सन्तनेता को श्रद्धान्जली

कुमार सच्चिदानन्द

कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई अब हमारे बीच नहीं रही । जीवन के साथ मृत्यु तो प्रकृति का शाश्वत नियम है । इसलिए श्री भट्टर्राई का इस धरती पर, इस देश की जनता की सेवा के लिए ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ की तर्ज पर आगमन जितना ही सत्य था, इस धरा-धाम से प्रस्थान भी उतना ही सत्य था । जिस स्वास्थ्य स्थिति से वे गुजर रहे थे, उसे ध्यान में रखते हुए उनका यह प्रयाण आकस्मिक भी नहीं था । चूँकि वे सक्रिय राजनीति में नहीं थे, इसलिए राष्ट्र की मौजूद राजनीति पर उनके देहवासन का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पडता दिखलाई नहीं देता है । लेकिन इतना तो सच है कि तिकडम का पर्याय बन चुकी मौजूदा राजनीति में मूल्यों का मिश्रण कर एक तरह से कबीर की शब्दावली में ‘ज्यो की त्यों धर दीनी, चदरिया भीनी रे भीनी’ के दर्शन को चरितार्थ किया और अपर्रि्रह की नीति पर चलते हुए बुद्ध और गांधी के चिन्तन को आत्मसात कर राष्ट्र के समक्ष एक अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत किया यही कारण है कि उनके निधन से आज पूरा राष्ट्र शोकमग्न है और मर्माहत भी ।
कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई जो नेपाली राजनीति में किशुन जी के नाम से लोकप्रिय रहे हैं । आज राजनीतिज्ञों की मौजूद पीÞढी में राजनैतिक लफ्फाजी और खोखले शब्दों की बाजीगरी का दौडÞ चल रहे हैं, उसमें नेपाली राजनीति के इस महासन्त का मानना था कि राजनीतिक दर्शन से मात्र देश का विकास और आधारभूत मानव अधिकार की प्रत्याभूति सम्भव नहीं है । इसके लिए त्याग, तपस्या, र्समर्पण और प्रतिबद्धता उतना ही आवश्यक है । त्याग और र्समर्पण के व्यवहार में उतारने के प्रयास करने वाले भट्टर्राई नेपाली राजनीति का विरला और निष्कलंक नेता थे । प्रजातन्त्र की पर्ुनर्बहाली के बाद जितने भी प्रधानमंत्री हुए, प्रायः आर्थिक विवाद में पडेÞ । लेकिन भट्टर्राई ने अपने व्यक्तित्व में कोई दाग नहीं लगने दिया और अपनी स्वच्छ छवि को सुरक्षित रखा । यही कारण है कि आज र्समर्थन और विरोध उनके व्यक्तित्व की इस स्वच्छ आभा से अभिभूत हैं ।
किशुन जी को नजदीक से जानने वाले प्रायः हर व्यक्ति मानते हैं किर् इश्वर के प्रति उनमें घनीभूत आस्था थी । श्रीमद्भागवत् का पाठ उनकी दिनचर्या का नियमित अंग था । यही आस्था और आध्यात्मिकता ने उनके राजनैतिक चिन्तन का संस्कार किया और एक कर्मयोगी के रुप में वे राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत हुए और कमल की पंखुडियो पर पडेÞ ओस की बूँदो की तरह वीराग रह कर राष्ट्र की सेवा की । आज वैज्ञानिकता, तार्किकता और वैयक्तिठीक की प्रवृति के कारण जब हमारी राजनीति दिग्भ्रमित नजर आ रही है । ऐसे में भट्टर्राई की आध्यात्मिक चेतना से संस्कृत एवं नियंत्रित राजनीति राष्ट्र के लिए न केवल उदाहरणीय है, बल्कि आदर्श भी है और अनुकरणीय भी ।
आज हमारी राजनीति में व्याप्त आस्था, धर्म आदि के घटते स्तर के कारण ही दिशाहीनता की स्थिति की सृजना हर्ुइ है । ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई’ की मूल संवेदना को हमारे नेताओं ने छोडÞ दिया है । इसलिए आमलोग सम्पूर््ण्ा राष्ट्र में ही एक अदद जन नेता का र्सवथा अभाव महसूस कर रहे हैं । वास्तव में धर्म युगों-युगों से सत्यापित नियम है जो हमारे संस्कारों में बसा होता है और नहीं भी । व्यक्तिक्रम आने पर भले हम तर्काें द्वारा स्वयं को सही ठहराने का प्रयास करते लेकिन लहू व्रि्रोह कर हमें अपनी गलती का एहसास कराता है । अगर हम वैज्ञानिकता के आग्रह के कारण वह भी दे किर् इश्वर की सत्ता नहीं तो भी उनके प्रति आस्था हमें सुःख-दुःख में सहज रहने का मार्ग देता है और निराशा के अबसाद और विजय के उन्माद से बचने की सीख देती है । यही अन्तरज्ञान श्री भट्टर्राई को दुःख और निराशा में अपनों के हाथ अन्तर्घर्ाामें विचलित नहीं होने दिया और एक सन्त की तरह अपना जीवन व्यतीत किया ।
किशुन जी की विनोद प्रियता के सम्बंधों में अनेक तरह की गाथाएँ उभर कर सामने आती रही है जैसे- ‘विवाहित नहीं लेकिन कुँवारा भी नहीं’, मदिरा के लिए निर्वाचित होने की बात, शारीरक रुप से पर्ूण्ा शिथिल होने के बावजूद प्रधानमंत्री बनने की इच्छा अभिव्यक्त करना आदि । उन्हें सामान्य रुप से मजाक ही समझा गया लेकिन इसमें भी कहीं न कहीं उनका आइने की तरह साफ व्यक्तित्व को र्सवसमक्ष उद्घाटित कर देने की उनकी विशिष्ट क्षमता का बोध होता है । लेकिन आपनी इस विनोद प्रियता और ठिठोली के कारण उन्होंने एक ओर स्वयं को भी सहज रखा दूसरी ओर दलों में आन्तरिक आदर्श और मूल्यों का ह्रास, नेताओं में बढÞता हुआ व्यक्तिवादी चिन्तन, लोभ-लालच, पदलोलुपता और अपने मित्रों की नीचता, कपट तथा अपने अनुयायियों की संकर्ीण्ाता और पदलोलुपता पर भी उन्होंने कटाक्ष किया ।
