सत्ता संर्घष् में उलझी हर्इ राजनीति
खुशीलाल मंडल

संविधान सभा गठन के बाद संविधान सभा तथा संघीयता अस् वीकार  कर ने वाले दल के साथ-साथ जातीयमुक्ति के नाम पर  हजार ों युवाओं को शहीद बनाने वाला दल एनेकपा माओवादी भी संघीयता के लिए इमानदार  नहीं दिखा । साढे तीन वर्षतक र ाज्य पुनर संर चना आयोग गठन कर ने के लिए गंभीर  पहल नहीं कर ना, अन्तिम समय में गठित आयोग के रि पोर्ट को सदन में बहस कर ाए बिना ठंडे बक्से में डाल देना, कभी १४ प्रदेश का प्रस् ताव लाना, कभी १० प्रदेश तो कभी ८ प्रदेश पर  सहमति जताना, कभी अखण्ड सुदूर  पश्चिम की माँग कर ने वालों का साथ, कभी अखण्ड चितवनकी माँग कर ने वालों का साथ, कभी थरुहट आन्दोलनकार ी के साथ, कभी खस ब्राम्हण क्षेत्री आन्दोलनकार ी के साथ, कभी आदिवासी जनजाति के साथ, कभी दलित आन्दोलन के साथ, कभी मधेशवादी दल के साथ, कभी नेपाली काँग्रेस और  नेकपा एमाले के साथ पर स् पर  विर ोधी सम्झौता कर ना इस का उदाहर ण है । यह जनआन्दोलन के मर्म के प्रति कुठार ाघात नहीं तो और  क्या है –
इसी तर ह अभी के मधेसवादी दल के बहुसंख्यक नेतृत्व पंक्ति को संविधान सभा, संघीयता सामाजिक न्याय तथा मधेश की समस् या से सर ोकार  नहीं र हा है । वे भी र ाष्ट्रिय स् तर  के र ाजनीतिक दल के नेताओं का आदेश मानकर  सत्ता सुख प्राप्त कर ने में लगे हैं, जो इतिहास देखने पर  साफ होता है । २०६३ माघ के मधेस आन्दोलन में बहुतों ने दर वार ी तत्व अथवा विदेशी शक्ति का हाथ देखकर  आन्दोलन के विपक्ष में क्रियाकलाप किया था । संविधान सभा निर्वाचन काल में कोई विकल्प नही होने से २०६४ के संविधान सभा निर्वाचन में मधेसी जनता ने बहुसंख्या में निर्वाचित कर के मधेसी जनता के हित में संविधान बनाने के लिए प्रतिनिधि बनाकर  उन लोगों को भेजा था । उसके विपर ीत सत्तालिप्सा में लीन होकर  मुख्य दल की गोटी बनकर  संगठित मधेसी शक्ति विखण्डित हो गई । चार  वषोर्ं के इस घिनौने खेल ने मधेसी जनता की भावना पर  कुठार ाघात किया है, मधेसी सपूतों के बलिदान को कलंकित किया है । उसी तर ह संविधान सभाका अवसान होने के अन्तिम दिन में पहाड तथा हिमाली क्षेत्र के आदिवासी जनजाति सभासदों ने जैसी सक्रियता देखाई, शुरु से वैसी ही सक्रियता र हती तो नेपाली जनताको संविधान सभा से नव निर्मित संविधान प्राप्त हो गया होता ।
संविधान सभा के कार्यकाल से ही नेपाली काँग्रेस के नेता शेर बहादुर  देउवा ने छोटे-मोटे संशोधन कर के २०४७ साल के संविधान को लागू कर ाने की माँग र्सार्वजनिक रुप में आगे बढÞाया था । अन्य क्षेत्र से भी वैसा ही माँग अने लगी । संविधान सभा के अवसान के बाद अभी नेकपा एमाले ने संस् थागत रूप में तथा नेपाली काँग्रेस और  मधेसी जनाधिकार  फोर म के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव लगायत ने संसद का चुनाव कर ाने की आवाज उठायी है । दश वषर्ीय माओवादी सशस् त्र संर्घष्ा के