सद्भावना पार्टी महासभाः समस्या निदान में कितना -यितेन्द्र शर्मा

काठमांडू। सत्ताधारी सद्भावना पार्टी द्वारा राजधानी काठमांडÞू के स्टाफ कालेज में अषाढÞ २९-३० गते को एक र्सवपक्षीय  महासभा का आयोजन किया गया। इस महासभा का मौजू था ‘राष्ट्रिय समस्या का निदान’। महासभा में देश की सबसे बडÞीपार्टीपाली कांग्रेस को छोडÞ शेष सभी दल के नेता अथवा एवं उनके नुमाइन्दे सामिल थे।
कार्यक्रम में मधेशवादी दल एवं जनजाति के नेताओं कहना था कि इन दिनो नेपाल में परिवर्तन को आत्मसात करनेवाले एवं नहीं करनेवालों के बीच एक बडÞी खाई है। इतना कहना था कि पहचानयुक्त संघीयता व संघीयता सहित के संविधान से कम पर ये राजी नहीं होंगे। वही सीपी मैनाली सरिखे नेता नेपाली कांग्रेस एवं एमाले की भाषा बोल रहे थे। सत्ताधारी सद्भावना पार्टी रमण कुमार पाण्डÞे ने मधेश को अलग देश बनाने तक की बात कह डÞाली। वही एमाले के उपाध्यक्ष एवं जनजाति नेता अशोक र्राई ने सिर्फइतना कहा कि अगर पहचानयुक्त संघीयता नहीं दिया गया तो क्या-क्या हो सकता है – मैं कह नहीं सकता।
सद्भावना पार्टी राष्ट्रिय अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने देश की वर्तमान स्थिति में पार्टी द्वारा इस तरह का कार्यक्रम राजधानी में आयोजित होना, इस पार्टर्ीीे राष्ट्रिय सोच, दूरदर्शिता एवं राष्ट्रप्रेम को दर्शाता है। सदभावना पार्टर्ीी”mठे वायदों पर यकीन नहीं करता। यह पार्टर्ीीरिणाम पर विश्वास करती है। महासभा के निष्कर्षपर सूक्ष्मता से विचार किया जाए तो यह समाधान का रास्ता जरुर दिखलाता है।
महासभा के निष्कर्ष
जेठ १४ की मध्यरात्रि में ऐतिहासिक संविधानसभा के अवसान होने के बाद देश में उत्पन्न नई राजनीतिक परिस्थितियों से हम सभी अवगत हैं। संविधानसभा से संविधान नहीं बन सका। फलस्वरुप एनेकपा माओवादी के नेतृत्ववाली संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा सम्मिलित सरकार बनी, सर्वोच्च अदालत के फैसले एवं अन्तरिम संविधान की धारा ६३ -२) के तहत आगामी मार्ग ७ गते संविधानसभा के नये निर्वाचन का ऐलान किया गया। नेपाली कांग्रेस एवं एमाले सहित के कुछ दलों ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक कहते हुए वर्तमान सरकार से इस्तिफे की मांग की है। इस पक्षका कहना है कि सरकार के इस्तिफे के बाद ही सहमति का वातावरण बन सकता है। सरकारी पक्षका कहना है कि पहले से विधान के विवादित विषयों पर सहमति बनें, फिर प्रधानमनत्री के इस्तिफे की बात आवें। यह विवाद पिछले डÞेÞढÞ महीने से चल रहा है। इन्ही विवादों के चलते सरकार ने आगामी आर्थिक वर्षके लिए पर्ूण्ा बजेट भी नहीं ला सके। ऐ भी अवस्था सिर्जित हर्ुइ। इस तरह राष्ट्रिय राजनीति में जटिल गतिरोध आया है। इस गतिरोध को हटाने के लिए प्रयास ढूडÞने हेतु पार्टर्ीीे असार २९ एवं ३० गते को राष्ट्रिय समस्या के निदान के लिए र्सवपक्षीय महासभाका आयोजना काठमाडÞौं में किया। देश में परिवर्तनकारी शक्ति एवं यथास्थितिवादी शक्तियों कें बीच द्वन्द्व बढÞÞता गया और इससे टकराव की अवस्था उत्पन्न होने पर इसे न्यून करने के लिए वर्तमान गतिरोध का अन्त हेतु उपाय ढूंढÞना ही महासभाका उद्देश्य है।
