सन् १९५० की सन्धि पुनरावलोकन का सवाल

बाबुराम पौड्याल:पिछले अगस्त माह में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जब नेपाल के दौरे पर आए तो नेपाल ने अन्य कई प्रस्तावों के साथ सन् १९५० जुलाई ३१ तारीख के दिन दोनों देशों के बीच काठमांडू में सम्पन्न शान्ति और मैत्री सन्धि पुनरावलोकन का प्रस्ताव भी रखा । सूत्रों के मुताबिक इस मसले पर मोदी ने नेपाली पक्ष को कुछ कडÞे अन्दाज में सन्धि को लेकर राजनीति न करने की सलाह तक दे डाली । तकरीबन पैंसठ साल पुराने इस संन्धि को नेपाल में शुरु से ही र्सवाधिक विवादित और बद्नाम माना जाता रहा है । मोदी का संकेत संभवतः इसी ओर था । नेपाल की ओर से यह प्रस्ताव इससे भी पहले कई बार रखा जा चुका है । नेपाल की पहली कम्युनिष्ट सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी ने पहली बार औपचारिक तौर पर भारत के समक्ष इस प्रस्ताव को रखा था । सन् १९९९ में नेपाल के दौरे पर आए भारतीय विदेशमंत्री जसवन्त सिंह के समक्ष भी इस मुद्दें पर बातचीत हर्ुइ थी । उसके बाद माओवादी सरकार के समय में भी इस मसले को भारत के समक्ष रखा गया था । परन्तु हर बार भारत की ओर से दोनों पक्ष बैठ कर होमवर्क करने की आवश्यकता बता कर टाल दिया जाता रहा है । प्रस्तावकर्त्तर्ााेपाल की ओर से भी कभी सन्धि की समीक्षा के साथ टेबिल पर बैठने का काम नहीं किया गया । वैसे सन्धि में ही किसी एक पक्ष द्वारा एक साल पहले दूसरे पक्ष को सूचित करने पर सन्धि की खारेजी का प्रावधान है । नेपाल-भारत जैसे भौगोलिक और सांस्कृतिक रूपसे विशिष्ट सम्बन्धवाले देशों के वीच विद्यमान इस सन्धि की खारेजी से उत्पन्न होनेवाला खालीपन दोनों ही देश के लिए घातक होने में दो राय नही हैं । शायद इसीलिए सडÞक पर खारेजी के  दमदार नारे लगानेवाले सियासी ताकत भी सत्ता के आसपास पहुंचते ही सन्धि पुनरावलोकन की बात करने लगते दिखाई देते हैं । जो भी हो मसले को उठाना और आश्वासन देने के अलावा इस पर अब तक कोई खास प्रगति नही हो रही है ।
नेपाल में तत्कालीन परिवारवादी निरंकुश राणा सरकार के बाद प्रजातंत्र, पंचायत फिर बहुदलीय प्रजातंत्र और अब संघीय लोकतंत्र के कुल चार चरणों में राजनीतिक परिवर्तन हो चुके हैं । इस बीच भारत की सत्ता की गलियारों मे काफी कुछ बदलाव आ चुके है, गंगा और ब्रम्हपूत्र नदियों में भी काफी पानी बह चुका है । ऐसे में दोनों को साथ बैठकर सलाह मशविरा करना नितान्त आवश्यक प्रतीत होने लगा है । परन्तु ऐसा नहीं हो रहा है । इस स्थिति से शंका पैदा होने लगा है कि कहीं काम को एक ओर छोडÞ सिर्फप्रचार पाने का चक्कर तो नहीं चल रहा है । अगर यही सच है तो इसे कूटनीति और राजनीति दोनों का यह एक भद्दा मजाक ही कहा जाएगा ।