सहजकर्ता वैद्य समूह ने उससे एक कदम आगे बढÞकर  संविधान सभाको विफल घोषित कर ते हुए गोलमेच सम्मेलन द्वार ा समिति बनाकर  संविधान निर्माण कर ने की माँग को आगे बढाया है । फिलहाल चीन भ्रमण के समय चिनियां नेता के उपदेश अनुसार  संघीयता में विदेशी चलखेल होने का भय दिखाया गया है । वैद्य नेतृत्व के छात्र युवा संगठन विदेश नाम धार ी काँलेज में र ाष्ट्रीयता के नाम पर  तोडÞफोडÞ कर  र हा है और  उसके नेता मोहन वैद्य विदेश का उपदेश मानने के लिए नेपाली जनताको सलाह दे र हे हैं । यह दुहर ा चरि त्र नहीं तो और  क्या हैं –
२००७ साल की क्रान्ति के बाद ही संविधानसभा के चुनाव कर ाने की बात हर्ुइ थी । लेकिन मातृका प्रसाद कोईर ाला, नेपाली र ाष्ट्रिय काँग्रेस के अध्यक्ष डिल्लीर मण र ेग्मी, तथा प्रजापरि षद के अध्यक्ष टंकप्रसाद आचार्य, जैसे अग्रपंक्ति के नेतओं ने उसका विर ोध किया था । उसके साठ वर्षबाद उसी घटना की पुनर ावृत्ति हो र ही है । नेपाल का अन्तरि म संविधान किसी नेता के द्वार ा नेपाली जनता को दिया गया उपहार  नहीं है, हजार ों नेपाली सपूतों के बलिदान से प्राप्त अधिकार  है । अन्तरि म संविधान में संविधान सभा बाहर  से संविधान जार ी कर ने की कल्पना तक नहीं की गई है । इस अवस् था में सुधार  सहित ०४७ साल का संविधान जार ी कर ने की माँग हो या संसद से संविधान जार ी कर ने की माँग, अथवा गोलमेच सम्मेलन से समिति बनाकर  जार ी कर ने की माँग, देश का ६ वर्षका समय एवं अर बों लगानी को मिट्टी में मिलाने का प्रपंच है ।
नेपाली जनताका दर्ुभाग्य है कि देश कभी र ाज्यशाही, कभी र ाणाशाही तो वर्तमान में नेतृत्वशाही के तानाशाही का शिकार  बन र हा है । चार  वर्षतक जनता की कमाई पर  मौज कर ने में लिप्त होकर  संविधान सभा बनाए बिना ही बोनस लेने वाले भूपू सभासद् संविधान सभा विघटन के बाद चार /छ महिना में ही संविधान बनाने का दावा कर  के संविधान सभा पुनर स् थापना कर ाने की माँग कर के अपना तथा नेतृत्व की गलती छिपाने के काम में लगा है । नेकपा एमाले तथा नेपाली काँग्रेस संविधान लेखन का काम ९५ प्रतिशत पूर ा होने का दावा कर  र हें है । संवैधानिक व्यवस् था अनुसार  प्रस् तावना से लेकर  प्रत्येक धार ा तथा शब्द-शब्द पर  संविधान सभा में बहस कर ाकर  संविधान जार ी कर ाने की अनिवार्यता है । चार  वर्षमें किसी दफा पर  संविधान सभा में बहस नहीं हुआ है तो वह काम कैसे पूर ा हुआ । कुछ लोगों के विचार  को ही संविधान का अन्तिम प्रारुप मान लिया जाय तो ६०१ सदस् यीय जम्बो संविधान सभा बनाने का औचित्य क्या था –