महासभा में देश के विभिन्न राजनीतिक दल, सामाजिक, जातीय एवं सामुदायिक संख्या के चार सौ से अधिक प्रतिनिधि, नागरिक समाज के शर्ीष्ालोग, बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं राजनीतिकर्मियों की उपस्थिति थी। महासभा में सद्भावना पार्टर्ीीे अध्यक्ष राजेन्द्र महतो, लक्ष्मणलाल कर्ण्र्ााएनेकपा माओवादी के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल, राप्रपा के अध्यक्ष पशुपति शमशेर, नेकपा -स.) के अध्यक्ष चन्द्रदेव जोशी, नेकपा माले के सीपी मैनाली, एमाले के उपाध्यक्ष अशोक र्राई, केन्द्रीय सदस्य राजेन्द्र श्रेष्ठ, नेकपा माले समाजवादी के अध्यक्ष यदुवंश झा, चुरे भावर पार्टर्ीीे बद्री न्यौपाने, राष्ट्रीय ताम्सालिङ पार्टर्ीीे अध्यक्ष परशुराम तामाङ, संयुक्त लिम्बुवान संर्घष्ा समिति के पदम अधिकारी, मधेशी जनअधिकार फोरम -गणतान्त्रिक के नेता नन्दनकुमार दत, तमलोपा उपाध्यक्ष वृषेशचन्द्र लाल, तमलोपा -नेपाल) के महासचिव दानबहादुर चौधरी, फोरम -लोकतान्त्रिक) के महासचिव जीतेन्द्र देव, फोरम -नेपाल) के प्रवक्ता रत्नेश्वर लाल कायस्थ, संघीय सद्भावना के देवेन्द्र प्रसाद यादव, नेपाल आदिवासी जनजाति महासंघ के अध्यक्ष राजकुमार लेखी, नेपाल पत्रकार महासंघ के सभापति शिव गाउँले, उच्चस्तरीय राज्य पुनर्संरचना आयोग के सदस्यद्वय स्टेला तामाङ एवं कृष्ण हाथेछु, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल, खगेन्द्र संग्रौला, चन्द्रकिशोर झा, बुद्धिजीवी डा. रघुनाथ न्यौपाने, प्रा. आनन्द आदित्य, पर्ूव राजदूत विजयकान्त कर्ण्र्ााअधिकारकर्मी दीपेन्द्र झा, तुलानारायण शाह, मनोज बच्चन, मुस्लिम अधिकारकर्मी नजरुल हुसेन पुलाही, मैथिल महिला समाज की अंजला झा, रवि ठाकुर, सीमा खान, विश्वदीप मिश्र, नेपाल बार ऐसोसिएसन के उपाध्यक्ष सुरेन्द्र महतो, दलित नेता बलराम ऋषिदेव, राजीव झा, सुवासचन्द्र सिंह, सुरेस मण्डल, केशव झा, गणेश मण्डÞल आदि ने अपने अपने विचार रखे।
समस्या एवं कारणः
राष्ट्रीय समस्या संघीयता सहित का संविधान ही है, यह महासभा की आमधारणा रही। परन्तु कुछ सहभागियों ने सरकार परिवर्तन के बाद ही समस्या का समाधान हो सकता है, ऐसा सुझाव दिया।
दूसरी नई सरकार से संविधान जारी हो सकता है, इसकी प्रत्याभूति करनेवाली कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं है। सरकार परिवर्तन का कारण से संविधान जारी होने जैसा कोई ठोस आधार दिखाई नहीं दिया। लिहाजा देश फिर से सरकार गठन-विघटन के दलदल में फँसने की संभावना देखी जा रही है। अधिकांश सहभागियों ने संविधान निर्माण को प्रथम समस्या के रुप में देखा, सरकार परिवर्तन से ही समस्या समाधान होते नहीं दिखा। लिहाजा यह महासभा भी संविधान निर्माण को ही प्रमुख समस्या मानती है।
संविधान निर्माण के क्रम में अधिकांश विषयों में सहमति बन चुकी है। फिर भी कुछ आधारभूत एवं महत्वपर्ूण्ा विषयों में सहमति नहीं बन पाना ही वर्तमान में गतिरोध का मुख्य कारण रहा, महासभा की यही धारणा है। संविधानसभा के अन्तिम दिनों में मूलभूत पाँच विषयों में विवाद था, नागरिकता, निर्वाचन प्रणाली, शासकीय स्वरुप एवं राज्य के पर्ुनर्संरचना जैसे विषय। उपरोक्त विषयों पर सहमति बनाने हेतु आयोजित विभिन्न औपचारिक, अनौपचारिक विचार विमर्श में नागरिकता, न्याय प्रणाली, निर्वाचन प्रणाली, शासकीय स्वरुप में चार प्रमुख शक्ति एमाओवादी, नेकपा एमाले, नेपाली कांग्रेस एवं संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा के बीच मोटा-मोटी सहमति बन गई थी। राज्य पर्ुनर्संरचना के सवाल पर संघीय इकाई अर्थात् प्रदेशों की संख्या, सीमांकन एवं नामांकन पर सहमति नहीं हो पाने के कारण संविधान का ऐलान नहीं हो सका और जेठ १४ को संविधानसभा का बैठक ही नहीं हो पाया। संविधानसभा का अवसान हुआ।