संवत् २०६३ के बाद किशनुजी अपनी अनेक अभिव्यक्तियों के कारण विवादों में रहे और आलोचकों ने तो यहाँ तक कह दिया कि इस तरह की अभिव्यक्तियों से उन्होंने अपने शवयात्र में शामिल हाने वालों की संख्या घटा ली है । ऐसा कहने वालों में नागरिक समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी और राजनीतिकर्मी भी थे । उनकी यह घोषणा कितनी खोखली थी इसका अनुमान २२ गते फाल्गुन को हर्ुइ उनकी शव यात्रा में उमडÞी भीडÞ और असंख्य जनसैलाब को देखकर किया जा सकता है । किशुन जी के निधन के बाद उनके प्रति र्सवसाधारण का प्रेम, सद्भाव, आस्था, विश्वास का विश्लेषण किया जाए तो यह बात सहज ही उभर कर सामने आती है कि वास्तव में नेपाली जनता अपने नेतृत्व वर्ग से क्या चाहती है और उसे क्या मिल रहा है ।
राजनीति धन कमाने और सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, यह तो देश और जनता की सेवा करने का उच्चतम मार्ग है । यह समाज को दिशा निर्देश करने वाला मार्ग है और इस मार्ग पर चलने वाले लोगों को आदर्श और निष्ठा के प्रति सचेत रहना चाहिए । इस बात का भी संदेश श्री भट्टर्राई के जीवन और कर्म से लिया जा सकता है । बात तो निश्चित है कि आदर्श और निष्ठा की दृष्टि से बंजर हो चुकी नेपाली राजनीति की बात हम छोडÞ भी दें तो राजनीति में इन तत्वों के महत्व को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस छिडÞ चुका है और आम लोगों ने एक तरह से यह संदेश भी दे दिया है कि हमारी राजनीति में मूल्यों की चाहे कितनी भी कमी हो लेकिन जनता की नजर में इन मूल्यों का अवमूल्यन नहीं हुआ है ।
कहा जाता है कि चिन्तन की व्यापकता रखने वाले लोग जब अपनी अभिव्यक्तियाँ देते हैं तो उसे संकर्ीण्ा और प्रचलित सोच के ढाँचे में नहीं मूल्यांकन किया जा सकता । उनकी अभिव्यक्तियाँ तो कभी कभी शताब्दियों बाद भी फलित होती है । ऐसे ही राजनैतिक चिन्तक थे- कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई । आश्विन २०६४ में कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई ने नेपाली कांग्रेस छोडÞने की घोषणा की । कारण यह बतलाया गया कि नेपाली कांग्रेस ने संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय प्रजातंत्र की राह छोडÞी, उस समय अभिव्यक्त उनके इस दृष्टिकोण को एक बूढेÞ व्यक्ति का बकवास समझा गया और कांग्रेसियों ने भी इसे गम्भीरता से नहीं लिया । जिस राजनेता ने एक पार्टर्ीीो जन्म दिया, जेल की यातना सही और जीवन के हसीन लम्हों को भी जिसने कर्ुबान कर दिया । संतानवत् उस पार्टर्ीीो छोडÞने का निर्ण्र्ााकितना त्रासद हो सकता है, यह बात कल्पना ही की जा सकती है । जिस गणतंत्र के उन्माद में राष्ट्र ने किशनुजी की बातों को गम्भीरता से नहीं लिया, पर आज सवाल उठाया जा सकता है कि वह गणतंत्र किस दिशा में जा रही है- लक्ष्यविहीन संविधान सभा, लुंज-पुंज सरकार और सिद्धान्त विहीन गठबंधन । सरकार आज जैसा ही सही, बन तो चुकी लेकिन आज सत्ता में सहभागिता दे रहे प्रमुख दल के सभासदों द्वारा ‘उदार अर्थव्यवस्था’ के मार्ग से पीछे हटकर ‘आर्थिक उदारीकरण’ शब्द हटाने ‘स्वाधीन मिश्रति अर्थव्यवस्था’ रखने का जो प्रस्ताव आया है, उससे संकेत रुप में राष्ट्र किस लोकतंत्र की ओर जा रहा है, यह चिन्ततीय है और ऐसे में श्री भट्टर्राई के कथन की प्रासंगिकता से भी मूंह नहीं मोडÞा जा सकता ।
निश्चय ही महान् व्यक्तित्व को शब्दों में समेटना असम्भव होता है । श्री भट्टर्राई का जीवन एवं चिन्तन राजनीतिशास्त्र के शोध का विषय हो सकता है । लेकिन उतना तो कहा ही जा सकता है कि उनका जीवन और चिन्तन बहुआयामी था, उनका त्याग और र्समर्पण अनुकरणीय है और उनका आदर्श और निष्ठा उदाहरणीय है । यही कारण है कि र्समर्थक विरोधी सभी आज उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं । राष्ट्र उनके जैसे निष्ठावान और समर्पित राजनीतिकर्मी का अभाव महसूस कर रहा है ऐसे महामानव को ‘हिमालिनी’ परिवार की ओर से हार्दिक श्रद्धांजली ।
mmm

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