सन्धि की आवश्यकताः आज भी कई लोग मानते हैं कि शान्ति और मैत्री के नाम पर की गई १९५० की यह संधि नवस्वाधीन भारत की ओर से नेपाल पर दवाव डालकर करवाई गई थी । कुछ का तो यह भी कहना है कि राणा प्रधानमंत्री मोहन शमसेर ने देश में बढÞते राणा विरोधी आन्दोलन से अपनी सत्ता बचाने के लिए इस सन्धि पर हस्ताक्षर की थी । जाहिर है उस समय भारत, नेपाल में राणा विरोधी नरेश त्रिभुवन और नेपाली कांग्रेस जैसे ताकतों को र्समर्थन कर रहा था । मोहन शमसेर भारत को खुश रखना चाहते थे इसलिए भारत के प्रस्ताव पर ही संन्धि किया गया । बताया जाता है कि संधि पर हस्ताक्षर के पश्चात् मोहन शमसेर इतने खुश थे कि उन्होंने लोगों में मिर्ठाईयां बांटी थी । ऐसा तो कहीं पता नहीं चलता है कि भारत ने उन्हें संन्धि के बदले नेपाल की सत्ता पर बनाए रखने की हिदायत दी थी । दिल्ली ने संधि हो जाने के बाद भी आन्दोलनकारियों को र्समर्थन देना बन्द भी नहीं किया तो मोहन शमसेर की खुशी का राज क्या हो सकता था – या फिर उनकी खुशी चन्द महीने बाद आन्दोलनकारी और राणाओं की संयुक्त अन्तरिम सरकार के प्रधानमंत्री बनने के बाद निराशा में बदल गई थी, यकीनन कहना कठिन है ।
अंग्रेजों के चले जाने के बाद आजाद भारत को उसके स्वतन्त्र पडÞोसी देश नेपाल के साथ सम्बन्धों को नये रूप में परिभाषित करना आवश्यक हो गया  था । सन्धि होने के पहले १७ मार्च १९५० भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने राज्यसभा में बोलते हुये कहा कि नेपाल पर कहीं से भी होनेवाले बाहरी आक्रमण को भारत द्वारा सहन नहीं किया जायेगा । मोहन शमशेर के साथ कुछ समय पहले हर्ुइ मुलाकात को सकारात्मक रूप में स्मरण करते हुए उन्होने आगे यह भी कहा कि इसके लिए नेपाल के साथ कोई सैनिक गठबन्धन की जरूरत नहीं है । भारत की साम्यवादी पार्टर्ीीे कुछ कामरेडों ने तो सन् १९४८ में अंगे्रज से आजाद दार्जीलिङ, सिक्किम, भाक्सु, देहरादून के साथ सामन्तवादी शासनवाले नेपाल को मिलाकर भारत के अन्दर ही गोर्खास्तान राज्य बनाने की मांग की थी । सरदार पटेल ने १९५० की भारत और नेपाल बीच सम्पन्न इस शान्ति और मैत्री सन्धि के बाद नोभेम्वर माह में नेहरु को खत लिखकर उत्तरी फ्रन्टियर भौगोलिक और जातीय आदि दृष्टिकोण से भारत के लिए बेहद संवेदनशील हो सकने की बात बता दी थी । इन सभी घटनाक्रमों से पता चलता है कि भारत उत्तर की ओर की सुरक्षा पर विषेश रुप से र्सतर्क रहना चाहता थ्ाा । इन्ही सोचों के बीच विशेष कर चीन को ताक पर रखकर ही भारत ने उत्तर में हिमालय तक अपने सुरक्षा प्रभाव को बरकरार रखते हुये उसके अन्दर नेपाल को भी स्वतन्त्र मानने की नीति तय की ।
सन् १९५० की सन्धि के आठवें दफे में नेपाल और भारत स्थित अंग्रेज सरकार के बीच हुये सभी सन्धि सम्झौतों की खारेजी का उल्लेख किया गया है । यह नेपाल के साथ भारत के सम्बन्धों का परिवर्तित सर्न्दर्भ में नवीकरण था । दूसरी बात नेपाल और भारत दोनों के लिए संधि करना आवश्यक इसलिए हो गया था कि हिमालय के उस पार तिब्बत में साम्यवादी चीन की नजरें टिकी हर्ुइ थीं । उस समय दक्षिण एशिया की सभी सरकारों में जबरजस्त साम्यवादी त्रास का माहौल बना हुआ था । यही त्रास सन्धि के लिए प्रमुख कारण बना । भारत नेपाल को अपने प्रभाव में रखते हुये इसे चीन के खिलाफ एक बफर जोन के रूप में प्रयोग करना चाहता था तो नेपाल एक ओर भारत को खुश रखते हुये नेपाल में संभावित सत्ता विरोधी आन्दोलन और उत्तर में चीन के बढÞते प्रभाव से एक साथ बचना चाहता था । राणाओं के खिलाफ नेपाल में आन्दोलन कर रही प्रमुख राजनीतिक पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस