सपने न हुए अपने

नेपाली में एक गीत का बोल है- ‘उडायो सपना सबै हुरीले’ । अर्थात् सारे सपने हवा उडÞा कर ले गई । कुछ ऐसा ही महसूस कर रहें है हमारे नेतागण । प्रसंग है- पिछले महीने सर्वोच्च अदालत द्वारा किया गया एक फैसला । संविधानसभा में २६ सभासद् मनोनयन सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर सर्वोच्च द्वारा किया गया उक्त फैसले ने बहुत सारे नेताओ को सभासद् बनने का सपना चकनाचूर कर दिया । प्रत्यक्ष तथा समानुपातिक दोनों प्रक्रिया से सभासद् बनने में असफल रहे कुछ चर्चित नेतागण पार्टर्ीीे कोटा से मनोनित होना चाहते थे । अर्थात् पिछले दरवाजे से घुसना चाहते थे । पहली संविधानसभा में भी ऐसा ही हुआ था । राष्ट्रीय व्यक्तित्व के लिए निर्धारित इस कोटे में चुनाव में पराजित पार्टर्ीीे नेता, कार्यकर्ता, प्रमुख नेताओं की प्रेमी-प्रेमिका तथा नातेदारों को अब तक अवसर प्राप्त हो रहा था । लेकिन सर्वोच्च अदालत ने गत वैशाख २९ गते जो फैसला किया, इसके चलते अब राजनीतिक दल ऐसा नहीं कर पाएंगे । लेकिन दर्ुभाग्य की बात तो यह है कि सर्वोच्च के उक्त फैसला के विरुद्ध राजनीतिक दलों ने सरकार की तरफ से पुनरावलोकन रिट दर्ता कराया है । पुनरावेदन में कहा गया है कि उक्त फैसला सर्वोच्च के क्षेत्राधिकार बाहर से आया है ।
किसी भी क्षेत्र से राष्ट्र को महत्वपर्ूण्ा योगदान प्रदान करने वाले विशिष्ट व्यक्ति, नयाँ संविधान निर्माण के लिए महत्वपर्ूण्ा हो सकते हैं । इसी बात को मद्देनजर करते हुए संविधानविदों ने इस प्रावधान को संविधान में ही व्यवस्थित कर दिया था । अन्तरिम संविधान की धारा ६३ की उपधारा ३ -ग) की भावना है कि राष्ट्रीय जीवन में महत्वपर्ूण्ा योगदान देने वाले विशिष्ट व्यक्ति, प्रत्यक्ष तथा समानुपातिक निर्वाचन से बञ्चित आदिवासी, जनजाति तथा कोई वर्ग विशेष समुदाय में से सहमति के आधार में मन्त्रिपरिषद द्वारा २६ व्यक्ति का मनोनयन होना चाहिए । लेकिन इस व्यवस्था का फायदा उठाते हुए राजनीतिक दलों ने आपस में मिल कर २६ सीट का भी बंटवारा किया गया था । जिसके कारण उन लागों के प्रति जनआक्रोश बढÞते जा रहा था । राजनीतिक दलों के बीच सहमति भी हो चुकी थी कि राष्ट्रीय व्यक्तित्व के लिए सुरक्षित उक्त २६ सीट में से नेपाली कांग्रेस को ९, एमाले को ८, एमाओवादी को ४ और बाँकी अन्य छोटे दलों के लिए ५ सीट रखी गई ।
इस योजना को असफल बनाने में स्वयं राजनीतिक दल ही जिम्मेवार हैं । अन्तरिम संविधान, २०६३ की भावना अनुसार निर्वाचन सम्पन्न होने के बाद होने वाली पहली व्यवस्थापिका संसद बैठक से पहले ही २६ सभासदों का मनोनयन हो जाना चाहिए था । लेकिन राजनीतिक दलों के भीतर ही इस बारे में सहमति नहीं हो सकने के कारण मनोनयन में अनावश्यक विलम्ब हुआ । जिस की मार में स्वयं राजनीतिक दल तथा उन के नेतागण पडÞे हैं । सर्वोच्च अदालत द्वारा हुए फैसले के बाद नेतागण द्वारा हर्ुइ र्सार्वजनिक अभिव्यक्ति इस बात को पुष्टि करती है । अभी बहुत सारे नेतागण बता रहे हंै कि प्रधानमन्त्री सुस्त होने के कारण तथा सरकार द्वारा प्रभावकारी कार्य सम्पादन नहीं हो पाने के कारण वे लोग सभासद् नहीं बन पाए हैं । ऐसे नेतागण प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला तथा अपने पार्टर्ीीध्यक्ष को भला-बुरा कह रहे हैं ।