समाधान के उपायर्
वर्तमान गतिरोध के अन्त के लिए विभिन्न राजनीतिक पक्ष एवं गैर राजनीतिक पक्षों की अपनी-अपनी राय है। फिर भी महासभा का निष्कर्षइस प्रकार है ः
म    नए संविधान में पहचान सहित की संघीयता की गारेन्टी हो।
म    नया संविधानसभा से ही आवे, किसी अन्य मार्ग से आए संविधान मान्य नहीं होंगा।
म    नये चुनाव के लिए संविधानसभा की फिर से बहाली या नये संविधानसभा के निर्वाच के लिए सहमति।
म    संविधानसभा की पर्ुनर्बहाली पर सहमति बनती है तो जेठ १४ गते तक जिन विषयों पर सहमति बनी थी, उसे बरकरार रखते हुए सहमति नहीं जुटे विषयों पर सहमति बनाने के लिए पुनः विचार विमर्श शुरु हो।
म    राज्य पुनः संरचना सुझाव आयोग के द्वारा बहुमत से पारित प्रतिवेदन के आधार पर संघीय इकाइयों की संख्या, सीमांकन एवं नामांकन के लिए सहमति बनाई जाए।
म    सहमति नहीं बन पाने की अवस्था में फिलहाल राज्य पर्ुनर्संरचना सुझाव आयोग के बहुमत के प्रतिवेदन को प्रस्तावित संविधान का अंश बनाकर संविधान जारी कर उसी अनुसार संसद का निर्वाचन कराया जाए। निर्वाचन संसद से उक्त आयोग के प्रतिवेदन पर विचार विमर्श कराकर विवादों को तीन महीने के अन्दर मतदान प्रक्रिया से हूबहू अथवा सामान्य फेरबदल सहित पारित कराकर लागू किया जाए।
म    उपरोक्त बिन्दुओं में जिक्र हुए प्रक्रिया अर्न्तर्गत संघीयता के सम्बन्ध में निबटारा होने के बाद ही प्रदेशों का निर्वाचन तय हो।
म    उपरोक्त सहमति बन जाने की अवस्था सिर्जना होने पर मुल्क को नये संविधान पाने की संभावना भी बनेगी और वर्तमान गतिरोध का अन्त भी हो सकेगा। संविधान के विषयों पर सहमति बन जाने की अवस्था र्सवदलीय एवं र्सवपक्षीय सहमति अनुसार अल्प समय के लिए संविधानसभा की पर्ुनर्बहाली कर नयाँ संविधान की घोषणा हो सकती है। इस तरह सहमति बन जाने के बाद जेठ २ गते हुए पाँच सूत्रीय सहमति अनुसार नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में र्सवदलीय चुनावी सरकार गठन होना चाहिए और यथाशीघ्र संसद निर्वाचन में जाना चाहिए।
अन्त में उपरोक्त सभासदों के अनुसार सभी पक्ष एवं दलों के बीच सौहादर््रतापर्ूवक राजनीतिक गतिरोध के अन्त हेतु परिस्थिति का निर्माण नहीं हो सका तो अब इसके बाद पहचान सहित की संघीयता और संघीयता सहित का संविधान वार्ता से नहीं आ सकता। यह प्रमाणित हो जाएगा। ऐसी अवस्था में दूसरे संविधानसभा का निर्वाचन का विकल्प नहीं होगा। वैसी अवस्था में सम्पर्ूण्ा पहचान सहित के संघीयतावादी शक्तियों का संयुक्त मोर्चा बनाकर सडÞक आन्दोलन में जाना पडÞेÞगा। इस प्रकार के आन्दोलन के लिए सद्भावना पार्टर्ीीहित सत्ता में रहें सभी मधेशवादी एवं अन्य दलों को पहचान सहित के अधिकार सम्पन्न प्रदेश के निर्ण्र्ााके लिए सडÞक आन्दोलन सहित किसी भी तरह के त्याग के लिए तयार रहना होगा।

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