ने भी इस सन्धि का विरोध नहीं किया । नेपाल की साम्यवादी खेमे को शुरु से ही संभवतः इसलिए भी यह सन्धि पसन्द नहीं थी कि यह भारत के आयोजन में चीन के खिलाफ एक गठजोड था । ब्रिटेन और कई पश्चिम के देश जिनका नेपाल के साथ सम्बन्ध था, उन्होंने भी चीन के खिलाफ लक्षित हाने के कारण सन्धि के पक्ष में मौन र्समर्थन किया । भारत तो अपनी इस रणनीति पर बहुत हद तक सफल दिखाई दिया परन्तु मोहन शमशेर न तो आन्दोलन के कोपभाजन बनने से बच पाये न ही नेपाल के प्रति चीन ने बाद वाले दिनो में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने का काम किया । चीन, नेपाल में शालीन दिखनेवाली नीति के जरिये प्रभाव विस्तार करने में सफल रहा । उस की यही रणनीति आजतक जारी है ।
सन्धि की व्यावहारिकता
र्सवाधिक विवादित इस सन्धि की सबसे महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि इसकी शुरुआत ही नेपाल भारत दोनों देश एक दूसरे की पर्ूण्ा र्सार्वभौमता, भौगोलिक अखण्डता और स्वतन्त्रता को सम्मान करने की प्रतिबद्धता के साथ होता है । आजाद भारत और नेपाल के बीच इस प्रतिबद्धता ने एक सकारात्मक और नये आयाम की ओर संकेत किया है । परन्तु इस अच्छे प्रस्थापना के आधार पर भी दोनांे देशों के बीच के सम्बन्धों में विश्वास का अभाव महसूस किया जाता रहा है । दोनों देशों के बीच विना किसी समाधान के सीमा पर लम्बे अरसे से चल रहे विवाद जैसे मसलों ने स्थिति को असहज सा बना दिया है ।
सन्धि में किसी भी पडÞोसी देश के साथ हर्ुइ विवाद और असमझदारी से दोनों देश के सम्बन्धो में दरार आने की संभावना के लिए एक दूसरे को सूचित करने का प्रावधान है । इससे अधिक सन्धि के अतिरिक्त पत्र में दोनों में से किसी भी देश पर बाहरी आक्रमण को बर्दास्त नहीं करने और ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए आपस में मशविरा कर कदम उठाने की बात कही गई है । यह बात दोनों र्सार्वभौम देशों को एक सैनिक गठजोडÞ की ओर संकेत करता है । असल में ऐसा कभी नहीं हुआ । भारत एक बार चीन और दो बार पाकिस्तान के विपक्ष में युद्ध कर चुका है । सन्धि के आशय पर गौर करें तो भारत को नेपाल के साथ परामर्श करना था और नेपाल को सेना भेजकर भारत को साथ देना चाहिए, जो बिल्कुल व्यावहारिक बात नहीं थी । दोनों सरकारों मंे उस समय इस मसले पर खिचडÞी पकी या नहीं कुछ कह पाना मुश्किल है । फिर भी कहा जा सकता है कि नेपाल अब तक भारत की सुरक्षा अवधारणा की परिसीमा से बाहर निकल कर अन्य देशों के साथ सम्बन्धों का विकास कर चुका था । या फिर यह भी हो सकता है कि भारत ने सन्धि के नाम पर नेपाल जैसा छोटा देश जो चीन के साथ भी अच्छे सम्बन्धों का आकांक्षी हो गया था, उसके साथ सलाह करना आवश्यक नहीं समझा । दोनों निकट पडÞोसी होते हुए भी विश्वास के आधार पर कुछ नकारात्मक असर जरूर पडÞने लगा था ।