इस तरह पीडिÞत होने वालों में नेपाली कांग्रेस से दीपकुमार उपाध्याय, आमोदप्रसाद उपाध्याय, सुरेन्द्रराज पाण्डे, डिला संग्रौला, हरिहर विरही, दिलेन्द्रप्रसाद बडू लगायत के नेतागण हैं । यह सभी नेता कांग्रेस को प्राप्त ९ सीटों में से संविधानसभा में प्रवेश करना चाहते थे । अभी उन लागों का कहना है- प्रधानमन्त्री की ढिलाई और सुस्ती के कारण ही प्राप्त अवसर गुम गया है । इसी तरह नेकपा एमाले से पार्टर्ीीहासचिवर् इश्वर पोखरेल प्रदीप नेपाल, मुकुन्द न्यौपाने आदि नेता भी इस मार में पडÞे हैं । इसी तरह एमाओवादी से नारायणकाजी श्रेष्ठ, पोष्टबहादुर बोगटी और वर्षान पुन आदि नेतागण भी पार्टर्ीीो प्राप्त ४ सीटों में से सभासद् बनना चाहते थे । इस के लिए पार्टर्ीीेडक्वाटर के साथ वे सभी सर्म्पर्क में थे । २६ सीटों में से मधेशी दल के लिए दो सीट सुरक्षित था । उस में महन्थ ठाकुर का सभासद् बनना लगभग निश्चित था । इसी तरह राजेन्द्र महतो, हृदयेश त्रिपाठी आदि नेतागण भी उसी कोटे में से संविधानसभा में पहुँचने का सपना संजोए हुए थे । सर्वोच्च अदालत के फैसले ने इनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है । ऐसे ही पीडिÞत में से दूसरे नेता हंै- राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीे पशुपति शमशेर राणा । वह भी कुछ छोटे दलों को प्राप्त सीटों में से संविधानसभा सदस्य बनना चाहते थे । इस के लिए राणा ने प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला तथा अन्य छोटे दलों के साथ बातचीत भी कर ली थी ।
सर्वोच्च के उक्त फैसले के बाद समाचार आने लगा है कि राजनीतिक दल में आवद्ध न रहने वाले लेकिन नेताओं की चमचागिरी करने वाले कुछ व्यक्ति पैसा लेकर सभासद पद के लिए दौडÞ रहे हैं । बताया जा रहा है कि इस तरह विभिन्न शक्तिशाली नेताओं का दरवाजा खटखटाने वालों में बहुत लोग अपने को नागरिक समाज के अग्रणी, कलाकार, पत्रकार, वकील तथा व्यवसायी बताते हैं । दूसरी तरफ सर्वोच्च के फैसले से आक्रोशित नेतागण ने सरकार की तरफ से उक्त फैसले को बदर करवाने के लिए मुद्दा के पुनरावलोकन की मांग करते हुए सर्वोच्च में रिट दायर किया है । यदि सर्वोच्च द्वारा पुनरावलोकन के क्रम में पहले के फैसले में कुछ फेरबदल हुआ तो राजनीतिक दलों की चाँद ही चाँदी है ! इस तरह राजनीतिक दलों द्वारा योग्यता और दक्षताविहीन अपने खास लोगों को संविधानसभा में पहुँचाना बेहद शर्मनाक बात है । भगवान करें ऐसा न हो !
पर्दे के पीछे कौन-कौन –
समय-समय में सर्वोच्च द्वारा तत्कालीन समय और सर्न्दर्भ के लिए ऐतिहासिक फैसला किया जाता है । संविधानसभा के लिए २०७१ वैशाख २९ का फैसला भी ऐसा ही ऐतिहासिक था । राजनीतिक दलों को अंकुश में रखने वाला यह फैसला जनभावना के अनुकूल ही है । लेकिन इस तरह के फैसले सर्वोच्च द्वारा ऐसे ही नहीं लिए जाते । इस की पृष्ठभूमि में बहुत सारे लोगों की भूमिका रहती है । वैशाख २९ गते हुए फैसले की पृष्ठभूमि में भी इस तरह के कुछ व्यक्तियों का हाथ है, लेकिन उनकी खास चर्चा मीडिया ने नहीं की ।
सामान्यतः सर्वोच्च के इस तरह के ऐतिहासिक फैसले का समाचार र्सार्वजनिक होते समय पृष्ठभूमि में रहने वाले व्यक्तियों की भी कुछ न कुछ चर्चा होती है । वैशाख ३० गते फैसला सम्बन्धी समाचार को सभी सञ्चार माध्यमों ने प्रमुख समाचार के रूप में प्राथमिकता दी थी । लेकिन जानकारों का मानना है कि २९ गते सर्वोच्च द्वारा जो फैसला हुआ था, उस फैसले के लिए सर्वोच्च को मजबूर करने वाले व्यक्ति के बारे में खास चर्चा नहीं हो सकी । ऐसे मुख्य पात्र हैं- विश्वेन्द्र पासवान, रामहरि श्रेष्ठ, दीपेन्द्र झा, सुरेन्द्र महतो, चन्द्रकान्त ज्ञवाली और पंकज कर्ण्र्ाा हाँ, २६ सभासद् मनोनित करते वक्त राजनीतिक बंटवारा नहीं होना चाहिए, कह कर सर्वोच्च ने जनपक्षीय जो फैसला किया है, उसके पीछे इन्हीं लोगों की प्रमुख भूमिका रही थी ।
