सद्भाव ’ना’ रहा पार्टी मे:
वीरेन्द्र के.एम.

<p> ये कोई अचानक और आर्श्चर्य वाली बात नहीं है ये आज नहीं तो कल होना ही था जिस तरह से पार्टी के नेताओं राजेन्द्र महतो और अनिल कुमार झा के बीच अहम की लर्डाई हो रही थी उसका नतीजा तो यही होना था पार्टी को पार्टी के तरह ना चलाने का खामियाजा राजेन्द्र महतो को चार सभासदों को खो कर भुगतना पडा तो राजनीति में अतिमहत्वाकांक्षा पाले झा को पार्टी से नष्कासित कर सभासद पद से भी हटाने की सिफारिश हो गई इस समय झा के लिए बहुत ही कठिन समय है जब तक कि उनके सभासद पद के बारे में कोई अन्तिम फैसला नहीं हो जाता हते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती इसी तरह पार्टी विभाजन में गलती हमेशा एक पक्ष की ही नहीं होती सद्भावना पार्टी के संसदीय दल में आए विभाजन की नींव में जाना ही होगा आखिर क्या कारण है कि जिस अनिल कुमार झा के ही कहने पर राजेन्द्र महतो पार्टी के सभी महत्वपर्ूण्ा निर्ण्र्ाालिया करते थे उन्हीं झा को अब पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए उन्हें हटा दिया अनिल झा के बारे में भी यही कहा जा सकत है कि आखिर्कार जिस महतो को उन्होंने पिछले दो दशकों से साथ देते आ रहे थे तो क्या एक मंत्री पद के लिए पार्टी में विभाजन लाने को उनकी राजनीतिक परिपक्वता कही जाएगी हतो और झा के बीच हुए रस्साकस्सी में पार्टी के कार्यकर्ता पिस रहे है संविधान सभा चुनाव के बाद से जिस तरह से आम जनता ने सद्भावना पार्टी के नाम पर महतो को मान्यता दी थी अब वह धीरे धीरे समाप्त होती नजर आ रही है वैसे भी इस देश में सद्भावना पार्टी में अब तक विभाजन का रिकार्ँड इतिहास रहा है स्व गजेन्द्र बाबू की आत्मा भी चित्कार करती होगी कि उन्होंने किन नालायकों के हाथों अपनी पार्टी, अपना सपना मधेश का मुद्दा सौंप कर चले गए उन्हें लग रहा होगा कि इससे अच्छा होता कि मरने से पहले पार्टी को विघटन ही कर देते खैर, सद्भावना पार्टी में विभाजन के लिए पार्टी का आम कार्यकर्ता हो या केन्द्र के बडे बडे नेता सभी इस विभाजन के लिए अनिल कुमार झा को उतना ही दोषी मानते हैं जितना कि राजेन्द्र महतो को पार्टर्ीीें विभाजन लाने के लिए निश्चित ही अनिल कुमार झा दोषी है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए लेकिन राजेन्द्र महतो को भी चाहिए कि पार्टी को अभी भी समेट कर एक अभिभावकत्व की भूमिका में रहे ना कि पार्टी को गलत हाथों में जाने दे अभी हाल ही में सम्पन्न सद्भावना पार्टी के राष्ट्रीय कार्यसमिति की विस्तारित बैठक में बोलने वाले अधिकांश नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष को इस बात की ओर सावधान किया कि अभी भी पार्टी में कई ऐसे नेता हैं जो कि शरीर से तो यहां उपस्थित हैं लेकिन उनकी आत्मा संघीय सद्भावना और अनिल झा से जुडी है पार्टी के अधिकांश नेताओं का दावा है कि सद्भावना में अभी भी दो ऐसे सभासद हैं जो कि अनिल झा के साथ मिलने को तैयार हैं उनमें एक तो गौरी महतो का नाम है तो दूसरा पार्टी में इस समय प्रमुख सचेतक रहे रामनरेश राय यादव का हालांकि यादव इस बात से साफ इंकार करते हैं लेकिन वो ये बात जरूर कह गए कि पार्टी में यदि आत्मसम्मान से सम्झौता करना पडा और पार्टी के भीतर सभासदों की कोई अहमियत नहीं