सदा दिवाली संत की : रवीन्द्र झा ‘शंकर’

रवीन्द्र झा

रवीन्द्र झा

परमात्मा को जानने वाले के लिए सदा दिवाली– आठों पहर आनन्द ही आनन्द रहता है । परमात्मा तो सब के लिए ही हैं । फिर संत–महात्मा को ही आठों पहर आनन्द क्यों रहता है ? सब को क्यों नहीं रहता ? कारण क्या है ? एक बड़ी भारी भूल होती है कि हम वस्तुओं में, व्यक्तियों में, घटनाओं में, परिस्थितियों में सुख मान लेते हैं । विचार करे कि किसी परिस्थिति में अगर सुख है तो उसी परिस्थिति में हरदम सुख रहना चाहिए और अगर परिस्थिति सच्ची है तो वह हरदम रहनी चाहिए । वास्तव में परिस्थिति सब को सुख नहीं देती और हरदम सुख नहीं देती । रुपयों में अगर सुख है तो बड़े–बड़े पैसे वाले खाने के लिए तरस रहे है । कारण भात खाने से बंचित किया है, दूध, धी, जितना पौष्टिक खाना है, सब डाक्टर ने वंचित किया है । पैसा है, लेकिन खाने के लिए तरस रहा है । नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित है, रुपयों से सब को सुख नहीं मिलता, क्योंकि रुपयों में सुख है नहीं, अगर, सुख है तो गाड़ियाँ है, करोड़ो की लेकिन चिकित्सक सुबह–सुबह चलने की सलाह देते और कहते हैं कि कम से कम खाना खाकर सौ कदम चलना होगा, सुख है कहाँ, सोने जाते है तो सजा हुआ पलंग है लेकिन नींद है कहाँ ? तो कहने तात्पर्य यह है कि यह भौतिक सुख क्षणिक सुख है, सुख तो उस संतो का घर है, सदा एक ही समान दिवाली ही दिवाली है, फिर महन्थों कि नहीं ।
संसार में सब को परमात्मा से सुख मिलता रहा है, चाहे बतासा हो, चाहे हलवा हो, कुछ भी हो, मिठास सब चीनी की ही है । गलती यह होती है कि नयी–नयी भावना करके संसार में सुख ढुँढ़ते हैं, अगर परमात्मा को ढूढ़े तो कल्याण सदा के लिए हो जाए । अगर किसी वस्तु में, व्यक्ति में, परिस्थिति में, क्रिया में सुख होता तो सब को सुख मिलता । वास्तव में किसी भी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदि में सुख नहीं है । गोस्वामी जी महाराज कहते हैं– हेतु रहित जग जुग उपकारी, तुम्ह तुम्हार सेवक असुरी (रा.च.मा. ७।४७।५)
भगवान और उनके भक्तो से सब को मुफ्त में सुख होता है । वे कुछ दें अथवा न दे, उन से स्वतः शान्ति मिलती है । जो उन से वैर भाव रखता है, उसे भी उनसे शान्ति मिलती है । उनके द्वारा स्वतः स्वभाविक ही सब का हित होता है– सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता ५।२९), सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमभ्दा ३।२५।२१) उन की रासलीला स्वतः ही हरदम चलती रहती है । श्रीजी को देखकर भगवान श्रीकृष्ण सुखी होते है और श्रीकृष्ण को देखकर श्रीजी सुखी होती है । अतः भगवान भक्तों के साथ हरदम ही रासलीला करते है । हमें वहम है कि रुपयों में सुख है, सोने में सुख है । स्त्री–पुत्र में सुख है । घर में सुख है । अगर इन में सुख होता तो इन से कभी दुःख होना ही नहीं चाहिए । इनसे सब को सुख होना चाहिए, सो कहा । परमात्मा का जो सुख है, वह हरदम ही रहता है, जाग्रत में, स्वपन में, सुषुप्ति में, उत्पत्ति में, प्रलय में, संहार में ।
सब जग डरपे मरण से, मेरे मरण आनन्द
कब मरिये कब भेटिये, पूरन परमानन्द ।।
जब मरण में भी आनन्द है तो फिर दुःख किस जगह होगा ? ज्यादा से ज्यादा दुःख मरने में ही होता है ।
हम अपने मन में यह भावना कर लेते हैं कि भगवान ने हमें दुःख दे दिया । भगवान दुःख कहाँ से लाए ? उनके दरबार में दुःख है ही नहीं । मनुष्य खुद ही कल्पना कर लेता है कि भगवान ने दुःख दे दिया, वे यह नहीं सोचते कि हमने कर्म कैसा किया है । चोर दूसराें के धन में सुख देता है, धन के लिए दूसरों को मार ही देता है । पर वह क्या सुखी हो जाता है ? क्या कभी दुःखी नहीं होता ।
इसलिए कर्म करना चाहिए । सत्य कर्म में भरोसा रखना चाहिए, भगवान् पर भरोसा रखना चाहिए । भगवान् की जैसे– मीरावाई को जहर दिया तो वे से पी गई । प्रहलाद को आग में रख दिया तो वे विचलित नहीं हुआ । उनकी दृढ़ भावना थी कि भगवान हंै । आप के सामने काँच का टुकंड़ा आ जाए और आप के भीतर जँच जाए कि यह हीरा है तो उस टुकड़े में भी आनन्द दिखेगा । भावना से ही सुख–दुःख दिखता है । सदा दिवाली संत की सदा दिवाली संत की ।

 

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