आदिवासियों का मानवअधिकार सम्बन्धी वकील समूह की तरफ से रामहरि श्रेष्ठ और दलित जनजाति पार्टर्ीीे सभासद विश्वेन्द्र पासवान ने ‘२६ मनोनीति कोटे में राजनीतिक बंटवारा नहीं हो, अन्तरिम संविधान की व्यवस्था अनुसार गैर राजनीतिक व्यक्तियों को मनोनीत किया जाए और इसके लिए सर्वोच्च द्वारा निर्देशनात्मक आदेश की आवश्यकता है’, कहते हुए अलग-अलग रीट दायर किया था । रीट में कहा गया था कि राष्ट्रीय जीवन में महत्वपर्ूण्ा योगदान करने वाले तथा संविधानसभा में नहीं पहुँच पाए दलित/जनजाति में से २६ सभासद मनोनयन हों, संविधान की ऐसी भावना है । रीट निवेदन में पहली संविधानसभा गतिविधि का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि इस बार भी पहले की तरह ही निर्वाचन में पराजित उम्मीदवार, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता मनोनित होने की सम्भावना बढÞती जा रही है, इसको रोकना चाहिए । उक्त रीट निवेदन की भावना अनुसार अधिवक्ता दीपेन्द्र झा, सुरेन्द्र महतो, चन्द्रकान्त ज्ञवाली और पंकज कर्ण्र्ााे बहस किया था । फैसले के अन्तिम दिन दीपेन्द्र झा ने रीट निवेदक की तरफ से बहस किया था । अधिवक्ता झा की बहस सुनने के बाद ही सर्वोच्च ने शाम ७ बजे अपना फैसला सुनाया था ।
अधिवक्ता झा ने भारतीय संविधान की धारा ८० -३) का उल्लेख करते हुए भारतीय अदालत द्वारा सचिन तेन्दुलकर सम्बन्धी ऐसी ही प्रकृति के मुद्दे के सम्बन्ध में किए गए फैसले को अपने दलील के रूप में पेश किया था । ‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व वह है, जो अपने निजी, व्यावसायिक और सांगठनिक पहचान और एजेण्डा से अलग रह कर राष्ट्र के लिए योगदान दे सकता है । सिर्फवही व्यक्ति सभासद के हकदार हैं, राजनीतिक व्यक्ति नहीं’ अधिवक्ता झा ने अपनी बहस के क्रम में बताया था । उनका मानना था कि ऐसे व्यक्ति साहित्य, कला, विज्ञान, कानून, न्याय किसी भी क्षेत्र के हो सकते हंै । लेकिन किसी दलीय प्रतिस्पर्धा और चुनाव में जाना नहीं चाहते हैं । इस सर्न्दर्भ में अधिवक्ता झा ने कांग्रेस नेता गगन थापा को राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप चित्रण करते हुए कहा था- ‘गगन थापा राष्ट्रीय व्यक्तित्व होते हुए भी राजनीतिक होने के कारण २६ सभासदों के कोटे में नहीं आ सकते हैं । सर्वोच्च ने झा के तर्क और भावना को सदर करते हुए फैसला किया है ।
फैसले में र्सवाेच्च अदालत ने कहा है कि संविधानसभा में २६ सभासद मनोनयन करते वक्त पहले कीे तरह दलगत बंटवारा नहीं होना चाहिए । यह भी कहा गया है कि चुनाव में पराजित तथा समानुपातिक सूची में रह कर प्रतिस्पर्धा करने वालों को भी इस कोटे में नहीं रखा जाए । सर्वोच्च ने आगे कहा है- राष्ट्रीय जीवन में महत्वपर्ूण्ा योगदान करने वाले और प्रत्यक्ष तथा समानुपातिक मार्फ संविधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहे आदिवासी तथा जनजाति समुदाय को भी इस कोटे में जगह मिलनी चाहिए । सर्वोच्च के न्यायाधीश रामकुमारप्रसाद शाह और कल्याण श्रेष्ठ के संयुक्त इजलास ने ऐसा फैसला किया है ।

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