रही तो हमारे लिए विकल्प भी खुला है पार्टी में आए विभाजन के लिए सचेतक यादव कहते हैं कि अनिल झा को पार्टी से अलग होकर नई पार्टी नहीं खोलनी चाहिए थी अगर वो थोडा धर्ैय के साथ पार्टी के भीतर ही रहकर संर्घष्ा करते तो पार्टी के अगले बदे नेता वही थे लेकिन उन्होंने जल्दबाजी की है अनिल कुमार झा पर पार्टी के कई नेता कई आरोप लगाते हैं जैसे कि उनका अहम पार्टी के सभासद तक भी फोन नहीं उठाने वाले पार्टी महासचिव रहे झा के प्रति नेताओं और कार्यकर्ताओं में काफी रोष भी था उनका अहम, कार्यकर्ताओं से दूरी बनाना, सिर्फएनजीओ और आईएनजीओ के कामों में खुद को व्यस्त रखते थे लेकिन झापर लगे इन आरोपों का वो खण्डन करते हैं विभाजन की घोषणा के बाद तमाम मीडिया से बात करते हुए झा ने महतो पर ही आर्थिक अपारदर्शिता रखने का आरोप लगाया है जो कि खुद उनके पार्टी के कार्यकर्ता कभी झा पर ही लगाया करते थे संघीय सद्भावना पार्टी के सह महासचिव बनाए गए चंदन सिंह का कहना है कि महतो पार्टी को समेट कर जाने में असफल रहे उन्होंने अपने निकट के लोगों का बढावा दिया और पार्टी से वर्षें से जुडे अपना जीवन पार्ति के नाम पर दांव पर लगा दिए कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा की गई पार्टी के दूसरे सह महासचिव बनाए गए शिव पटेल कहते हैं कि हमने लाख कोशिश की लेकिन हमारा सुनने वाला कोई नहीं था पार्टी में जबकि सद्भावना की राजनीति करते करते एक अरशा गुजर गया और पार्टी में ना तो उचित सम्मान मिला और ना ही कोई सम्मानजनक पद सत्ता में जाने के लिए और मंत्री बनने के लिए सद्भावना का भी विभाजन हुआ है यह तर्क आम लोगों के साथ ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी देते हैं सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने झलनाथ खनाल और उपेन्द्र यादव पर पार्टी में विभाजन लाने का आरोप लगाया महतो का कहना है कि वाणिज्य तथा आपर्ूर्ति मंत्री बनाने का लालच देकर उपेन्द्र यादव ने उनकी पार्टी में विभाजन करवाया है लेकिन झा अपने उपर लगाए गए इस आरोप को स्वीकार नहीं करते वो कहते हैं कि बहुत ही मजबूरी में और भारी मन से पार्टी से अलग होने का निर्ण्र्ाालिया गया है संघीय सद्भावना के सह महासचिव चंदन सिंह का कहना है कि कौन चाहता है कि जिस घर में उसका जन्म हो और सारी जवानी लगा दी जाए उसी घर से अलग होने का कष्ट क्या होता है ये हम अच्छी तरह जानते हैं लेकिन हमारे साथ पार्टी में जिस तरह का व्यवहार किया जाता था उससे हमें अलग होने पर मजबूर किया है अनिल कुमार झा चाहे पार्टर्ीीें विभाजन के लिए लाख दलीलें दे लेकिन पार्टर्ीीें विभाजन के लिए दोषी तो वो बन ही गए हैं चाहे वो कितना भी तर्क दे मधेशी नेताओं की जो छवि जनता के सामने बनी है उससे वो सत्ता के लिए पार्टी में विभाजन लाए जाने की बात को नकार नहीं सकते हैं पार्टी में विभाजन लाना बहुत ही आसान है लेकिन उसको चलाना काफी मुश्किल अभी तो झा के सामने कई चुनौतियां है पहला तो उन्हें अपना पद सुरक्षित रखना है और दूसरा पार्टी को एक ऊंचाई देनी है जिन सभासदों के बल पर झा ने पार्टी में विभाजन लाया है उनको अपने साथ जोडे रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं है िि ि

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