सदाचार ही मनुष्य का यथार्थ जीवन है:
रवीन्द्र झा शंकर’

चित्तसे उनका चिन्तन करो, इन्द्रियों से उनकी सेवा करो, जीवन का प्रत्येक कार्य उन्ही की सेवा के लिए करो, परंतु याद रखो- उनकी सेवा के लिए जो कार्य होते हैं, वे सत्कार्य ही होते हैं। बुरे कामों से उनकी सेवा नहीं हो सकती। भगवान की सेवा के लिए किए जाने वाले शुभ कार्यों का नाम ही सदाचार है। सदाचार रहित मनुष्य तो जीता जागता मर्ुदा है। बाहर कितनी भी सुन्दरता क्यों न हों, देह को कैसे भी क्यों न सजाया जाए। परंतु यदि सदाचार नहीं हो तो कुछ भी नहीं है। सदाचार शून्य मनुष्य की देह की सजावट तो वैसे ही है, जैसे जहर से भरे हुए सोने की कलश की।
निरन्तर अपने अन्दर सद्गुणों को भरने की चेष्टा करते रहो और सर्त्कर्म के लिए ही प्रयत्न करो। ये सद्गुण और सर्त्कर्म भी केवल भगवान पूजन के लिए ही होना चाहिए। इनके बदले- ये मिल ने वाली, लौंकिक पूजा, मान बडाइ इनका फल समझ बैठगे तो याद रखो गिरते देर नहीं लगेगी। सारे सदगुण और सर्त्कर्म सीधा ही नष्ट हो जाएगा। दैवी सम्पदा के गुण भगवान के आश्रम पर ही ठहरते हैं, मान-सम्मान या पूजा-प्रतिष्ठा के आधार पर कदापि नहीं। जिसके जीवन का लक्ष्य भगवान होता है और जो इस लक्ष्य को दृढÞता के साथ बनाए रखता है, उसके मार्ग में जगत की विपत्तियाँ रोडे नहीं आटका सकती। भगवत कृपा से उसका पथ निष्कण्टक हो जाता है। कहीं कंप्टे रहते भी हैं तो उस के पैर उन पर टिकते ही वे मखमल की तरह कोमल हो जाते हैं। कोई भी विध्न उसके सामने आकर विध्न रुप नहीं रहते वरन उलटे उसके सहायक वन जाते हैं। जीवन का लक्ष्य निश्चय करते समय भगवत प्राप्त महापुरुषों और भक्तों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करो, उससे तुम्हें अपना लक्ष्य स्थिर करने में सहायता मिलेगी और लक्ष्य की ओर चलने में हम अवलम्बन और पाथेय मिलेगा। याद करें- बातों से रास्ता नहीं कटता, बहुत ऊँची-ऊँची बातें तो नाटक के पात्र भी किया करते हैं। भगवान श्री कृष्ण भीष्मपितामह, शंकराचार्य और बुद्धदेव आदि का अभिनय करने वाले कहने में कानै सी कमी रखते हैं। परंतु, उससे होता क्या – जब तक जीवन पवित्र नहीं होता, जीवन में वे बात नहीं उतरती, तबतक वह नाटक मात्र है। उस नाट्य से यदि कहीं बर्डाई मिल जाए तो उससे अपनी स्थिति को नभूल जाओं। जगत् के लोग तुम्हारी बातों से मुग्ध होकर धोखा खा सकते हैं। परंतु अन्दरकी रहने वाले भगवान् को तुम नहीं छल सकते। भगवान तो तुम्हारे सच्चे और र्समर्पण पर्ूण्ा जीव्न पर ही टीझेंगे- बातो पर नहीं।
दूसरे की निन्दा कभी न करों। न दूसरों को बुरा समझो। तुम्हें फुरसत नहीं मिलनी चाहिए। अपनी व्यवस्था और अवस्था की देखभाल से। दूसरों की ओर देखे बिना यदि न रहा जाए तो केवल उनके गुण को, उन के सत्कर्मों को और उनके शील को ही देखों।
निरन्तर आगे बढÞते रहो, रुको मत, पर अपनी स्थिति पर अभिमान न करों। जब तक अभिमान, ममता या आसक्ति का जरा भी वीज देख पाओं, तब तक साधना में विश्राम को जरा भी स्थान मत दो।

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