सन्धि में कहा गया है कि नेपाल अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक अस्त्र शस्त्र और युद्ध सामग्री भारत से होकर लाने को स्वतन्त्र है । इस प्रक्रिया के प्रभावकारी प्रबन्धन के लिए दोनों मिलकर काम करेंगे । बाद के दिनों में नेपाल के लिए ऐसे अस्त्र शस्त्र भारत से ही नहीं चीन से भी आने लगे । हिमालय तक की भारतीय सुरक्षा क्षेत्र की अवधारणा के लिए नेपाल का यह कदम भारत के लिए चिन्ता का विषय थ्ाा । इस के अलावा नेपाल ने शान्ति क्षेत्र का प्रस्ताव रखा दुनिया के तकरीवन डेढÞ सौ देशों ने इसका र्समर्थन किया परन्तु भारत ने इसे कभी र्समर्थन नहीं किया । भारत का मानना था कि नेपाल इस प्रस्तााव के जरिए भारत के साथ्ा रणनीतिक कार्ड खेल रहा है । तबतक नेपाल भारत का ही नहीं चीन अमरिका और बेलायत जैसे देशों के लिए भी रणनीतिक स्थल बन चुका थ्ाा ।
सन्धि के अनुसार एक दूसरे देश पारस्परिकता के आधार पर एक देश के नागरिक को दूसरे देश में रहने, सम्पत्ति आर्जन करने,व्यापार कारोवार और आवाजाही को मंजूर करते हैं । लेकिन अतिरिक्त पत्र में कुछ समय के लिए नेपालियों को नेपाल में असीमित प्रतिस्पर्धा से संरक्षण करने का उल्लेख है । इसका मतलव नेपाली नागरिकों को भारत में प्राप्त उल्लेखित सुविधाएं भारतीय नागरिकों को नेपाल में प्राप्त नहीं होंगे । कुछ लोग इसे उचित मानते हैं तो कुछ इसे अनुचित मानते हैं । सत्तर और अस्सी के दशक में दोनों देशों ने पडÞोसी नागरिकों पर जिस तरह गैरकानूनी विदेशी करार देते हुए कुछेक स्थानों पर अपनी जमीन से निकाल बाहर किया गया उससे दोनो सरकारों के सदियांे पुराने और महान मित्रता का मिथक का कुरूप चेहरा सामने आया । काठमांडू से वर्क परमिट के नाम पर कई भारतीय मजदूरों को बाहर किया गया तो भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से कई नेपालियों को खदेडÞा गया था । इस भूखण्ड के लोगों का स्वतन्त्र विचरण देशों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले से ही होता आ रहा है । उपनिवेशवादी अंग्रेजांे ने भी इसपर अंकुश लगाना मुनासिब नहीं समझा था ।
१९५० की इस सन्धि का प्रमुख उद्देश्य सुरक्षा की चिन्ता थी, जिसके स्वरूप में  अब भारी बदलाव आ चुका है । फलस्वरुप इसेे दोनों देशों ने कभी भी मित्रता और विश्वास का धरोहर नहीं माना और सिर्फएक रणनीतिक हथ्ाकंडे के रूप में इस्तेमाल करना चाहा । असल में यह अब एक कागजी घोडे के रूप में अस्तित्ववान है । नेपाल भारत संम्बन्ध ऐसे ही आउट डेटेडÞ और जर्ीण्ा कागजातों के बल पर जबरजस्ती आगे बढÞाने की सोच्ा कई कठिनाईयों को न्यौता देती रहेगी ।
सुरक्षा की चिन्ता अब चीन और भारत का अकेला सवाल नहीं रहा । बदलते समय के साथ अपराध और आतंक का भी वैश्वीकरण हो चुका है । भारत कई बार कह चुका है कि नेपाली भूमि पर भारत के खिलाफ विदेशी ऐजेन्सियां और भारत विरोधी आतंकवादी सक्रिय हैं । उसी तरह भारतीय भूमि से ही नेपाल में माओवादियों ने एक दशक से भी अधिक समय तक खूनी संर्घष्ा संचालन किया । अब शीतयुद्धकालीन सामरिक राष्ट्रवाद की जगह बदलते समय के साथ आर्थिक राष्ट्रवाद ने लेना शुरु किया है । इस नई सोच के प्रति सकारात्मक होना नेपाल भारत जैसे देशों के हित में है । सन् १९५० की भारत नेपाल शान्ति और मैत्री सन्धि को लेकर अब बहस करने के अलावा बदलते समय के प्रवाह में इसे पुनरावलेाकन व संशोधन करना दोनों के हित में होगा ।

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