन्तु संविधान सभा में इसे पास करने में अवरोधक नहीं होगें।” इस का क्या अर्थ होता है – हम क्या समझे – अब आप ही सांेचे कि सत्ता में क्यो रहें – क्या क्रान्तिकारियों के लिए यह र्सवकालिक सत्य नहीं है कि ‘सत्ता का प्रयोग बदलाव के लिए, परिवर्तन के लिए होना चाहिए।’ उसी वक्त मैंने कहा था, मैने जेलसे अनुरोध किया था- यदि आप आगे न बढÞ सकते हंै तो औरो का रास्ता अवरुद्ध न करंे। एक सतत गतिशील आन्दोलन को भावी पुस्ता में हस्तान्तरण करें। इस में तर्क का कोई स्थान नहीं है- यदि सत्ता परिवर्तन के दिशा में नाकामयाव हैं तो फिर सत्ता हराम होना चाहिए।
मधेशी मोर्चा पर सम्झौता के लिए घातक दबाब था। मेरे और मधेशी मोर्चा के कुछ मित्रों के बीच उन का सम्झौतापरस्त चरित्र के बिरुद्ध मतभिन्नता थी। साथ ही गठबन्धन के बाबजूद भी माओवादी के साथ मेरी गंभीर असहमति उभरकर आई थी, नागरिकता समस्या के समाधान हेतु संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव लेजाने के विषय में।
उस वक्त मधेश के करिब ७ सय युवा हतियार के मुकदमे में जेल में थे। आज भी जेल में ही हैं। वे तर्राई के शसस्त्र आन्दोलन से सम्बद्ध थे- उन सभी को रिहा कर समस्या का शान्तिपर्ूण्ा रास्ता ढूंढने के विषय पर।
उस समय की सहमति के आधार पर नेपाली सेना में कम से कम तीन हजार मधेशी युवाओं की तत्काल भर्ती हेतु सेना मुख्यालय के नाम बजेट निकासा करना था। प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टर्राई बजेट रोक रखे थे। मधेश में भावी आन्दोलन की अवश्यंभाविता की दृष्टि से मधेशी पर होने वाला संभाव्य सरकारी दमन को मध्य नजर रख संयुक्त राष्ट्र संघ मानव अधिकार उच्चायोग का नेपाल स्थित अस्थायी कार्यालय को यहाँ रखना आवश्यक था। माओवादी, कांग्रेस और एमाले- ये तीनों इस का विस्थापन चाहते थे। प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टर्राई ने संयुक्त राष्ट्र संघ को पत्र लिखकर कार्यालय बन्द कर जाने को कहा था।
अन्तर्रर्ााट्रय प्रतिवद्धता और अनुबन्ध के तहत नेपाल सरकार को कुछ कानून बनाने थे। इन में संगठित अपराध नियन्त्रण से सम्बन्धित एक था। अन्तर्रर्ााट्रय आतंकवाद को नियन्त्रण से सम्बन्धित एक था। अन्तर्रर्ााट्रय आंतकवादको नियन्त्रण के लिए संगठित अपराध को नियन्त्रित करने बाला विधेयक में सामान्य प्रजातान्त्रिक बिरोध पर््रदर्शन को भी संगठित अपराध के दायरे में रखा गया था। इस आधार पर सरकार चाहे तो किसी भी समूह को उस के द्वारा किया गया शसक्त विरोध पर््रदर्शन के नाम पर बिना मुकदमा ६ महिना और उस से भी ज्यादा समय तक जेल में रखने का प्रावधान किया गया था।