संस् दीय व्यवस् था शुरु होने के तीन वर्षके भीतर  ही नेकपा माओवादी ने विश्व में सर्वोत्तम प्रणाली प्रमाणित संसदीय पद्धति को नेपाल में विफल तथा बर्ुर्जुवा घोषित कर के सशस् त्र संर्घष्ा शुरु कर  दिया था । २०६५ साल में गणतन्त्र स् थापना के बाद अविच्छिन्न रूप में कम्यूनिष्ट पार्टर्ीीें नेतृत्व में सर कार  संचालित है । बामपन्थी दल के नेतृत्वकाल में शासन संचालन में क्या परिर् वर्तन हुआ – सीमान्तकृत समुदाय कितना लाभान्वित हो पाया – भ्रष्टाचार  घटा अथवा बढा सुशासन कायम हुआ कि कुशासन बढा, गरि बी घटी या बढी – कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे भीतर  उत्पन्न सत्तालिप्सा, सर कार  गठन और  विफल कर ाने का खेल, र्सवहार ा वर्ग के प्रतिनिधियों की ऐयाशीपर्ूण्ा जीवन पद्धति, साम्यवादी, जनवादी, सिद्धान्त की उपज है अथवा बर्ुर्जुवा की – कुछ वर्षपहले नेकपा एमाले ने देश के भ्रष्टाचार ी का नाम खुलामञ्च से घोषित किया था, जिस में एमाले के वर्तमान उपाध्यक्ष बामदेव गौतम का नाम सबसे ऊपर  था । वे आज एमाले के सम्मानित उपाध्यक्ष हैं । एनेकपा माओवादी द्वार ा पर्ूव लडाकू से असूला गया लेवी, शिविर  संचालन में हर्ुइ अनियमितता तथा माओवादी नेतृत्व पंक्ति की सम्पत्ति की जाँच कर ने के लिए दो समिति गठन किया है । उसका हस्र एमाले के भ्रष्टाचार ी घोषणा जैसा ही होगा या उसका र्सार्थक परि णाम निकलेगा – तीन वर्षके भीतर  संसदीय व्यवस् था को विफल घोषित कर ने वाले एनेकपा माओवादी नेतृत्व को नेपाल में र्सवहार ा और  बामपन्थी आन्दोलन विफल होने का तथ्य स् वीकार  कर  लेना चाहिए या नहीं –
र ाष्ट्रीय सहमति का नार ा र टते-र टते ६ वर्षगुजर  गए । बिमति के कार ण संविधान सभाका अवसान हो चुका है । नेकपा एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल र ाष्ट्रीय सहमति के नाम पर  अपने दल के नेता माधव नेपाल से र ाजीनामा कर ाकर  खुद प्रधानमन्त्री बने । न तो वे सहमति बना सके न ही उनकी अर्जुनदृष्टि काम आई । सहमति बनाने के नाम पर  माधव कुमार  नेपाल की काम चलाउ सर कार  विश्व में एक उदाहर ण बन चुकी है । धोबीघाट बैठक से डा. बाबुर ाम भट्टरर् ाई को प्रधामन्त्री बनाने में मुख्य सहयोगी मोहन वैद्य पक्ष ने २ महिने के भीतर  उनसे र ाजीनामा कर ाने की माँग की थी । उस में बिफल होने के बाद अलग दल गठन कर  लिया है । अब भी सहमति के नाम पर  देश को बन्धक बनाकर  र खना देश भक्तिपर्ूण्ा काम नहीं माना जा सकता है । सत्ता संर्घष्ा के कार ण देश र ाजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक लक्ष्य प्राप्त कर ने में विफल होता र हा है । वर्तमान गतिर ोध समाप्त कर ने और  देश को सत्ता संर्घष्ा से बचाने के लिए र ाजनीतिक दल को सर कार  गठन से अलग कर के प्रधान न्यायाधीश अथवा स् वतन्त्र व्यक्ति के नेतृत्व में गैर  र ाजनीतिक सर कार  गठन कर ना चाहिए । इसके बाद घोषित संविधान सभाका चुनाव कर ाने में बाधक संवैधानिक तथा कानूनी बाधा दूर  कर ने की सहमति बनाकर  अध्यादेश मार्फ संशोधन किया जा सकता है । संविधान सभा को भीडतन्त्र से बचाने के लिए सदस् य संख्या घटाकर  संविधान सभा का नयाँ चुनाव कर ना चाहिए ।

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