इस तरह कई सवालों पर माओवादी नेतृत्व से मेरी गंभीर मत भिन्नता थी। यदि इन मुद्दों पर सरकार अमल न करे, हम इसे लागू न करवा सके तो सरकार से बाहर हो जाना चाहिए। यदि स्वयं मधेशी मोर्चा अपने ध्येय और मान्यता पर अडिÞग न रह सका तो इस का बिघटन होना ही बेहतर होगा। मैने अपनी दृढ धारणा स्पस्ट रूप में मोर्चा में रखी थी। मुझे याद है, उन के लिए मेरा विचार अग्राह्य था। मेरे वे विचार सत्ता में निरन्तरता के उन के सोच के विपरीत थे। मित्रों की भृकुटी तन गई थी। तो मेरा सवाल आज भी वही है। मै जेल से भी प्रश्न करना चाहूंगा। संविधान सभा में हमारी उपस्थिति, राज्य -सरकार) में हमारी उपस्थिति, माओवादी या कांग्रेस एमाले के साथ मधेशी पार्टर्ीीे का गठबन्धन, चार पक्ष में हमारी उपस्थिति- यदि बदलाब के लिए असक्षम हैं तो इन पर हमे पुनः विचार करना चाहिए। और मेरी धारणा हैं- हम अपने सैद्धान्तिक-वैचारिक-कार्यनीति मान्यताओ पर नहीं टिके है। इसीलिए हमारी सशक्त उपस्थिति के बाबजूद भी हम अपने हित में बदलाव नहीं ला सके। सत्ता में निरन्तर की उपस्थिति और सरकार में बडÞी संख्या में हमारी भागीदारी को हमने मुद्दाओं की जीत के रूप में प्रचारित कर स्वयं अपने को, सम्पर्ूण्ा मधेशी समुदाय को झूठलाने का गलत उद्यम किया है।
मधेशी जनता-मधेशी पार्टर्ीीें के निरन्तर फुटने से परेशान रही है। आपस में एकता हो, सहकार्य हो- ऐसी अभी सम्पर्ूण्ा समुदाय की चाहना है। कुछ मधेशी पार्टर्ीीें के बीच एकता एवं एकीकरण का प्रयास जारी है। इस प्रयास को सफलता मिले-इस का मै भी स्वागत करता हूँ। परन्तु यह स्पष्ट होना होगा- एकता का प्रयोजन क्या हो – आम निर्वाचन से पर्ूव की यह एकता, यदि भावी चुनाव में एक शक्तिशाली पार्टर्ीीे रूप में उभरकर सत्ता में भागीदारी की उत्प्रेरणा से प्रभावित है तो उस इच्छित भागीदारी से क्या फिर बदलाव आ सकता है –
हम नई पार्टर्ीीनाबें। पार्टर्ीीार्टर्ीीे बीच एकता वा एकीकरण करंे। नित्य नईर्-नई मोर्चा बनाबे। भिन्न-भिन्न मोर्चा के बीच सहकार्य करें। राष्ट्रिय राजनीति के मुख्य पक्षों के साथ बारी-बारी से गठबन्धन में रहें। संसद वा संविधान सभा में रहें। चुनाव में भाग नहीं लेने के उद्देश्य से पार्टर्ीीठन करें और फिर सडÞक में रहें। संसदीय और शान्तिवादी धार के खिलाफ बगावत करें और शसस्त्र समूह का गठन-नव गठन करें। जो भी करंे, परन्तु हमारा मुख्य और आधारभूत राजनीतिक कार्यभार नेपाल में विद्यमान ‘स्थायी सत्ता’ को तोडÞना ही है। इसे-एक संघीय, लोकतान्त्रिक, समावेशी और गणतन्त्रात्मक पद्धति, जिस का मूल चरित्र और शक्ति मधेश में विद्यमान आन्तरिक औपनिवेशिकता का अन्त्य करना होगा। इसे हम प्राप्त करते हैं या नहीं – सभी प्रयत्नों का औचित्य इसी पर निर्भर है।

दिग्भ्रमित मधेशी मोर्चा दिशाहीन मेधश यात्रा

मेरी जेल यात्रा राजनीतिक जीवन का अन्त नहीं, नई पारी की शुरुआत

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